दादा के खेतों की महक अब यादों में, रोहतास में सिमट रही सोनाचूर धान की खेती, 15 हजार तक पहुंची कीमत
रोहतास में कभी अपनी खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर सोनाचूर धान की खेती तेजी से घट रही है, जिससे इसका रकबा 11 हजार से घटकर 600 हेक्टेयर रह गया है। ...और पढ़ें

सोनाचूर धान पर महंगाई का असर। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
सोनाचूर धान की खेती 11 हजार से 600 हेक्टेयर तक सिमटी।
बढ़ती लागत, रोग और कम उत्पादन से किसान दूरी बना रहे।
बाजार में सोनाचूर चावल की कीमत 15 हजार रुपये प्रति क्विंटल।
सुरेंद्र तिवारी, करगहर (रोहतास)। कभी अपनी सुगंध और स्वाद के लिए देशभर में पहचान रखने वाला रोहतास का प्रसिद्ध सोनाचूर धान अब धीरे-धीरे खेतों से गायब होता जा रहा है।
धान का कटोरा कहे जाने वाले रोहतास जिले में एक समय हजारों हेक्टेयर में होने वाली सोनाचूर की खेती अब सिमटकर कुछ सौ हेक्टेयर तक रह गई है।
खेती की बढ़ती लागत, रोगों का खतरा, कम उत्पादन और मौसम की मार के कारण किसान इससे दूरी बना रहे हैं। दूसरी ओर उत्पादन घटने से बाजार में सोनाचूर चावल की कीमत लगातार बढ़ रही है।
कभी 11 हजार हेक्टेयर, अब सिर्फ 600 हेक्टेयर
कृषि विभाग के अनुसार वर्ष 2024-25 में जिले में केवल 600 हेक्टेयर क्षेत्र में सोनाचूर धान की खेती हुई। जबकि पहले पारंपरिक रूप से इसकी खेती लगभग 11 हजार हेक्टेयर में होती थी।
यह जिले के कुल धान क्षेत्र का करीब 20 प्रतिशत माना जाता था। विभाग के पास वर्ष 2024 से पहले का विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन किसानों का कहना है कि पिछले दो दशकों में इसका रकबा लगातार घटा है।
स्वाद और खुशबू से बनी थी अलग पहचान
सोनाचूर धान अपनी प्राकृतिक सुगंध, पतले दाने और बेहतरीन स्वाद के लिए जाना जाता है। स्थानीय किसान इसे कभी अपनी सबसे भरोसेमंद नकदी फसल मानते थे।
अच्छी मांग और बेहतर कीमत मिलने के कारण इसे किसानों का 'एटीएम' भी कहा जाता था। एक हेक्टेयर में इसकी औसत उपज 30 से 35 क्विंटल तक होती है।
हालांकि आधुनिक हाईब्रिड किस्मों की तुलना में उत्पादन कम होने के कारण किसान अब दूसरी किस्मों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पहले कम खाद, ज्यादा स्वाद
करगहर के वयोवृद्ध किसान कामेश्वर तिवारी बताते हैं कि 1980 के दशक से पहले सीता, मंसूरी, क्वारी, कतिका, संजीरा, सोनाचूर और टैचून जैसी पारंपरिक धान की किस्मों की खेती होती थी।
उस समय रासायनिक खाद का प्रयोग बहुत कम और गोबर की सड़ी खाद का उपयोग अधिक होता था। इसी कारण चावल में प्राकृतिक मिठास और खुशबू बनी रहती थी।
उनका कहना है कि अब रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन चावल का स्वाद और सुगंध पहले जैसी नहीं रही।
किसान क्यों छोड़ रहे हैं सोनाचूर?
किसान बलिराम राय, मुराली राय और पप्पू दुबे बताते हैं कि सोनाचूर की खेती जोखिम भरी होती है। इस फसल में रोग लगने की संभावना अधिक रहती है।
पौधे लंबे होने के कारण तेज हवा और बारिश में गिर जाते हैं, जिससे पैदावार प्रभावित होती है। इसके अलावा कटाई और कुटाई की प्रक्रिया भी अन्य किस्मों की तुलना में अधिक कठिन होती है। यही वजह है कि अधिकांश किसान अब इसकी खेती से बच रहे हैं।
दूसरे जिलों से मंगाना पड़ रहा चावल
रोहतास के चावल व्यवसायी कृष्णा साह बताते हैं कि जिले में उत्पादन कम होने के कारण अब सोनाचूर चावल की मांग पूरी करने के लिए अन्य जिलों से इसकी खरीद करनी पड़ रही है।
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मांग बढ़ने और उत्पादन घटने के कारण पिछले वर्ष जहां सोनाचूर चावल की कीमत 13 हजार रुपये प्रति क्विंटल थी, वहीं इस वर्ष बढ़कर 15 हजार रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई है।
विभिन्न चावलों की मौजूदा कीमत (प्रति क्विंटल)
- सोनाचूर – ₹15,000
- बासमती – ₹12,000
- सोनम – ₹6,500
- कतरनी (नया अरवा) – ₹4,400
- चिंटुआ कतरनी – ₹5,000
- कतरनी (पुराना अरवा) – ₹4,500
- कतरनी उसना – ₹5,500
- कतरनी स्टीम – ₹5,600
- सोनम स्टीम – ₹6,500
- सोनम उसना – ₹6,500
- कोलम अरवा – ₹6,500
- दाना चावल – ₹4,000
GI टैग से जुड़ी हैं उम्मीदें
बिहार सरकार सोनाचूर धान को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए जीआई (Geographical Indication) टैग दिलाने की दिशा में काम कर रही है।
इसके साथ ही किसानों को इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित करने की योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को बेहतर तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज और उचित बाजार उपलब्ध कराया जाए तो सोनाचूर धान की खोई पहचान फिर से लौट सकती है।