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    सारण में दम तोड़ रही सिंचाई व्यवस्था, गड़खा में 25 में से 16 सरकारी ट्यूबवेल बंद; डीजल पंप के भरोसे किसान

    Updated: Fri, 03 Jul 2026 12:20 PM (IST)

    गड़खा प्रखंड में सिंचाई व्यवस्था चरमरा गई है, जहां नहरों में पानी नहीं और 25 में से 16 सरकारी ट्यूबवेल बंद पड़े हैं। किसान महंगे डीजल पंपों पर निर्भर ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. गड़खा में 25 में से 16 सरकारी ट्यूबवेल बंद।

    2. नहरों में पानी नहीं, किसान डीजल पंप पर निर्भर।

    3. खेती की लागत बढ़ी, खरीफ बुआई प्रभावित होने की आशंका।

    पवन सिंह, गड़खा (सारण)। खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही गड़खा प्रखंड में सिंचाई व्यवस्था की खामियां उजागर होने लगी हैं। खेतों की तैयारी पूरी होने और किसानों के बुआई के लिए तैयार रहने के बावजूद पानी की कमी बड़ी समस्या बन गई है। 

    नहरों में जलापूर्ति नहीं होने और अधिकांश सरकारी ट्यूबवेलों के बंद रहने से किसान निजी बोरिंग और डीजल चालित पंपसेट के सहारे खेती करने को मजबूर हैं। इससे खेती की लागत में लगातार वृद्धि हो रही है और समय पर बुआई प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

    नहरों और उपनहरों में लंबे समय से पानी नहीं पहुंचा

    प्रखंड के विभिन्न इलाकों से होकर गुजरने वाली मुख्य नहरों और उपनहरों में लंबे समय से पानी नहीं पहुंचा है। भैंसवारा-पिरौना मुख्य नहर के अलावा सरगट्टी, सैदसराय, सहोसराय, ठिकहां, मरीचा, फुर्सतपुर, जानकीनगर और हकमा क्षेत्र की उपनहरें भी सूखी पड़ी हैं। 

    जिन नहरों के पानी से कभी सैकड़ों किसानों की खेती सिंचित होती थी, वहां अब सिल्ट जमा है और कई स्थानों पर जल प्रवाह पूरी तरह बाधित हो चुका है।

    कम खर्च में सिंचाई हो जाती थी

    किसानों का कहना है कि पहले नहरों के जरिए कम खर्च में सिंचाई हो जाती थी और दो फसलें लेना आसान था। अब सिंचाई के लिए डीजल, बिजली और निजी बोरिंग पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे खेती महंगी होती जा रही है। इसका सबसे अधिक असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रहा है, जिनके पास निजी सिंचाई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

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    सिंचाई संकट को सरकारी ट्यूबवेलों की खराब स्थिति और गंभीर बना रही है। प्रखंड कृषि कार्यालय के अनुसार गड़खा की 23 पंचायतों में 9,595.65 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। इसके लिए 25 सरकारी ट्यूबवेल स्थापित हैं, लेकिन इनमें से 16 बंद पड़े हैं और केवल 9 ही चालू अवस्था में हैं। ऐसे में हजारों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई सीमित संसाधनों के भरोसे रह गई है।

    जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं 

    ग्रामीणों का आरोप है कि नहरों के पक्कीकरण और मरम्मत पर समय-समय पर राशि खर्च की गई, लेकिन जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं होने से किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है। कई नहरों की नियमित सफाई नहीं होने से उनमें सिल्ट भर गया है, जिससे पानी का प्रवाह बाधित हो रहा है। 

    किसानों ने प्रशासन से नहरों में शीघ्र जलापूर्ति बहाल करने, बंद पड़े ट्यूबवेलों को चालू कराने और सिंचाई व्यवस्था की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि समय पर पानी उपलब्ध होने से खेती की लागत कम होगी और उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

    प्रखंड कृषि पदाधिकारी हिमांशु कुमार ने बताया कि प्रखंड में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप कार्य किया जा रहा है। बंद ट्यूबवेलों की स्थिति से संबंधित जानकारी विभाग को उपलब्ध कराई गई है।

    प्रमुख समस्याएं

    • अधिकांश नहरों में जलापूर्ति बंद, खेतों तक नहीं पहुंच रहा पानी।
    • कई उपनहरों में सिल्ट जमा होने से जल प्रवाह बाधित।
    • 25 में से 16 सरकारी ट्यूबवेल बंद।
    • किसानों की निजी बोरिंग और डीजल पंप पर बढ़ी निर्भरता।
    • सिंचाई खर्च बढ़ने से खेती की लागत में वृद्धि।
    • खरीफ फसलों की समय पर बुआई प्रभावित होने की आशंका।
    • छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित।

    किसानों की प्रमुख मांगें

    • नहरों में तत्काल जलापूर्ति शुरू की जाए।
    • बंद पड़े 16 सरकारी ट्यूबवेलों को जल्द चालू किया जाए।
    • नहरों की नियमित सफाई और सिल्ट हटाने की व्यवस्था हो।
    • सिंचाई व्यवस्था की सतत निगरानी सुनिश्चित की जाए।
    • किसानों को सस्ती और सुगम सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

    आंकड़ों में सिंचाई संकट

    • कुल पंचायतें - 23
    • कृषि योग्य भूमि - 9,595.65 हेक्टेयर
    • सरकारी ट्यूबवेल - 25
    • चालू ट्यूबवेल - 9
    • बंद ट्यूबवेल - 16
    • बंद ट्यूबवेल का प्रतिशत - 64%
    • चालू ट्यूबवेल का प्रतिशत - 36%