बिहार में हर साल 73 घंटे कम सो रहे लोग, जलवायु परिवर्तन ने छीनी रातों की नींद; रिपोर्ट में खुलासा
बिहार में भीषण गर्मी और उमस के कारण लोगों की नींद प्रभावित हो रही है, जिससे प्रतिवर्ष औसतन 73 घंटे की नींद कम हो रही है। ...और पढ़ें

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।
HighLights
बिहार में गर्मी और उमस से प्रतिवर्ष 73 घंटे नींद कम।
जलवायु परिवर्तन नींद की कमी का मुख्य कारण बन रहा।
कम नींद से स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही।
विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। जिस आषाढ़ की रातें कभी सुकून भरी नींद की हुआ करती थीं, वे इस बार करवटें फेरते गुजरीं। बरसात में गर्मी के सितम का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा! दमघोंटू गर्मी और लिजलिजे उमस ने रातों की नींद चुरा ली है।
ऐसे में बिहार (पटना) के लोग प्रतिवर्ष औसतन 73 घंटे कम सो रहे। इनमें पांच घंटे सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण है। यह रतजगा स्वास्थ्य के साथ कार्यक्षमता और उत्पादकता पर भारी पड़ रहा है।
ये मनगढ़ंत बातें नहीं, बल्कि क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट के तथ्य हैं, जिसमें बिहार को एक प्रमुख वैश्विक हाट-स्पाट माना गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण बिहार विश्व के उन क्षेत्रों में सम्मिलित हो गया है, जहां के लोग सबसे अधिक नींद खो रहे।
इस संदर्भ में दक्षिणी भारत के महानगर अपेक्षाकृत अधिक बेहाल हैं। देश के प्रमुख महानगरों के निवासी प्रतिवर्ष औसतन 65 से 93 घंटे तक की नींद खो रहे हैं, जिनमें चेन्नई (93 घंटे) सबसे अधिक प्रभावित है। मुंबई और कोलकाता में यह आंकड़ा क्रमशः 84 घंटे और 80 घंटे है। दिल्ली में कुल नींद की कमी अपेक्षाकृत कम (66 घंटे) रही।
भारत सहित विश्व के 1338 शहरों का विश्लेषण कर यह रिपोर्ट बनी है। इसके अनुसार, 2020-2025 के दौरान वैश्विक स्तर पर हर व्यक्ति ने प्रतिवर्ष लगभग 56 घंटे की नींद खोई, जिनमें 10 प्रतिशत से अधिक नुकसान जलवायु परिवर्तन से जुड़ा रहा।
रात में तापमान बढ़ने का असर युवाओं की तुलना में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों पर लगभग दोगुना अधिक होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े शहरों में बन चुके कंक्रीट के जंगल दिन भर की धूप को सोख लेते हैं और सूर्यास्त बाद भी गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते।
खबरें और भी
परिणाम-स्वरूप रातें सुलगने लगी हैं। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं हुआ और शहरों को गर्मी से बचाने के लिए प्रभावी पहल नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में रातें और गर्म होंगी तथा नींद और कम।
नींद हेतु दैहिक तापमान
गहरी नींद के लिए शरीर का तापमान 18 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। अगर तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर हो, तो शरीर के लिए स्वयं को ठंडा रखना कठिन हो जाता है। ऐसे में शरीर बार-बार तापमान को नियंत्रित करता है। इससे बार-बार नींद खुलती है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
सात घंटे से कम सोने पर हृदय रोग, स्ट्रोक, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापे के साथ अवसाद और चिड़चिड़ापन आदि की आशंका बढ़ जाती है। निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और चूक अधिक होती हैं। एकाग्रता में कमी के साथ काम अधूरा रहने की समस्या 50% तक बढ़ जाती है।
कार्यक्षमता में कमी
छह घंटे से कम सोने वाले कर्मचारियों की कार्यक्षमता में 23 प्रतिशत तक गिरावट आती है। छह से सात घंटे सोने वालों की उत्पादकता नौ प्रतिशत कम होती है। सात से नौ घंटे तक सोने वालों की तुलना में छह से सात घंटे तक सोने वाले लोग वर्ष में लगभग 3.7 अतिरिक्त कार्य दिवस बर्बाद करते हैं।
भारत को आर्थिक क्षति
व्यस्कों को सात से नौ घंटे की नींद चाहिए। रैंड यूरोप के अनुसार, नींद की कमी से भारत को प्रतिवर्ष लगभग 84 अरब डालर का आर्थिक नुकसान होता है। स्लीप एप्निया के कारण दो से तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान अलग से। इससे कार्यक्षमता में 77% तक की कमी दर्ज हुई है।
🌡️ गर्मी ने छीने नींद के घंटे
जलवायु परिवर्तन का नींद पर प्रभाव
| राज्य | नींद के घंटे (प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति) | प्रभाव (घंटे) |
|---|---|---|
| बिहार | 73 | 5 |
| झारखंड | 71 | 6.3 |
| बंगाल | 7.5 | 5.6 |
| ओडिशा | 78 | 5.3 |
| उत्तर प्रदेश | 68.8 | 4.9 |
| हरियाणा | 67.3 | 4.7 |
| पंजाब | 61.5 | 4.5 |
| मध्य प्रदेश | 69.6 | 6 |
| छत्तीसगढ़ | 77 | 6 |
यह उन राज्यों के महानगरों में दर्ज नींद की कमी के घंटों का औसत है।