सुबह 4:56 से शुरू होगा होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, चंद्र ग्रहण का भी रहेगा प्रभाव; नोट करें टाइम
छपरा में होली और होलिका दहन (Holi And Holika Dahan 2026) को लेकर उत्साह चरम पर है। इस वर्ष होलिका दहन 3 मार्च को सुबह 4:56 से 6:14 बजे तक शुभ मुहूर्त ...और पढ़ें

सुबह 4:56 से शुरू होगा होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, चंद्र ग्रहण का भी रहेगा प्रभाव

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जागरण संवाददाता, छपरा। उल्लास, उमंग और हंसी-ठिठोली का पर्व होली को लेकर शहर और गांवों में उत्साह चरम पर है। होली के मद्देनजर बाजारों में भीड़ उमड़ने लगी है और रंग-अबीर, गुलाल व पिचकारी की खरीदारी तेज हो गई है। वहीं मोहल्लों में युवाओं ने होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। इस वर्ष होली चार मार्च को मनाई जाएगी, जबकि होलिका दहन तीन मार्च को किया जाएगा।
सुबह 4:56 से शुरू होगा होलिका दहन का शुभ मुहूर्त:
ज्योतिषाचार्य पंडित संपत कुमार मिश्र ने बताया कि फाल्गुन पूर्णिमा के अवसर पर भद्रा रहित मुहूर्त में होलिका दहन किया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन का शुभ मुहूर्त तीन मार्च की सुबह 4 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 6 बजकर 14 मिनट तक रहेगा।
उन्होंने बताया कि फाल्गुन पूर्णिमा तीन मार्च की शाम 5 बजकर 18 मिनट से प्रारंभ हो रही है, जबकि भद्रा का समय शाम 5 बजकर 19 मिनट से शुरू होकर अगले दिन सुबह 4 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन का शुभ मुहूर्त प्राप्त होगा।
युवाओं ने मोहल्लों में शुरू की तैयारियां:
शहर के विभिन्न मोहल्लों में होलिका दहन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। दहियांवा,गुदरी बाजार,सरकारी बाजार समेत कई इलाकों में युवाओं ने लकड़ी और अन्य सामग्री एकत्र कर ली है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि परंपरा के अनुसार मोहल्लों में सामूहिक रूप से होलिका दहन किया जाता है और इसके बाद लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।
चंद्र ग्रहण का भी रहेगा प्रभाव:
पंडितों के अनुसार इस वर्ष तीन मार्च को चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है। यह ग्रहण शाम पांच बजकर 46 मिनट से शुरू होकर छह बजकर 48 मिनट तक रहेगा। हालांकि, इसका होलिका दहन के शुभ मुहूर्त पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि दहन का मुहूर्त भद्रा समाप्त होने के बाद सुबह में है।
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बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है होलिका दहन:
पंडित अनीत शुक्ल ने बताया कि होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार असुर राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। उसने भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठकर उसे जलाने का प्रयास किया, लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका स्वयं अग्नि में भस्म हो गई। तभी से इस घटना की स्मृति में होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।
अग्नि की परिक्रमा कर मांगी जाती है सुख-समृद्धि:
धार्मिक मान्यता के अनुसार होलिका दहन के समय लोग अग्नि की परिक्रमा कर अपने जीवन के दुख, रोग और नकारात्मकता के नाश की कामना करते हैं। इसके साथ ही घर-परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की प्रार्थना की जाती है। होलिका दहन के अगले दिन रंगों का त्योहार होली धूमधाम से मनाया जाएगा।