हल्दी की पीली आभा और मामा की इमली घोटाई; गांवों में आज भी जीवंत है विवाह की परंपराएं
रोहतास के सूर्यपुरा में ग्रामीण विवाह आज भी सामुदायिक उत्सव हैं। हल्दी रस में महिलाएं पारंपरिक गीतों के साथ वर-वधू को हल्दी लगाती हैं, जो पारिवारिक स् ...और पढ़ें

एक शादी में परंपरा निभाते दूल्हे के मामा। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
हल्दी रस में परिवार और गांव का स्नेह झलकता है।
मामा की इमली रस्म दांपत्य जीवन में मिठास लाती है।
ये रस्में ग्रामीण समाज में परंपरा और सामूहिकता बनाए रखती हैं।
संवाद सूत्र, सूर्यपुरा (रोहतास)। ग्रामीण अंचलों में विवाह केवल दो लोगों का बंधन नहीं, बल्कि पूरे गांव का साझा उत्सव होता है।
आधुनिकता के इस दौर में भी सूर्यपुरा और आसपास के गांवों में शादी से पहले निभाई जाने वाली हल्दी रस और मामा की रस्म आज भी पूरी श्रद्धा, उत्साह और अपनापन के साथ जीवित है।
शादी से एक-दो दिन पहले होने वाली हल्दी रस्म के दौरान घर-आंगन पीली हल्दी की आभा से जगमगा उठता है। महिलाएं और पुरुष अलग-अलग टोलियों में ढोलक, थाली और पारंपरिक लोकगीतों के साथ वर-वधू को हल्दी चढ़ाते हैं।
गीत-संगीत और हंसी-मजाक से माहौल उल्लासपूर्ण हो जाता है। गांव की अनीता देवी बताती हैं कि हल्दी रस में केवल रस्म नहीं, बल्कि पारिवारिक स्नेह और अपनापन झलकता है।
मामा की रहती विशेष भूमिका
विवाह संस्कार में मामा की भूमिका को विशेष महत्व दिया जाता है। परंपरा के अनुसार लड़का और लड़की—दोनों के घर मामा द्वारा इमली घोटाने की रस्म निभाई जाती है।
मामा सिल-बट्टे या पत्थर पर इमली घोटते हैं, जिसे विवाह की बाधाओं को दूर करने और दांपत्य जीवन में मिठास लाने का प्रतीक माना जाता है। चंचल देवी कहती हैं कि आज के समय में भी ये परंपराएं हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती हैं।
स्थानीय बुजुर्ग सियाराम शर्मा बताते हैं कि मामा के हाथों इमली घोटाने की रस्म के बिना विवाह अधूरा माना जाता है। वहीं मुकेश कुमार गुप्ता का कहना है कि इन रस्मों में पूरे गांव की भागीदारी होती है, जिससे शादी एक पारिवारिक नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव बन जाती है।
हल्दी रस और मामा की रस्म यह साबित करती है कि बदलते समय के बावजूद ग्रामीण समाज में परंपरा, रिश्ते और सामूहिकता आज भी उतनी ही मजबूत हैं।