कश्तियां बनीं रोजगार की पतवार, बिहार के सोन की लहरों पर सवार है डेहरी की अर्थव्यवस्था
डेहरी ऑन सोन की सोन नदी अब हजारों लोगों की आजीविका और पर्यटन का केंद्र बन गई है, जहाँ पारंपरिक लकड़ी की नावें स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही हैं ...और पढ़ें

व्यावसायिक नावों के लिए जरूरी है लाइसेंस
HighLights
सोन नदी में लकड़ी की नावें पर्यटन और आजीविका का स्रोत।
पंजीकृत नावें पर्यटकों को लाइफ जैकेट संग सुरक्षित सैर करातीं।
नाव निर्माण से कारीगरों और स्थानीय व्यवसायों को भी लाभ।
संवाद सहयोगी डेहरी आन सोन (रोहतास)। रोहतास के डेहरी ऑन सोन में बहती सोन नदी अब सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं रही, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका और पर्यटन की नई कहानी भी लिख रही है।
एनीकट और झारखंडी मंदिर क्षेत्र में पारंपरिक लकड़ी की नावें आज स्थानीय अर्थव्यवस्था की मजबूत पतवार बन चुकी हैं।
नदी के शांत पानी, मनोरम तटों और प्राकृतिक खूबसूरती का आनंद लेने के लिए सालभर बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इसका सीधा फायदा नाविकों और नाव निर्माण से जुड़े लोगों को मिल रहा है।
यही वजह है कि सोन तट पर पारंपरिक लकड़ी की नावों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
लोहे की नहीं, लकड़ी की नावों पर टिका है भरोसा
जहां देश के कई हिस्सों में लोहे की नावों का इस्तेमाल बढ़ा है, वहीं डेहरी के सोन तट पर आज भी लकड़ी की नावों का ही दबदबा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार लकड़ी की नावें न केवल सुरक्षित और मजबूत होती हैं, बल्कि उनका सफर भी अधिक आरामदायक माना जाता है। यही कारण है कि पर्यटक भी इन्हीं नावों में सैर करना पसंद करते हैं।
सोन नदी के किनारे चलती ये कश्तियां यहां की संस्कृति और परंपरा की पहचान बन चुकी हैं।
10 पंजीकृत नावें संभाल रही हैं पर्यटन की जिम्मेदारी
श्री श्री कृष्ण सेवा समिति घाट के पदाधिकारियों के अनुसार वर्तमान में जिला प्रशासन द्वारा सत्यापित और पंजीकृत 10 नावों का संचालन किया जा रहा है।
सुरक्षा मानकों के तहत प्रत्येक नाव में 10 से 12 यात्रियों को लाइफ जैकेट पहनाकर नदी में चार से छह किलोमीटर तक की सैर कराई जाती है। इसके लिए प्रति व्यक्ति 40 से 50 रुपये किराया लिया जाता है।
नाविकों को प्रतिदिन 400 से 600 रुपये तक की आमदनी हो जाती है, जबकि रिजर्व बुकिंग पर 400 रुपये तक शुल्क लिया जाता है।
झारखंड के कारीगरों के हाथों आकार लेती हैं कश्तियां
इन नावों के निर्माण के पीछे वर्षों की मेहनत और अनुभव छिपा है। झारखंड के जपला निवासी और वर्तमान में डेहरी के शिवगंज में रहने वाले कारीगर भोला शर्मा पिछले दस वर्षों से नाव निर्माण का काम कर रहे हैं।
अब तक वे 50 से अधिक मजबूत और आकर्षक लकड़ी की नावें तैयार कर चुके हैं। उनके मुताबिक एक बड़ी नाव तैयार करने में दो से तीन लाख रुपये तक खर्च आता है।
उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी से तैयार ये नावें कई वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी बनी रहती हैं।
नावों से सिर्फ नाविक नहीं, कई परिवारों का चलता है घर
नौका पर्यटन के विस्तार का फायदा केवल नाव चलाने वालों को ही नहीं मिल रहा है। बढ़ई, सहायक कारीगर और नाव निर्माण से जुड़े अन्य लोगों की आय भी इससे बढ़ी है।
शाम के समय मां लखपति घाट और एनीकट क्षेत्र में जुटने वाली पर्यटकों की भीड़ स्थानीय दुकानदारों और छोटे व्यवसायियों के लिए भी कमाई का जरिया बन रही है।
इस तरह सोन नदी के किनारे पर्यटन और रोजगार एक-दूसरे के पूरक बनते जा रहे हैं।
पर्यटकों को भा रहा सोन तट का सुकून
आरा से आए पर्यटक सूर्याकांत यादव बताते हैं कि डेहरी का प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण उन्हें काफी पसंद आया। उन्होंने कहा कि एनीकट, झारखंडी मंदिर और सूर्य मंदिर जैसे स्थल यहां की खास पहचान हैं।
वहीं आनंद कुमार का कहना है कि सोशल मीडिया पर वीडियो देखने के बाद उन्होंने यहां आने का फैसला किया और यहां की साफ-सफाई तथा प्राकृतिक माहौल ने उन्हें प्रभावित किया।
पर्यटकों का मानना है कि जो लोग सुकून और प्रकृति के बीच कुछ समय बिताना चाहते हैं, उन्हें डेहरी जरूर आना चाहिए।
बाढ़ के दिनों में भी जीवनरेखा बनती हैं नावें
सोन नदी के किनारे बसे लोगों के लिए नावें केवल पर्यटन का साधन नहीं, बल्कि जरूरत के समय जीवन बचाने का माध्यम भी हैं।
बाढ़ के दौरान इन्हीं नावों के जरिए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाता है और किसानों की फसलें भी खेतों से बाहर लाई जाती हैं।
मत्स्यजीवी सहयोग समिति के अनुसार अधिकांश परिवार अपनी निजी नावें तैयार रखते हैं ताकि आपात स्थिति में उनका उपयोग किया जा सके।
व्यावसायिक नावों के लिए जरूरी है लाइसेंस
राजस्व अधिकारियों के अनुसार यात्रियों को ढोने वाली व्यावसायिक नावों के लिए प्रशासन की ओर से लाइसेंस जारी किया जाता है।
मछली पकड़ने या निजी उपयोग में आने वाली नावों के लिए यह व्यवस्था लागू नहीं होती। नियमित रूप से सवारी ढोने वाली नावों का पंजीकरण और सुरक्षा जांच की जाती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।
कहते हैं राजस्व अधिकारी
सवारी ढोने वाली नावों के लिए अलग से लाइसेंस जारी किया जाता है। मछली पकड़ने या अन्य निजी उपयोग, जैसे फल लाने-ले जाने के लिए इस्तेमाल होने वाली नावों के लिए यह लाइसेंस लागू नहीं होता। जो नावें नियमित रूप से व्यवसायिक रूप से यात्रियों का परिवहन करती हैं, उन्हीं का पंजीकरण और गणना कर लाइसेंस दिया जाता है।
तौकीर अहमद, आरओ डेहरी अंचल