‘बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए’, इसी भरोसे के साथ नीतीश ने थामी थी बिहार की कमान और इसी विश्वास के साथ दी विदाई
नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल, 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री पद से 20 साल बाद इस्तीफा दे दिया, सम्राट चौधरी को उत्तराधिकारी बनाया गया। ...और पढ़ें

नीतीश कुमार

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अश्विनी, पटना। रागिनी, विनीता जैसी लाखों बेटियां गांव-कस्बों में साइकिल चलाने लगीं। यह एक बड़ा परिवर्तन था। नई पीढ़ी को गढ़ने का। बीस वर्षों में ही साइकिल से स्कूटी तक। अब तो ये बस भी चला रहीं। उस समाज की बेटियां, जो हाशिए पर थीं। समाज में बेटियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता और देखते देखते पुलिस की वर्दी में हजारों महिलाएं।
2005 से 2026 तक अपने मुख्यमंत्रित्व काल में ऐसे ही परिवर्तन के अगुआ बने नीतीश कुमार ने अपनी इस यात्रा पर 14 अप्रैल, 2026 को स्वयं विराम लगा दिया। आगे के सपने दूसरी पीढ़ी के हाथों में सौंप दिए।
नीतीश न्याय यात्रा पर निकल पड़े
मुख्यमंत्री पद के लिए सम्राट चौधरी के नाम को एनडीए में सर्वसम्मति से समर्थन दे दिया गया। 24 नवंबर 2005, जब नीतीश कुमार ने एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। वह दौर, जब चुनाव के बाद रातों रात विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था।
उस समय केंद्र में कांग्रेस और राज्य में राजद नेतृत्व की सरकार थी। चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, पर एनडीए सरकार की संभावना बन रही थी। ऐसे समय में ही विधानसभा भंग की गई थी। नीतीश न्याय यात्रा पर निकल पड़े थे। उनके भाषणों में यह जरूर होता था, ‘बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए।’
आम जनता ने बात मानी और फिर ऐसा भरोसा जताया कि 2005 से 20 वर्षों तक लगातार वे मुख्यमंत्री के रूप में बने रहे। बीच में एक छोटे अंतराल के लिए दलीय समीकरण जरूर बदला, पर मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में भरोसा नीतीश का ही। सो, राजनीति का समीकरण उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहा।
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देखते-देखते बदल दी बिहार की तस्वीर
उन्होंने जब सत्ता संभाली तो आधारभूत संरचनाओं से लेकर सामाजिक संतुलन बनाने की बहुत बड़ी चुनौती उनके सामने थी। उन्होंने देखते देखते बिहार की तस्वीर बदल दी। जहां सड़क और खेत में अंतर कर पाना मुश्किल था, वहां गाड़ियां फर्राटे भरने लगीं।
पुल-पुलियों के जाल से लेकर स्कूल-कॉलेज और अस्पताल, हर क्षेत्र में बदलाव। इन सबके बीच समाज को गढ़ने वाला सोच। आधी आबादी को सशक्त बनाना, जिनके लिए नौकरियों से पंचायती व्यवस्था तक में आरक्षण का प्रविधान किया। उन्हें स्वावलंबी बनाना। इन सबने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ बना दिया।
मार्गदर्शक बन नई पीढ़ी को आगे के लिए तैयार करेंगे
जनता का विश्वास ही ताकत राजनीति के ट्रैक पर मर्जी भी उनकी ही चली, इसके पीछे की ताकत थी जनता का विश्वास। हर वर्ग, हर समुदाय का। सबसे बड़ी ताकत वे महिलाएं, जिन्हें जातीय ढांचे से निकालकर उन्होंने एक वर्ग के रूप में खड़ा कर दिया।
जनता से 2005 में कहा था, एक बार मेरा कहा मान लीजिए, फिर कहने की जरूरत नहीं पड़ी। अब मार्गदर्शक बन नई पीढ़ी को आगे के लिए तैयार करने के सोच के साथ ही-मैं त्यागपत्र देता हूं। नाटआउट! अपनी पारी की स्वयं ही घोषणा। इस्तीफे के लिए लोकभवन जाते समय का दृश्य भावुक कर देने वाला था। सबकी आंखें डबडबाई हुई। पर, जैसे वे फिर कह रहे हों, एक बार और मेरा कहा मान लीजिए। आम जन, महिलाएं, चौक-चौराहे हर जगह एक ही चर्चा। नीतीश ने सीएम पद छोड़ दिया। बातें बीस वर्षों की। उस बिहार की, जिसे उन्होंने गढ़ा है।