Vetiver Farming: कोसी की बंजर जमीन पर उग रहा हरा सोना, 70 हजार की लागत में तीन लाख तक कमाई
कोसी क्षेत्र की बंजर और जलजमाव वाली जमीन पर अब खस की खेती शुरू हो गई है, जिससे किसानों को कम लागत में लाखों का मुनाफा हो रहा है। सहरसा के 22 किसानों न ...और पढ़ें

सहरसा में खस की खेती का प्रयोग सफल, सुगंधित तेल से किसानों को मिलेगा बड़ा मुनाफा
HighLights
बंजर कोसी भूमि पर खस की खेती शुरू।
70 हजार लागत पर 3 लाख तक मुनाफा।
खस तेल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग।
संवाद सूत्र, सत्तरकटैया (सहरसा)। कोसी क्षेत्र की बंजर, परती और जलजमाव वाली जमीन अब किसानों के लिए कमाई का नया जरिया बनने जा रही है। जिस खस (वेटीवर) की जड़ों से निकलने वाला सुगंधित तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में हजारों रुपये प्रति लीटर की कीमत पर बिकता है, उसकी खेती अब सहरसा जिले में शुरू हो चुकी है। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) अगवानपुर की पहल और वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में जिले के किसानों ने इस नई नकदी फसल को अपनाया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कोसी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां खस की खेती के लिए अनुकूल हैं। यही कारण है कि इसे क्षेत्र के किसानों के लिए भविष्य की लाभदायक फसल के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में किसान इसकी खेती की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
कम लागत में अधिक मुनाफे का दावा
खस की खेती को लेकर किसानों में उत्साह का सबसे बड़ा कारण इसकी आय क्षमता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार प्रति एकड़ लगभग 70 हजार रुपये की लागत से इसकी खेती की जा सकती है। फसल तैयार होने के बाद किसान दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ अर्जित कर सकते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि खस की मांग देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी लगातार बनी रहती है। इसकी जड़ों से निकलने वाला तेल इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, अरोमा उत्पाद और औषधीय सामग्री के निर्माण में उपयोग किया जाता है। यही वजह है कि बाजार में इसकी कीमत अन्य कई फसलों की तुलना में अधिक रहती है।
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22 किसानों ने 10 एकड़ में शुरू की खेती
सहरसा जिले के कहरा प्रखंड अंतर्गत बरेटा गांव इस समय खस की खेती को लेकर चर्चा में है। यहां 22 किसानों ने लगभग 10 एकड़ भूमि पर खस की खेती शुरू की है। यह परियोजना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत अटारी, पटना के वित्तीय सहयोग से संचालित की जा रही है।
किसानों को तकनीकी जानकारी, पौध सामग्री और प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। परियोजना के तहत बरेटा गांव में लगभग 7.72 लाख रुपये की लागत से खस प्रसंस्करण संयंत्र भी स्थापित किया गया है। इससे किसानों को अपनी उपज के प्रसंस्करण के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा और उन्हें बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी।
बाढ़ और जलजमाव वाली जमीन बनेगी आय का स्रोत
कोसी क्षेत्र लंबे समय से बाढ़, कटाव और जलजमाव की समस्या से जूझता रहा है। इसके कारण बड़ी मात्रा में भूमि खेती योग्य नहीं रह जाती या पारंपरिक फसलों के लिए उपयुक्त नहीं होती। ऐसे में खस की खेती किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार खस ऐसी परिस्थितियों में भी अच्छी तरह विकसित हो सकती है जहां सामान्य फसलों का उत्पादन मुश्किल होता है। इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना की शुरुआत की गई है। इसका उद्देश्य उन भूमि क्षेत्रों को भी आर्थिक रूप से उपयोगी बनाना है, जो वर्षों से अनुपयोगी पड़े हुए हैं।
जड़ों से निकलता है कीमती तेल
खस की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जड़ें हैं। इन्हीं जड़ों से सुगंधित तेल निकाला जाता है, जिसकी देश और विदेश में काफी मांग है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 18 से 20 क्विंटल जड़ प्राप्त हो सकती है। इससे 22 से 25 किलोग्राम तक सुगंधित तेल मिलने की संभावना रहती है।
केवल तेल ही नहीं, बल्कि खस के अन्य हिस्सों का भी उपयोग किया जाता है। इसके तनों से चटाई, सजावटी सामग्री, हस्तशिल्प उत्पाद और घरेलू उपयोग की कई वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इससे किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा होते हैं।
12 से 18 महीने में तैयार होती है फसल
खस की खेती का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इसमें अपेक्षाकृत कम देखरेख की जरूरत होती है। यह फसल लगभग 12 से 18 महीने में तैयार हो जाती है। फसल तैयार होने के बाद किसान इसकी जड़ों की खुदाई कर प्रसंस्करण के लिए भेज सकते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि खस की जड़ों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यदि बाजार में कीमत कम हो तो किसान बेहतर मूल्य मिलने तक इसे संग्रहित कर सकते हैं। इसके संरक्षण में अधिक खर्च भी नहीं आता और गुणवत्ता पर भी ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता।
किसानों का बढ़ रहा रुझान
पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और घटती आमदनी के कारण किसान अब वैकल्पिक फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। खस की खेती को कम जोखिम वाली फसल माना जा रहा है।
बाजार में इसकी स्थायी मांग और बेहतर मूल्य मिलने की संभावना किसानों को आकर्षित कर रही है। साथ ही यह फसल जलवायु संबंधी चुनौतियों से भी अपेक्षाकृत कम प्रभावित होती है। यही वजह है कि क्षेत्र के कई किसान अब इसके बारे में जानकारी लेने और खेती शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं।
आय बढ़ाने के साथ पर्यावरण को भी फायदा
कृषि विज्ञान केंद्र अगवानपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. पंकज कुमार राय ने बताया कि खस एक बहुउपयोगी औषधीय एवं सुगंधित पौधा है। इसकी खेती विशेष रूप से उन क्षेत्रों में प्रोत्साहित की जा रही है, जहां भूमि की उत्पादकता कम है या वह लंबे समय से अनुपयोगी पड़ी है।
उन्होंने बताया कि खस की गहरी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करती हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। डॉ. राय के अनुसार खस की खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ भूमि संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
उन्होंने कहा कि कोसी क्षेत्र की बंजर और परती जमीन को आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने में खस की खेती मील का पत्थर साबित हो सकती है। आने वाले समय में यह फसल किसानों की समृद्धि और आत्मनिर्भरता का नया आधार बन सकती है।