VIDEO: मां चली गई तो गांव ने भी मुंह मोड़ा, छपरा में मुखाग्नि देने वाली 2 बेटियों को सता रही श्राद्ध कर्म की चिंता
Bihar News: सारण के मढ़ौरा के जवईनियां गांव में गरीबी ने सामाजिक संवेदनहीनता उजागर की। मां बबीता देवी के निधन के बाद बेटियों को अंतिम संस्कार के लिए क ...और पढ़ें
HighLights
मढ़ौरा में मां के अंतिम संस्कार को बेटियों ने दिया कंधा।
गरीबी के कारण समाज ने परिवार से मुंह मोड़ा।
बेटियां अब मां के श्राद्ध के लिए मदद मांग रहीं।
बिपिन मिश्रा, मढ़ौरा (सारण)। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक असहज और झकझोर देने वाला सवाल है।
क्या गरीबी इंसान को इतना अकेला कर देती है कि उसकी मौत पर भी कोई साथ देने नहीं आता? मढ़ौरा प्रखंड के जवईनियां गांव की यह घटना सामाजिक संवेदनहीनता की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जिस पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहा था परिवार
गांव निवासी स्वर्गीय रविन्द्र सिंह की पत्नी बबीता देवी का 20 जनवरी को पटना में इलाज के दौरान निधन हो गया। इससे करीब डेढ़ वर्ष पहले परिवार के मुखिया रविन्द्र सिंह का भी देहांत हो चुका था।
पिता की मौत के बाद से ही परिवार आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा था। किसी तरह उस समय क्रिया-कर्म संपन्न हो गया, लेकिन मां के जाने के बाद दोनों बेटियां पूरी तरह टूट गईं।
अंतिम संस्कार का दृश्य गांव की सामूहिक जिम्मेदारी पर गहरा सवाल छोड़ गया। मां का शव घंटों घर के दरवाजे पर पड़ा रहा, लेकिन कंधा देने के लिए कोई आगे नहीं आया।
हाथ जोड़कर करती रही विनती, कोई नहीं आया आगे
दोनों बेटियां गांव की गलियों में दर-दर हाथ जोड़ती रहीं, लोगों से विनती करती रहीं, पर संवेदनाएं जैसे पत्थर बन चुकी थीं। काफी देर बाद दो-तीन लोग किसी तरह पहुंचे, तब जाकर चार कंधों पर अर्थी उठ सकी और अंतिम संस्कार संभव हो पाया।
मां को मुखाग्नि देने वाली बेटी मौसम सिंह बताती हैं कि इलाज में जो थोड़े-बहुत पैसे थे, वे पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। अब हालात ऐसे हैं कि रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।
सबसे बड़ी चिंता मां के श्राद्ध संस्कार को लेकर है, जिसके लिए न तो आर्थिक सामर्थ्य है और न ही सहयोग देने वाला कोई अपना। इसी कारण दाह संस्कार के बाद अब तक क्रिया भी नहीं उठाई जा सकी है।
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अब श्राद्ध की चिंता सता रही बेटियाें को
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार आज भी समाज बेटियों द्वारा श्राद्ध और क्रिया-कर्म को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता। ऐसे में दोनों बहनें परंपरा और मजबूरी के बीच फंसी हुई हैं।
उनका समाज और रिश्तेदारों से बस इतना ही आग्रह है कि कोई आगे आकर मां के श्राद्ध संस्कार में सहयोग कर दे, ताकि उसकी आत्मा को शांति मिल सके।
यह घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है, जहां गरीब की पीड़ा अक्सर अनदेखी रह जाती है।
सवाल यही है कि जब बेटियां मां को कंधा दे सकती हैं और मुखाग्नि दे सकती हैं, तो क्या समाज उनके दुख में थोड़ा सा कंधा देने की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता?