बिहार में सावन का उल्लास: बेटियों तक पहुंचेगा मायके का स्नेह, घर-घर होगी शिव आराधना
सावन की शुरुआत के साथ बिहार में बेटियों के लिए मायके से 'सावन पुड़िया' भेजने और घरों में मिट्टी के पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिव आराधना की परंपराएं जीवंत ...और पढ़ें

रश्मि रानी, ऋचा झा और कंचन।
HighLights
बेटियों को मायके से भेजी जाती है 'सावन पुड़िया'।
घर-घर में मिट्टी के पार्थिव शिवलिंग बनाकर होती है पूजा।
सावन में शिव-गौरी के मिलन का होता है विशेष महत्व।
सोनाली दुबे, पटना। आज से सावन की पावन शुरुआत हो गई। कहीं बेटियां मायके से आने वाली सावन पुड़िया का इंतजार करेंगी। कहीं महिलाएं मिट्टी से भोलेनाथ का स्वरूप गढ़ेंगी। हर घर में शिव भक्ति का रंग होगा। मां के मन में बेटी के लिए स्नेह उमड़ेगा।
बिहार में सावन रिश्तों को संजोने वाली जीवंत परंपराओं का उत्सव भी है। खासकर मिथिला में पीढ़ियों से चली आ रही सावन पुड़िया की परंपरा आज भी निभाई जाती है। मिठाइयों में अनरसा, पीडुकिया और कई घरों में चीनी की पुड़ी का होना शुभ माना जाता है।
कंकड़बाग निवासी रश्मि रानी बताती हैं कि सावन शुरू होते ही बेटियों के लिए मायके से बांस के डाले या टोकरी में श्रृंगार का सामान, फल और मिठाइयां भेजी जाती हैं। यह परंपरा बेटी को यह एहसास दिलाती है कि विवाह के बाद भी मायका उसके लिए पहले जैसा ही अपना है।
अपने हाथों से गढ़ा जाता है भोलेनाथ का स्वरूप
एक और अनोखी परंपरा है पार्थिव शिवलिंग की पूजा। महिलाएं शुद्ध स्थान से मिट्टी लाकर उसे छानती हैं, पानी मिलाकर उसे गूंथती हैं। अपने हाथों से छोटे-छोटे शिवलिंग तैयार करती हैं। कहीं एक शिवलिंग बनता है तो कहीं 11, 21, 51 या 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर सामूहिक पूजा की जाती है।
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पूजा के समय बेलपत्र, धतूरा, चंदन, फूल, दीपक और रंगोली से पूरा आंगन शिवमय हो उठता है। पूरे सावन भर उसी शिवलिंग की पूजा करती हैं, तो कुछ प्रत्येक सोमवार नया पार्थिव शिवलिंग बनाकर आराधना करती हैं। सावन समाप्त होने पर इन शिवलिंगों का पवित्र जल में विसर्जन किया जाता है।
पाटलिपुत्र कॉलोनी की ऋचा झा बताती हैं कि पहले सावन में कई परिवार 15 दिनों तक बेटी के लिए भोजन और जरूरी सामान भी मायके से भेजते हैं। आज दूर रहने वाली बेटियों को सामान की जगह पैसे भेज दिए जाते हैं, ताकि वे अपनी जरूरत का सामान खरीद सकें।
फुलवारीशरीफ की कंचन कहती हैं कि उनके यहां सावन को भगवान शिव और माता गौरी के मिलन का महीना माना जाता है। हर सोमवार आटा, गुड़ और मखाने से विशेष लड्डू बनाए जाते हैं। पूजा के बाद एक लड्डू भगवान को अर्पित किया जाता है, शेष प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। सावन के अंत में भगवान को अर्पित प्रसाद और पूजन सामग्री का विधिवत विसर्जन किया जाता है।