करो या मरो; इस पार या उस पार... ब्रिटिश हुकूमत की गोलियां खाकर बलिदान हो गए आजादी के दीवाने
देश की आजादी लाखों बलिदानियों का फल है, जिसमें बिहार का योगदान अतुलनीय रहा है। तारापुर गोलीकांड और पटना सचिवालय गोलीबारी जैसी घटनाओं ने स्वतंत्रता संग ...और पढ़ें
HighLights
तारापुर गोलीकांड में 1932 में 34 वीर शहीद हुए।
भारत छोड़ो आंदोलन में बिहार सबसे सक्रिय केंद्रों में रहा।
पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराते सात छात्र शहीद हुए।
प्रभात रंजन, पटना। देश की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति या एक दिन के संघर्ष का परिणाम नहीं थी। यह अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों, किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और आम नागरिकों के लंबे संघर्ष, त्याग और उनके बलिदान का फल है।
बिहार में भी बड़ी संख्या में गांव-गांव से लोग स्वतंत्रता की लड़ाई को निकले थे। बिहार राज्य अभिलेखागार की पुराभिलेखपाल डा. रश्मि किरण ने बताया कि इससे संबंधित अभिलेख प्रमाण हैं कि किस तरह हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
महात्मा गांधी ने करो या मरो का आह्वान किया था। इस आह्वान ने पूरे देश में स्वतंत्रता की नई चेतना जताई।
बिहार एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा, जहां छात्रों, किसानों, मजदूरों और आम जनता ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया।
गिरफ्तारी के बाद फूटा था छात्रों का गुस्सा
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और राष्ट्रव्यापी आंदोलन हुए।
1917 में चंपारण सत्याग्रह, 1919 में रालेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह, 1920-1922 तक असहयोग आंदोलन, 1930-34 तक सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि।

1942 के आंदोलन के समय क्रांतिकारियों ने बुलेटिन बांटा था जिसमें गांधी जी के संदेश थे।
1920-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान देश के कई कद्दावर नेताओं की गिरफ्तारी हुई। नौ अगस्त 1942 को अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रदेश के अलग-अलग जिलों से क्रांतिकारियों को जेलों में बंद कर दिया गया था।
पटना जिले में अगस्त क्रांति के दौरान चार हजार से अधिक क्रांतिकारियों को जेल में बंद कर दिया गया था।
कांग्रेस के बड़े नेताओं में डा. राजेंद्र प्रसाद को नौ अगस्त 1942 को सदाकत आश्रम से गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल में डाल दिया गया था।

नेताओं की गिरफ्तारी के समय ब्रिटिश शासन ने किया था पत्राचार।
पटना का तत्कालीन जिलाधिकारी मि. आर्चर राजेंद्र बाबू को गिरफ्तार करने सदाकत आश्रम पहुंचा। उनके जेल पहुंचने के पहले गिरफ्तारी की खबर पूरे शहर में आग की तरह फैल गई थी।
उसी दिन फूलन प्रसाद वर्मा भी गिरफ्तार हुए थे। डा. राजेंद्र प्रसाद की गिरफ्तारी के बाद पटना कालेज, साइंस कालेज और इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों ने पटना विश्वविद्यालय के अहाते में जमा हो कर अंग्रेजों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की थी।
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद छात्र और युवा भड़क उठे और पढ़ाई छोड़ कर आंदोलन का हिस्सा बने। 10 अगस्त 1942 को पटना में बड़ी संख्या में छात्रों का हुजूम वंदे मातरम का नारा लगाते हुए बांकीपुर जेल, हार्डिंग रोड एवं सचिवालय की ओर बढ़ने लगा था।
खबरें और भी
छात्रों को भीड़ को देखते हुए अंग्रेजों ने सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए थे। इस दौरान छात्र हाथ में तिरंगा लिए आगे बढ़ते रहे।
ब्रिटिश सत्ता को सीधे चुनौती दे रहे थे। स्कूल, कालेजों से लेकर हर प्रतिष्ठान में आंदोलन की ज्वाला धधकती जा रही थी।
जान पर खेल लहराया तिरंगा
11 अगस्त को सरकारी कार्यालयों और सचिवालय पर तिरंगा फहराने की योजना 10 अगस्त को बन गई थी। 11 अगस्त की सुबह लोग घरों से निकलने लगे।
अशोक राजपथ जनसमूह से भरा था। आंदोलनकारियों का जत्था बांकीपुर पहुंचा। सभा हुई। आजादी से कम किसी को कुछ मंजूर नहीं था। सचिवालय पर बड़ी संख्या में ब्रिटिश हुकूमत ने सुरक्षा बल तैनात किए थे।

स्वतंत्रता के बाद बिहार सरकार ने बलिदानियों का पता लगाकर सूची जारी की।
आंदोलनकारियों पर सुरक्षा बलों ने लाठी चार्ज किया, फायरिंग की पर लोग टस से मस नहीं हुए। शाम चार बजकर 57 मिनट पर तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू आर्चर के आदेश पर तीन मिनट तक 13 राउंड गोलियां चलाई गईं।
इस दौरान सात छात्रों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसमें मिलर हाई स्कूल के नौंवी के छात्र देवीपद चौधरी, पुनपुन हाई स्कूल के छात्र रामगोविंद सिंह, राम मोहन राय सेमिनरी के छात्र रामानंद सिंह, पटना हाई स्कूल के छात्र राजेंद्र सिंह, बीएन कालेज के छात्र जगपति कुमार, पटना कालेजिएट के छात्र सतीश प्रसाद झा, राममोहन राय सेमिनरी के छात्र उमाकांत सिंह बलिदान हुए। 12 अगस्त 1942 को बलिदानियों की शव यात्रा निकली थी।

तारापुर का तत्कालीन पुलिस थाना जहां क्रांतिकारियों ने झंडा फहराया था। इसमें 34 लोग ब्रिटिश पुलिस की गोली से बलिदान हुए थे।
इस दौरान पूरा शहर यात्रा में शामिल हुआ था। ब्रिटिश शासन ने शहर में धारा 144 लागू कर दी थी।
नारों ने दिया था बल
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नारों ने क्रांतिकारियों को बल दिया था। उस दौरान करो या मरो, अब नहीं तो कभी नहीं, इस पार या उस पार, सिपाही गोली चलाना छोड़ दो, कर नहीं देना है, गोरखा भाई सुगौली की संधि याद करो... आदि नारों ने जनमानस को राष्ट्रप्रेम के लिए प्रेरित किया था।कार्यक्रम के दौरान नेताओं की कही बातें नारे के रूप में उन दिनों खूब प्रचलित हुए।