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बांकीपुर में प्रशांत क‍िशोर की जीत ने हिलाया सियासी गणित, BJP-RJD के सामने खड़ा हुआ बड़ा सवाल

Published: Sat, 15 Aug 2026 09:05 AM (IST)

प्रशांत किशोर की बांकीपुर उपचुनाव में जीत ने बिहार के स्थापित राजनीतिक दलों को हिला दिया है, जिससे भाजपा और राजद दोनों को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा।

बांकीपुर उपचुनाव में जीत के बाद जनता का आभार प्रकट करते प्रशांत किशोर। फाइल

बांकीपुर उपचुनाव में जीत के बाद जनता का आभार प्रकट करते प्रशांत किशोर। फाइल

HighLights

  1. प्रशांत किशोर की बांकीपुर उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत।

  2. भाजपा और राजद को मिली अप्रत्याशित हार।

  3. जाति-धर्म की पारंपरिक राजनीति को मिली चुनौती।

अरुण अशेष, उप राजनीतिक संपादक, बिहार। बांकीपुर विधानसभा के उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर यानी पीके की जीत ने स्थापित राजनीतिक दलों को अंदर से झकझोर कर रख दिया है।

एनडीए और महागठबंधन के बड़े और यहां तक कि छोटे दल रणनीति बना रहे हैं कि ऐसा क्या करें, ताकि आने वाले दिनों में इस तरह के परिणाम की परिणति न हो।

असल में ये दल परिणाम का तार्किक विश्लेषण भी नहीं कर पा रहे हैं। कभी वार्ड स्तर के किसी नेता को जिम्मेदार बता रहे हैं तो कभी उन्हें लगता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर कहीं कोई बड़ी चूक हुई है।

सत्‍ता पक्ष और व‍िपक्ष, दोनों की हार 

इस उपचुनाव की विशेषता यह रही कि इसमें सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल राजद- दोनों की हार हुई। आम तौर पर आमने सामने के मुकाबले में सत्तारूढ़ दल या विपक्ष के उम्मीदवार की हार जीत होती है।

दोनों धुरी को यह समझ नहीं आ रहा है कि वोटरों के जिस समूह को वे अब तक अपना मानकर चल रहे थे, वे अचानक क्यों विमुख हो गए?

भाजपा से सवर्ण और राजद से मुसलमान-यादव छिटक गए। बिहार की पिछले 35 वर्षों की चुनावी राजनीति की यही प्रवृत्ति रही है कि नेता अक्सर दल बदल कर लेते हैं।

दलों के कट्टर समर्थक ऐसा नहीं करते हैं। ये खानदानी वोटर हैं, जिन्हें कम से कम इस मामले में अपने पुरखों की पसंद का सम्मान करना अच्छा लगता है।

लेकिन बांकीपुर में इस बार ऐसा नहीं हुआ। सत्ता की लड़ाई में डटे राजनीतिक दलों को यही डर सता रहा है कि बांकीपुर की घटना अगर मतदाताओं की प्रवृत्ति बन जाती है तो आने वाले दिनों में बड़ा नुकसान हो सकता है।

क्योंकि अब तक की राजनीति जाति और धर्म के नाम पर होने वाली गोलबंदी के नाम पर ही चल रही थी। बांकीपुर ने इस गोलबंदी को ध्वस्त कर दिया।

मानकर चलने की आदत पड़ सकती है भारी 

हालांकि ये दल मानकर चल रहे हैं कि उपचुनाव का परिणाम आम चुनाव को प्रभावित नहीं कर पाएगा। लेकिन उन्हें डर लग रहा है कि मानकर चलने वाली आदत कहीं अगली संभावनाएं धूमिल न कर दे।

ऐसी ही मान्यता राजद की मुसलमान और यादव वोटरों को लेकर थी। मानकर चलने की आदत ने दोनों को गड्ढे में धकेल दिया। तटस्थ लोग राज्य में एक नए ध्रुवीकरण की भी संभावना देख रहे हैं।

कांग्रेस के स्वर्णकाल में मुसलमान, सवर्ण और अनुसूचित जातियों का बड़ा हिस्सा उसके साथ रहता था। जैसे-जैसे कांग्रेस का यह आधार कमजोर हुआ, राज्य में वह पिछड़ती चली गई।

उपचुनाव के परिणाम का विश्लेषण यह राय बनाने की अनुमति दे रहा है कि सवर्ण और मुसलमान कांग्रेस के दौर की तरह एकसाथ मतदान कर सकते हैं।

पिछड़ों में सबसे अधिक संगठित यादवों को भी इस संश्रय से आपत्ति नहीं है। हाल की कुछ घटनाओं के नाम पर अगड़ा-पिछड़ा विवाद पुनर्जीवित करने का भरपूर प्रयास हुआ। सफलता नहीं मिली।

इसलिए जाति और धर्म के नाम पर वोट बटोरने वालों को भी लग रहा है कि उन्हें कुछ नया करना पड़ेगा। सच यह भी है कि वर्तमान पीढ़ी को जाति और धर्म से अधिक इस बात से मतलब है कि उनका जीवन किस तरह अधिक से अधिक सुखद होगा।

राजनीतिक दल भी अब इसे महसूस कर रहे हैं। एनडीए की राज्य सरकार की हाल की घोषणाएं रोजगार बढ़ाने और शिक्षा को अधिकतम सुलभ बनाने पर केंद्रित हैं।

लेकिन, उसे यह भी लग रहा है कि चुनाव लड़ने के पुराने सिलेबस को बदलना पड़ेगा। सिलेबस बदलने का यह दबाव प्रशांत किशोर की जीत की देन है।

पार‍िवार‍िक आयोजनों से क‍िया क‍िनारा 

चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र की पहली यात्रा में पीके ने राजनीतिक दलों पर कुछ और दबाव बढ़ा दिया है। बिहार में शादी और श्राद्ध के अलावा अन्य पारिवारिक आयोजनों में भी सांसदों, मंत्रियों-विधायकों को आमंत्रित करने का चलन है।

यह इस स्तर पर है कि लोग बैंड बाजा वालों से करार न करें, अपने निकट संबंधियों को निमंत्रण न दें, लेकिन नेताओं को बुलाना नहीं भूलते।

शादी-विवाह के सीजन में इन महानुभावों का पूरा समय इन्हीं आयोजनों में गुजर जाता है। क्षेत्र में काम न हुआ, इसे याद नहीं रखा जाता है।

महानुभाव हमारे आयोजन में आए या नहीं, यह जरूर याद रखा जाता है। पीके इस चलन को भी बदल रहे हैं। उन्होंने अपने मतदाताओं से कहा कि हमें काम करने दें।

पारिवारिक आयोजनों में आने के लिए उन्हें बाध्य नहीं करें। एक बात यह भी कि अब तक बिहार में इस या उस का डर दिखाने के नाम पर वोट की मांग की जा रही थी, बांकीपुर में लोग निडर हो गए। वोटरों का निडर होना स्थापित दलों को डरा रहा है। यह डर उचित भी है।