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रोहतास के किसानों की महकी किस्मत: धान-गेहूं छोड़ गेंदे की खेती से हो रहे मालामाल, यूपी तक पहुंच रही खुशबू

Published: Wed, 19 Aug 2026 06:30 AM (IST)

रोहतास के काराकाट प्रखंड में किसान पारंपरिक खेती छोड़कर गेंदा फूल की खेती से आत्मनिर्भर बन रहे हैं। इस नई ...और पढ़ें

परंपरा से इतर फूलों की खेती से बदली किसानों की तकदीर, लागत से दोगुना मुनाफा

परंपरा से इतर फूलों की खेती से बदली किसानों की तकदीर, लागत से दोगुना मुनाफा

HighLights

  1. काराकाट के किसान गेंदा फूल की खेती से आत्मनिर्भर।

  2. पारंपरिक खेती से हटकर लागत का दोगुना मुनाफा।

  3. उद्यान विभाग 50% अनुदान दे रहा, आय बढ़ी।

मुक्तिनाथ पांडेय, काराकाट (रोहतास)। पारंपरिक खेती से अलग हटकर नई सोच के साथ की गई शुरुआत किस तरह सकारात्मक बदलाव ला सकती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण रोहतास जिले का कराकाट प्रखंड है। कभी धान-गेहूं की खेती कर सरकारी खरीद या बिचौलियों पर निर्भर रहने वाले किसान अब बाजार की मांग के अनुरूप फूलों की खेती कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

प्रखंड के करूप व सोहदा सहित दर्जनों गांवों के किसान बड़े पैमाने पर गेंदा फूल की खेती कर रहे हैं। यहां उगाए गए फूल बिक्रमगंज, डिहरी व बक्सर के अलावा उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक भेजे जा रहे हैं। किसानों के अनुसार, इस खेती में लागत की तुलना में दो से ढाई गुना तक लाभ मिल रहा है।

साधारण शुरुआत से बढ़ा दायरा:

करूप गांव के किसान जितेंद्र सिंह बताते हैं कि उन्होंने पांच साल पहले महज पांच कट्ठा जमीन से गेंदा फूल की खेती शुरू की थी, जो आज एक बीघा से अधिक में फैल चुकी है। कम लागत में दोगुना फायदा मिलने से उनका हौसला बढ़ा।

जितेंद्र के मुताबिक, प्रति हेक्टेयर 60 से 80 हजार रुपये की लागत आती है, जिससे डेढ़ से दो लाख रुपये तक की आय हो जाती है। फूल की माला बनाकर बेचने पर मुनाफा और बढ़ जाता है। वहीं, सोहदा गांव के प्रमोद कुमार सिंह भी पिछले दो वर्षों से 10 से 15 कट्ठा जमीन पर इसकी सफल खेती कर रहे हैं।

कोलकाता से आते हैं पौधे:

गेंदा फूल के पौधे मुख्य रूप से कोलकाता से मंगाए जाते हैं। प्रति हजार पौधों पर 600 से 1000 रुपये के खर्च के अलावा परिवहन शुल्क लगता है। पौधों की रोपाई सितंबर के पहले सप्ताह से नवंबर के अंतिम सप्ताह तक की जाती है।

मिट्टी में जैविक और गोबर की खाद का संतुलित उपयोग करने से पैदावार बेहतर होती है। रोपाई के 60 से 70 दिनों बाद पौधों में फूल आने लगते हैं, जो अगले 90 से 100 दिनों तक निरंतर बने रहते हैं। अफ्रीकन प्रजाति से प्रति हेक्टेयर 15-16 टन व हाइब्रिड लाल गेंदा से 10-12 टन तक उत्पादन होता है।

शाम को तोड़े गए फूलों से रात में माला तैयार की जाती है और सुबह-सुबह डिहरी व बिक्रमगंज की मंडियों में भेज दिया जाता है। वैवाहिक आयोजनों, पूजा-पाठ और सजावट में गेंदा फूल की बढ़ती मांग के कारण अब व्यापारी सीधे खेतों तक पहुंच रहे हैं।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. रमाकांत कुमार के अनुसार, पारंपरिक खाद्य फसलों की तुलना में फूलों की खेती अधिक लाभकारी है और इसका मुख्य उद्देश्य राज्य में पुष्प उत्पादन को बढ़ावा देना है।

क्या कहते हैं अधिकारी?

उद्यान विभाग की राज्य स्कीम गेंदा फूल विकास योजना के तहत इच्छुक किसानों को 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। इसके लिए किसानों को कृषि ऐप के माध्यम से आनलाइन आवेदन करना होता है। प्रति इकाई लागत करीब 80 हजार रुपये तय की गई है। - रविकांत कुमार, प्रखंड उद्यान पदाधिकारी, काराकाट