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4 सितंबर को मनेगी जन्माष्टमी, रोहिणी नक्षत्र में होगा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव; 1000 एकादशी का फल देगा व्रत

Published: Wed, 02 Sep 2026 06:30 PM (IST)

इस वर्ष जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी, जिसमें रोहिणी नक्षत्र और जयंती योग का विशेष संयोग बन रहा है। ...और पढ़ें

जयंती योग में होगी विशेष पूजा

जयंती योग में होगी विशेष पूजा

HighLights

  1. जन्माष्टमी 4 सितंबर को रोहिणी नक्षत्र में मनाई जाएगी।

  2. इस बार जयंती योग और हर्षण योग का विशेष संयोग।

  3. मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, 5 को पारण।

जागरण संवाददाता, पटना। ‘श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव’ के जयघोष के बीच भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव जन्माष्टमी इस वर्ष चार सितंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार जन्माष्टमी पर विशेष ग्रह-गोचरों का संयोग बन रहा है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का विधान है।

मध्यरात्रि में भगवान के जन्म के समय पूजा-अर्चना और व्रत का विशेष महत्व माना गया है। गृहस्थ और वैष्णव दोनों परंपराओं के श्रद्धालु एक ही दिन जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे। शुक्रवार को अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र रात 11.22 बजे तक रहेगा।

जयंती योग में होगी विशेष पूजा

अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से इस बार जन्माष्टमी पर जयंती योग बन रहा है। ज्योतिष आचार्य पंडित राघव नाथ झा के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रोहिणी नक्षत्र के साथ हर्षण योग और सर्वार्थ सिद्धि का भी संयोग रहेगा।

जन्मोत्सव के समय चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में रहेंगे। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार चंद्रमा की यह स्थिति सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और पारिवारिक मंगल के लिए शुभ मानी जाती है। श्रद्धालु दिनभर सात्विक आहार या फलाहार के साथ भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण, जप और संकीर्तन करेंगे।

मध्यरात्रि में होगा बालगोपाल का अभिषेक

रात्रि में मध्यरात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। परंपरा के अनुसार खीरे से बालगोपाल के प्रतीकात्मक प्राकट्य की विधि संपन्न कराई जाएगी। इसके बाद पंचामृत और गंगाजल से भगवान का अभिषेक किया जाएगा।

अभिषेक के बाद बालगोपाल को पीतांबर, मोरपंख मुकुट और वैजयंती माला अर्पित की जाएगी। माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी और तुलसी दल का नैवेद्य चढ़ाकर आरती की जाएगी। इसके बाद बालगोपाल को पालने में झुलाकर जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है।

पांच सितंबर को होगा व्रत का पारण

श्रद्धालु चार सितंबर को व्रत रखकर मध्यरात्रि में भगवान के जन्मोत्सव में शामिल होंगे। इसके बाद पांच सितंबर को व्रत का पारण किया जाएगा। जन्माष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के धर्म, कर्म, लोक कल्याण और सत्य के मार्ग पर चलने के संदेश को स्मरण करने का अवसर भी माना जाता है।

श्रद्धा, संयम और सात्विक भाव से पूजा-अर्चना करने से पर्व की आध्यात्मिक सार्थकता बढ़ती है। इस दिन मंदिरों और घरों में विशेष सजावट, भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना का आयोजन होगा।

श्रीकृष्ण के साथ इनकी भी होगी पूजा

कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के साथ माता देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद और यशोदा की भी पूजा-अर्चना की जाएगी। पंडित राकेश झा के अनुसार जन्माष्टमी पर जयंती योग, वृष लग्न, रोहिणी नक्षत्र और मृगशिरा नक्षत्र का युग्म संयोग रहेगा।

इसके साथ हर्षण और वज्र योग का भी संयोग बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र में रोहिणी नक्षत्र को उदार, मधुर, मनमोहक और शुभ माना जाता है। रोहिणी विकास और प्रगति का सूचक मानी जाती है।

इन चीजों को अर्पित करना माना जाता है शुभ

  • धन एवं वंश वृद्धि के लिए: पीले फूल में इत्र लगाकर अर्पित करें।
  • न्यायिक कार्य में सफलता के लिए: हल्दी और केसर चढ़ाएं।
  • स्वास्थ्य लाभ के लिए: गुड़ से निर्मित खीर और हलवा का भोग लगाएं।
  • सौंदर्य व निरोग काया के लिए: माखन और दूध से बनी वस्तु का भोग लगाएं।

पूजा के शुभ मुहूर्त

  • वृष लग्न: रात 9:43 बजे से 11:40 बजे तक
  • निशीथ लग्न: मध्यरात्रि 11:49 बजे से 1:14 बजे तक
  • निशिता पूजा की अवधि: 1 घंटा 25 मिनट

इन शुभ मुहूर्तों में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा-अर्चना कर जन्मोत्सव मनाएंगे।