'बिहार में प्रकृति प्रेम का संदेश', पर्यावरणविद डॉ. जोशी बोले- बन सकता है पर्यावरण संरक्षण और रोजगार का माॅडल
पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने प्रकृति पथ यात्रा के दौरान बिहार के अनुभवों को साझा किया, जिसमें बाढ़ की ...और पढ़ें

प्रकृति पथ यात्रा के अनुभव साझा करते पर्यावरणविद डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी। जागरण
HighLights
बाढ़ को रोजगार के अवसर में बदलने पर जोर दिया।
छठ महापर्व बिहार की प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक।
सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) का महत्व समझाया।
मनीष कुमार, पटना। बिहार में लोगों को प्रकृति से प्रेम है, राज्य प्रकृति संरक्षण और रोजगार का माॅडल बन सकता है। पद्मश्री और पद्मभूषण से अलंकृत पर्यावरणविद डा. अनिल प्रकाश जोशी को बिहार में ये संभावनाएं दिख रही हैं।
वे पर्यावरण संरक्षण, हिमालय और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से साइकिल यात्रा पर हैं। नेपाल के जनकपुर से होते हुए बिहार भ्रमण के दौरान पटना में दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने कहा कि बिहार में उन्हें लोगों का प्रकृति से जुड़ाव दिखा। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश।
आप दो अक्टूबर से अपने दल के साथ साइकिल यात्रा पर हैं। उद्देश्य क्या है?
पर्यावरण संरक्षण और हिमालय एवं जल संरक्षण के उद्देश्य से प्रकृति पथ यात्रा पर हूं। इस समय बिहार से में हूं। यहां से होते हुए उत्तर प्रदेश निकलेंगे। उद्देश्य है घर, गांव, राज्य और देश में प्रकृति की स्थिति को समझना।
बदलते पर्यावरण के प्रति लोगों की संवेदनाओं को जानना और संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा करना। यात्रा में महिलाओं, बच्चों, शिक्षकों, नीतिकारों और राजनीतिक नेतृत्व से संवाद हो रहा है।
यात्रा 22 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के बलिया पहुंचेगी। वहां से उत्तर प्रदेश की पारिस्थितिकी और आर्थिक स्थिति का आकलन करते हुए आगे बढ़ेगी।
प्रकृति पथ यात्रा के दौरान बिहार में क्या महसूस किया?
बिहार में प्रकृति और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अनुभव बहुत सुखद रहा। मैंने देखा कि बिहार बाढ़ की समस्या झेल रहा है। नेपाल में भारी वर्षा और बाढ़ के कारण गंडक और कोसी आदि नदियों में पानी बढ़ता है, जिसका असर बिहार पर पड़ता है।
इसके बावजूद बिहार में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता दिखाई दी। इसमें नीति बनाने वालों और नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
गांव-घर में लोगों में प्रकृति के प्रति चिंता और जुड़ाव देखने को मिला। यहां की संस्कृति और संस्कार में प्रकृति के प्रति सम्मान झलकता है।
बिहार की कौन-सी विशेषता आपको सबसे अधिक प्रभावित करती है?
छठ महापर्व बिहार की प्रकृति से जुड़ी संस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह जुड़ाव केवल उस नदी या घाट तक सीमित नहीं है, जहां लोग पूजा करने जाते हैं।
घरों और गांवों में भी प्रकृति के प्रति आस्था दिखाई देती है। छठ के माध्यम से लोग प्रकृति के प्रति अपना स्नेह और सम्मान प्रकट करते हैं। यह ऐसी सांस्कृतिक ताकत है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों को प्रेरित कर सकती है।
वर्ष 2013 में भी आपने यात्रा की थी। तब और आज के बिहार में क्या बदलाव देखते हैं?
मैंने अपने कुछ साथियों के साथ 2013 में भी बिहार की यात्रा की थी। राज्य में काफी बदलाव महसूस किया है। शासन-प्रशासन से लेकर सड़क और संपर्क व्यवस्था में बहुत सुधार दिखाई दिया।
हाईवे ने शहरों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं गांवों की सड़कें भी लोगों को एक-दूसरे के करीब लाई हैं। सिंचाई का दायरा बढ़ा है और लोग बदलते पर्यावरण के बीच भी बेहतर जीवन के लिए प्रयास कर रहे हैं।
बिहार को लेकर जो धारणाएं बनाई जाती रही हैं, उनमें भी बदलाव की जरूरत है। यहां की जमीनी स्थिति को समझना जरूरी है।
यात्रा के दौरान छोटे शहरों और कस्बों में क्या खास देखने को मिला?
बांका का उदाहरण मेरे लिए खास रहा। वहां लोगों ने अपने छोटे शहर को साफ-सुथरा बनाए रखने की कोशिश की है। रास्ते में चाय की छोटी दुकानों और ढाबों पर भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता दिखाई दी।
कुछ दुकानदारों ने कचरा फेंकने के लिए दुकान के पास कंटेनर रखा था। देश इंदौर जैसे शहरों की स्वच्छता की चर्चा करता है, लेकिन बांका जैसे छोटे शहरों के प्रयासों को भी पहचान मिलनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी से स्वच्छता की संस्कृति विकसित हो सकती है। देश के दूसरे हिस्से भी ऐसे प्रयासों से सीख सकते हैं।
बाढ़ की समस्या के समाधान का क्या रास्ता हो सकता है?
बिहार में बाढ़ बड़ी समस्या है, लेकिन इससे प्रभावित लोगों का धैर्य और उत्साह भी उल्लेखनीय है। वे बार-बार कठिनाइयों से उबरकर अपने जीवन को पटरी पर लाने में जुट जाते हैं।
हमें बाढ़ को केवल आपदा के रूप में देखने के बजाय पानी के बेहतर उपयोग की संभावनाओं पर भी विचार करना चाहिए।
जहां पानी कई महीनों तक ठहरता है, वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार मखाना की खेती, मत्स्य पालन और झींगा पालन जैसे रोजगार विकसित किए जा सकते हैं।
मिथिलांचल में तालाबों और जलाशयों का उपयोग खेती तथा मत्स्य पालन में होते देखना अच्छा लगा। जरूरत इस बात की है कि पानी को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए।
पर्यावरण संरक्षण और रोजगार को एक साथ कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है?
मेरा मानना है कि बिहार प्रकृति संरक्षण और रोजगार सृजन का माडल राज्य बन सकता है। इसके लिए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों को समझना और उनका टिकाऊ उपयोग करना होगा।
स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और प्रकृति का संरक्षण भी संभव होता है। खेती, जल, वन और जैव विविधता को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ जोड़ना होगा।
सकल पर्यावरण उत्पाद क्यों जरूरी है?
सकल पर्यावरण उत्पाद यानी ग्रास एनवायरनमेंट प्रोडक्ट (जीईपी) के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के योगदान का आकलन किया जा सकता है।
मेरा मानना है कि बिहार का जीईपी अच्छा हो सकता है और इसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है। विकास का आकलन केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से नहीं होना चाहिए।
हमें यह भी देखना चाहिए कि विकास के दौरान जल, जंगल, जमीन और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति कैसी है। इससे योजनाएं बनाने और उनके परिणामों को समझने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात में किन मुद्दों पर चर्चा हुई?
मुख्यमंत्री से बातचीत में नदियों, सड़कों और छोटे बांधों से जुड़ी योजनाओं का जिक्र हुआ। उन्होंने गांवों के विकास और प्रकृति एवं पर्यावरण को लेकर अपना सोच बताया। मुझे अच्छा लगा कि उन्होंने छठ पूजा और प्रकृति से बिहार के जुड़ाव पर गर्व व्यक्त किया। मैंने उनसे बिहार डेवलपमेंट डायलाग्स सीरीज शुरू करने का आग्रह किया। इसमें कृषि, वन, नदियों और जल संरक्षण जैसे विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने इस विषय पर संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर आगे बढ़ने की बात कही।
यात्रा में महिलाओं और समुदायों की क्या भूमिका सामने आई?
बिहार में सामुदायिक संगठनों की ताकत दिखाई दी। खासकर महिलाओं की भागीदारी और जागरूकता ने प्रभावित किया। बछवाड़ा में बड़ी संख्या में महिलाओं ने हमारा स्वागत किया और अपने कामों के बारे में बताया।
महिलाएं केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि अपने समुदाय और विकास से जुड़े फैसलों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
यह सामाजिक बदलाव की महत्वपूर्ण निशानी है। प्रकृति संरक्षण के प्रयासों को सफल बनाने में महिलाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी है।
बिहार के भविष्य को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?
बिहार में प्रकृति, अर्थव्यवस्था और समाज को साथ लेकर चलने की बड़ी संभावनाएं हैं। यहां की संस्कृति, स्थानीय संसाधन, सामुदायिक भागीदारी और लोगों की मेहनत इसकी ताकत हैं।
जरूरत है कि इन ताकतों को योजनाओं से जोड़ा जाए। खेती, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा।
जब लोगों की भावनाओं का सम्मान होगा और उनकी आजीविका भी मजबूत होगी, तभी समग्र विकास संभव है। मुझे विश्वास है कि बिहार आने वाले समय में प्रकृति आधारित विकास की दिशा में देश के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।