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    राशन कार्ड की राह में रोड़ा बना जातीय प्रमाणपत्र, मायके के चक्कर लगाने को मजबूर महिलाएं

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 06:30 AM (IST)

    सारण जिले में राशन कार्ड बनवाने में विवाहित महिलाओं को जातीय प्रमाणपत्र के लिए मायके जाना पड़ रहा है, जिससे समय और पैसे की बर्बादी हो रही है। इस समस्य ...और पढ़ें

    राशन कार्ड के लिए जातीय प्रमाणपत्र की अनिवार्यता बनी विवाहित महिलाओं की परेशानी

    राशन कार्ड के लिए जातीय प्रमाणपत्र की अनिवार्यता बनी विवाहित महिलाओं की परेशानी

    HighLights

    1. विवाहित महिलाओं को जातीय प्रमाणपत्र के लिए मायके जाना पड़ रहा है।

    2. हजारों राशन कार्ड आवेदन जातीय प्रमाणपत्र के कारण लंबित पड़े हैं।

    3. जिला प्रशासन पात्र लाभुकों को हर संभव सहायता का आश्वासन दे रहा।

    जाकिर अली, छपरा। सारण जिले में राशन कार्ड बनाने के विशेष अभियान के दौरान विवाहित महिलाओं के सामने सबसे बड़ी बाधा जातीय प्रमाणपत्र बनकर उभरी है।

    राशन कार्ड के लिए आय और आवासीय प्रमाणपत्र स्थानीय स्तर पर आसानी से बन जा रहे हैं, लेकिन जातीय प्रमाणपत्र मायके से बनवाने की अनिवार्यता के कारण महिलाओं को बार-बार दूसरे प्रखंडों और गांवों का चक्कर लगाना पड़ रहा है। इससे समय और पैसे दोनों की अतिरिक्त लागत बढ़ रही है।

    जिला प्रशासन के अभियान के तहत आवेदन तेजी से मिल रहे हैं, लेकिन दस्तावेजों की इस समस्या के कारण कई पात्र परिवारों के आवेदन लंबित होने की आशंका बनी हुई है। अबतक सत्यापन के लिए लंबित 5,602 आवेदन में से करीब पांच हजार आवेदन महिला के मायके से जाति प्रमाण पत्र के चक्कर में अटका है।

    जिले में 13 अगस्त तक 49,455 नए राशन कार्ड बनाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 2 अगस्त तक ही 57,549 आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। इनमें 52,007 आवेदनों का सत्यापन भी पूरा कर लिया गया है। अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अधूरे दस्तावेजों वाले आवेदनों को पूर्ण कर समय पर राशन कार्ड उपलब्ध कराना है।

    छपरा शहर के इमली मोहल्ला निवासी कौशर खातून का कहना है कि उनका मायका मढ़ौरा में है, लेकिन वहां अब परिवार का कोई सदस्य नहीं रहता। इसके बावजूद जातीय प्रमाणपत्र बनवाने के लिए उन्हें बार-बार मढ़ौरा जाना पड़ रहा है। बहुत ही मुश्किल हो रहा है। आने-जाने में समय और पैसे दोनों खर्च हो रहे हैं।

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    छपरा के रूपगंज निवासी निर्मला देवी ने आय और आवासीय प्रमाणपत्र सदर प्रखंड से बनवा लिया है, लेकिन जातीय प्रमाणपत्र के लिए उन्हें मायके जाना पड़ रहा है। उनका कहना है कि यदि यह प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर पूरी हो जाती तो काफी राहत मिलती।

    करीमचक निवासी बिजली मिस्त्री मो. सलमान ने बताया कि उनकी पत्नी का मायका एकमा में है। जातीय प्रमाणपत्र के लिए बार-बार वहां जाना पड़ रहा है। मजदूरी छोड़कर कार्यालयों के चक्कर लगाने से आमदनी पर भी असर पड़ रहा है।

    इसी तरह अजीत कुमार अपनी पत्नी का नाम राशन कार्ड में जुड़वाने के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र बनवा रहे हैं, जबकि रूपगंज की सरिता कुमारी के परिवार को भी इसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनके पति ठेला चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। ऐसे में दूसरे प्रखंड जाकर प्रमाणपत्र बनवाना आर्थिक रूप से भी भारी पड़ रहा है।

    जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव के निर्देश पर अभियान मिशन मोड में चलाया जा रहा है। विकास मित्रों, पंचायत प्रतिनिधियों और विभिन्न विभागों के कर्मियों को छूटे हुए पात्र परिवारों तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई है। दस्तावेजों की कमी वाले मामलों में बीडीओ को आरटीपीएस के माध्यम से आय, आवासीय सहित अन्य आवश्यक प्रमाणपत्र बनवाने का निर्देश भी दिया गया है।

    एसडीएम नितेश कुमार ने बताया कि निर्धारित लक्ष्य से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं और उनका तेजी से सत्यापन कराया जा रहा है। जिन मामलों में दस्तावेजों की समस्या सामने आ रही है, उनके समाधान के लिए प्रशासन सक्रिय है। उन्होंने कहा कि पात्र लाभुकों को नियमानुसार हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि कोई भी पात्र परिवार राशन कार्ड के लाभ से वंचित न रहे।

    अभियान एक नजर में

    • राशन कार्ड बनाने का लक्ष्य (13 अगस्त तक): 49,455
    • 2 अगस्त तक प्राप्त आवेदन: 57,549
    • 2 अगस्त तक सत्यापित आवेदन: 52,007
    • सत्यापन के लिए लंबित आवेदन: 5,602
    • 31 जुलाई को एक दिन में प्राप्त आवेदन: 6,211
    • 1 अगस्त को प्राप्त आवेदन: 2,318
    • 2 अगस्त को प्राप्त आवेदन: 726

    महिलाओं की प्रमुख परेशानियां

    • जातीय प्रमाणपत्र के लिए मायके जाना अनिवार्य।
    • दूसरे प्रखंडों व जिले के लगातार चक्कर से समय और धन की बर्बादी।
    • दैनिक मजदूरी करने वाले परिवारों की आय पर असर।
    • दस्तावेज पूरे नहीं होने से राशन कार्ड बनने में देरी की आशंका।