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विलुप्त होने के कगार पर नेचर के 'सफाईकर्मी', रोहतास में सड़ते शवों से बढ़ा बीमारियों का खतरा

Published: Wed, 07 Oct 2026 03:14 PM (IST)

रोहतास में गिद्धों की घटती संख्या से गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा हो गया है, जिससे मृत पशुओं के सड़ने से दुर्गंध और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।

गिद्ध लगातार विलुप्त हो रहे हैं। फोटो जागरण

 गिद्ध लगातार विलुप्त हो रहे हैं। फोटो जागरण

HighLights

  1. रोहतास में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट।

  2. मृत पशुओं के सड़ने से दुर्गंध और बीमारी का खतरा।

  3. डाइक्लोफेनाक दवा गिद्धों के विलुप्त होने का मुख्य कारण।

मुक्तिनाथ पांडेय, काराकाट (रोहतास)। वन विभाग विश्व वन्यजीव सप्ताह मनाकर लोगों को जागरूक करने में जुटा है, लेकिन प्रकृति के सफाईकर्मी गिद्ध लगातार विलुप्त हो रहे हैं।

गिद्धों की घटती संख्या ने प्रखंड और आसपास के क्षेत्रों में गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा कर दिया है। गिद्धों के गायब होने से नहरों और जलाशयों के किनारे पड़े मृत पशु सड़ रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में दुर्गंध और बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

खुले में छोड़ दिए जा रहे मवेशियों के शव

स्थानीय मुखिया अफरोज आलम, सेवानिवृत्त शिक्षक चंद्रदीप पांडेय और रामदयाल सिंह बताते हैं कि यह कृषि प्रधान क्षेत्र है, जहां बड़े पैमाने पर पशुपालन होता है। 1990 के दशक तक ताड़ के पेड़ों पर गिद्धों के बड़े झुंड नजर आते थे।

किसी पशु की मौत होते ही गिद्ध कुछ ही देर में उसका मांस खाकर केवल कंकाल छोड़ देते थे, जिससे वातावरण स्वच्छ रहता था। लेकिन आज इनकी अनुपस्थिति में मृत मवेशियों को खुले मैदानों या नहर के किनारों पर फेंक दिया जाता है।

ग्रामीणों और विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते गिद्धों का संरक्षण नहीं किया गया, तो पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। खुले में सड़ते पशुओं की बदबू और प्रदूषित हवा से स्थानीय लोगों का जीना दूभर हो रहा है, जिसके लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक है।

क्यों गायब हुए गिद्ध

गिद्धों के गायब होने के कारणों पर चिड़िया घर पटना से सेवानिवृत्त गोरखनाथ पांडेय और वाराणसी से सेवानिवृत्त अधिकारी श्याम मोहन मिश्र का कहना है कि गिद्ध को पर्यावरण का अपघटक माना जाता है।

गिद्धों में दूर तक देखने की क्षमता होती है। तीन प्रजातियों में राजगिद्ध जोड़ा बांधकर रहता है, सामान्य गिद्ध समूह में होता है, और गोबर गिद्ध चिल्ह जैसा दिखता है। ये सड़े गले मांस को भक्षण कर मानव का उपकार करते हैं।

शहरीकरण, कटते पेड़-पौधे और पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दर्दनिवारक दवा डाइक्लोफेनाक गिद्धों की मौत का मुख्य कारण बनी। इस दवा से प्रभावित मांस खाने के कारण गिद्धों की किडनियां खराब हो गईं, जिससे इनकी संख्या घटती गई। हालांकि, अब सरकार ने इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया है। -विनय कुमार, आरओएफ, बिक्रमगंज

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