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जिंदगी की भागदौड़ में एक पल ठहरिए, यही ठहराव देगा सुकून और खुद से मुलाकात का मौका

Published: Tue, 01 Sep 2026 06:32 PM (IST)

यह लेख जिंदगी की भागदौड़ में रुककर खुद को समय देने और आत्मचिंतन के महत्व पर प्रकाश डालता है। यह ...और पढ़ें

सीमा सिंह

सीमा सिंह

HighLights

  1. ठहराव हारना नहीं, स्वयं को समय देना है।

  2. जीवन की भीड़ में खुद से जुड़ना जरूरी।

  3. आत्मचिंतन से मिलती है सही दिशा और सुकून।

सोनाली दुबे, पटना। जिंदगी की इस भागदौड़ में कभी-कभी ठहर जाना हारना नहीं, बल्कि स्वयं को गले लगाकर यह कहना है-‘तुमने बहुत अच्छा किया।’ ठहरना अपनी थकान को स्वीकार कर स्वयं को थोड़ा समय देना है। हम इंसान हैं, थकते हैं, भावुक होते हैं, कभी उलझ जाते हैं और कभी जीवन की भीड़ में स्वयं को ही पीछे छोड़ आते हैं।

ऐसे में कुछ पल रुककर अपने भीतर झांकना, अपनी सांसों को महसूस करना और स्वयं को समय देना आवश्यक है।

क्यों जरूरी है जिंदगी की रफ्तार पर ब्रेक लगाना?

हर सफर को मंजिल की जरूरत नहीं होती, कुछ रास्ते सिर्फ ठहरकर जीने के लिए होते हैं। जब एक मां दिनभर की जिम्मेदारियां निभाने के बाद खिड़की के पास बैठती है, हाथों में चाय का प्याला थामे डूबते सूरज को निहारती है और कुछ पल के लिए दुनिया से बेखबर हो जाती है, वह ठहराव है।

जब कोई पिता दिनभर की चिंताओं को दरवाजे के बाहर छोड़कर घर में प्रवेश करता है और अपने बच्चे की मुस्कान में सुकून खोज लेता है, वह भी ठहराव है। सुकून हमेशा बड़ी खुशियों में नहीं मिलता, कभी किसी मासूम मुस्कान में पूरी दुनिया मिल जाती है।

एक विद्यार्थी का खुद से पूछा सवाल भी है ‘ठहराव’

जब कोई विद्यार्थी किताब बंद करके कुछ क्षण अपने सपनों के बारे में सोचता है और स्वयं से पूछता है-“मैं सच में क्या बनना चाहता हूं?”-वह भी ठहराव है।

दौड़ते कदम मंजिल तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन ठहरकर सोचने वाले ही सही मंजिल चुन पाते हैं। ठहराव फिर से संभलना है। ठहराव आगे बढ़ने से पहले स्वयं को समेटना है।

आखिरी बार कब महसूस की थी बारिश की बूंद?

जरा सोचिए, आखिरी बार कब आपने किसी अपने की खामोशी को पढ़ने, बारिश की बूंदों को महसूस करने या बिना किसी वजह के मुस्कुराने की कोशिश की थी?

संगीत हमें यही ठहराव सिखाता है। दो सुरों के बीच का मौन ही उसमें गहराई भरता है, वरना सब कुछ सिर्फ शोर बनकर रह जाता है।

जीवन भी एक ऐसा ही संगीत है, जहां उपलब्धियां सुर हैं, अनुभव लय हैं और ठहराव वह मौन है जो इसे अर्थ देता है। कर्मों के बीच का ठहराव हमें आत्मचिंतन की दृष्टि देता है।

रिश्तों से लेकर प्रकृति तक, हर जगह चाहिए थोड़ा ठहराव

रिश्तों में ठहराव हमें संवाद और समझ का अवसर देता है। प्रकृति में ठहराव हमें उसकी सूक्ष्म सुंदरता देखने की दृष्टि देता है और स्वयं में ठहरना हमें उस अंतर्मन की आवाज तक पहुंचाता है, जिसे जीवन की आपाधापी में हम अक्सर अनसुना कर देते हैं।

विडंबना यह है कि हम जीवन को किसी आने वाले कल के भरोसे जीते रहते हैं। सोचते हैं, जब लक्ष्य मिल जाएगा, तब सुकून से जिएंगे। किंतु वह कल कभी ठहरता नहीं।

जिस ‘कल’ का इंतजार है, वह कभी नहीं ठहरता

वह आता है तो आज बन जाता है और फिर चुपचाप बीते हुए कल का हिस्सा बन जाता है। इसलिए जरूरी है कि जिंदगी की दौड़ में कभी-कभी कदम रोककर खुद से मुलाकात की जाए। ठहरना रुकना नहीं है, बल्कि फिर से सही दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है।

सीमा सिंह, प्राचार्या, संत कैरेंस हाई स्कूल, गोला रोड