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    पटना HC से सम्राट सरकार को झटका: अनुकंपा शिक्षकों की बल्ले-बल्ले, अब मिलेगी रेगुलर सैलरी

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 07:46 PM (IST)

    पटना हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति में सरकारी देरी का खामियाजा आश्रितों को न भुगतने का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने शिक्षा विभाग को तीन माह के भीत ...और पढ़ें

    बिहार में अनुकंपा शिक्षकों की बल्ले-बल्ले, अब मिलेगी रेगुलर सैलरी

    बिहार में अनुकंपा शिक्षकों की बल्ले-बल्ले, अब मिलेगी रेगुलर सैलरी

    HighLights

    1. अनुकंपा नियुक्ति में सरकारी देरी का खामियाजा आश्रित नहीं भुगतेंगे।

    2. तीन माह में नियमित वेतनमान सहित सभी लाभ देने का निर्देश।

    3. शिक्षा विभाग के आदेश मनमाने और भेदभावपूर्ण करार दिए गए।

    विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने अनुकंपा के आधार पर नियुक्त तीन प्रखंड/नगर शिक्षकों को नियमित वेतनमान देने के मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट किया है कि जिला अनुकंपा समिति द्वारा अनुशंसा में हुई प्रशासनिक देरी का खामियाजा मृतक कर्मियों के आश्रितों को नहीं भुगतना पड़ेगा।

    अदालत ने शिक्षा विभाग द्वारा उनके दावों को ठुकराने वाले आदेशों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया तथा तीन माह के भीतर सभी मामलों पर नए सिरे से निर्णय लेकर नियमित वेतनमान सहित सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।

    न्यायाधीश हरिश कुमार की एकलपीठ ने सुजीत कुमार चौधरी, पंकज कुमार और मनोज कुमार की अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं के पिता वर्ष 2006 से पहले सेवा में रहते हुए दिवंगत हो गए थे।

    उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए समय पर आवेदन भी कर दिया था, लेकिन सरकारी स्तर पर लगी रोक और प्रशासनिक विलंब के कारण उनकी अनुशंसा 1 जुलाई 2006 के बाद हुई। इसके बाद उन्हें नियमित शिक्षक के बजाय निश्चित मानदेय पर प्रखंड/नगर शिक्षक नियुक्त कर दिया गया।

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    अदालत ने कहा कि जिला अनुकंपा समिति की अनुशंसा कब हुई, यह पूरी तरह प्रशासनिक प्रक्रिया है। इसमें हुई देरी के लिए आश्रितों को दंडित नहीं किया जा सकता। यदि समान परिस्थितियों वाले अन्य लोगों को राज्य सरकार नियमित वेतनमान का लाभ दे चुकी है, तो इन्हें उससे वंचित रखना समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

    पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के दिए गए न्याय निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार स्वयं 12 जनवरी 2018 के परामर्श (मेमो-38) के आधार पर समान मामलों में नियमित नियुक्ति और वेतनमान का लाभ दे चुकी है। ऐसे में केवल कुछ कर्मचारियों को लाभ देकर अन्य समान पात्र लोगों को वंचित रखना विधिसम्मत नहीं है।

    हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव और प्राथमिक शिक्षा निदेशक को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं के मामलों पर समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के अनुरूप पुनर्विचार कर तीन माह के भीतर नियमित वेतनमान सहित सभी लाभ प्रदान करने पर निर्णय लें। साथ ही, उनके दावे खारिज करने वाले सभी आदेश निरस्त कर दिए गए।

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