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    'तिरंगा फहराकर लौटेंगे या अमर हो जाएंगे...', आजादी के 84 साल बाद भी जिंदा है सारण के वीर की शहादत

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 02:22 PM (IST)

    1942 में पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराते हुए शहीद हुए राजेंद्र सिंह की कहानी नयागांव में आज भी एक विरासत है। उनका बलिदान परिवार और गांव की पहचान है, जिस ...और पढ़ें

    नयागांव के बनवारीचक स्थित बलिदानी राजेंद्र सिंह का पुश्तैनी घर और उनकी प्रतिमा। जागरण

    नयागांव के बनवारीचक स्थित बलिदानी राजेंद्र सिंह का पुश्तैनी घर और उनकी प्रतिमा। जागरण

    HighLights

    1. राजेंद्र सिंह ने 1942 में पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराया।

    2. उनका बलिदान नयागांव परिवार की सबसे बड़ी विरासत है।

    3. गांव में उनकी प्रतिमा स्थापित, हर वर्ष श्रद्धांजलि अर्पित।

    राहुल, नयागांव (सारण)। हर परिवार अपनी अगली पीढ़ी को कोई न कोई विरासत सौंपता है। कहीं खेत-खलिहान, कहीं मकान और कहीं कारोबार की विरासत सौंपी जाती है। 

    सोनपुर प्रखंड के नयागांव के बनवारीचक में एक परिवार ऐसा भी है, जिसकी सबसे बड़ी विरासत एक अमर बलिदान की कहानी है। यह कहानी है 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर बलिदानी राजेंद्र सिंह की।

    दादा ने अपने बेटे को सुनाया, बेटे ने अपने बच्चों को और अब नई पीढ़ी भी उसी गर्व के साथ इस कहानी को आगे बढ़ा रही है। आजादी के 8 दशक बाद भी नयागांव में राजेंद्र सिंह केवल इतिहास का एक नाम नहीं, बल्कि हर घर की स्मृतियों और हर बच्चे के संस्कार का हिस्सा हैं।

    परिवार में जरूर होती है वीरता की चर्चा 

    बलिदानी राजेंद्र सिंह के पड़ोस के रिश्ते में प्रपौत्र एवं भारतीय रेल में कार्यरत कुमार विजय बताते हैं कि बचपन में जब भी परिवार के बुजुर्ग एक साथ बैठते थे, तो राजेंद्र सिंह की वीरता की चर्चा जरूर होती थी।

    दादा और पिता बताते थे कि देश की आजादी के लिए उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा सुख भी ठुकरा दिया। वही किस्से सुनते-सुनते बचपन बीता और आज वही कहानियां अगली पीढ़ी को सुनाई जा रही हैं।

    कुमार विजय कहते हैं कि परिवार की सबसे बड़ी पूंजी राजेंद्र सिंह का बलिदान है। यही हमारी पहचान है और यही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी कि आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी न भूलें।

    साल 1942 में राजेंद्र सिंह गर्दनीबाग उच्च विद्यालय में दसवीं कक्षा के छात्र थे। संयोग ऐसा था कि अगस्त क्रांति में शामिल होने से महज एक दिन पहले उनकी पत्नी सुरेश देवी का गवना हुआ था।

    पिता के सामने दृढ़ता से रखी बात 

    परिवार चाहता था कि वे घर में रहें, लेकिन उनके मन में मातृभूमि की पुकार अधिक प्रबल थी। पिता शिव नारायण सिंह ने जब आंदोलन में जाने से रोका तो उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा था—'यदि हर पिता अपने बेटे को देश के लिए आगे बढ़ने से रोकेगा, तो भारत माता की गुलामी की जंजीरें कौन तोड़ेगा?'

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    घर से निकलते समय उन्होंने यह भी कहा था कि या तो तिरंगा फहराकर लौटेंगे या फिर ऐसा बलिदान देंगे, जिस पर आने वाली पीढ़ियां गर्व करेंगी।

    11 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने निकले सात छात्र अंग्रेजों की गोलियों के सामने भी नहीं रुके।

    एक साथी गिरता तो दूसरा तिरंगा थाम लेता। गोलियां चलती रहीं, लेकिन तिरंगा आगे बढ़ता रहा। आखिरकार सचिवालय के गुंबद पर राष्ट्रीय ध्वज लहरा उठा।

    इस अमर बलिदान में राजेंद्र सिंह के साथ देवीपद चौधरी, रामगोविंद सिंह, रामानंद सिंह, जगपति कुमार, सतीश झा और उमाकांत सिंह ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

    नयागांव आज भी अपने वीर बलिदानी की स्मृतियों को पूरे सम्मान के साथ सहेजे हुए है। स्टेशन गेट के सामने स्थापित उनकी आदमकद प्रतिमा गांव की पहचान बन चुकी है।

    हंसते-हंसते दे दी जान 

    हर वर्ष 11 अगस्त को स्थानीय लोग, सामाजिक संगठन, छात्र और जनप्रतिनिधि यहां पहुंचकर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। गांव के बुजुर्ग बच्चों को प्रतिमा के सामने खड़ा कर बताते हैं कि इसी मिट्टी ने ऐसा बेटा जन्म दिया था, जिसने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपना जीवन समर्पित कर दिया।

    ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी स्तर पर भले इस ऐतिहासिक विरासत को अपेक्षित पहचान नहीं मिल सकी हो, लेकिन गांव ने अपने बलिदानी को कभी भुलाया नहीं।

    नयागांव, सोनपुर और आसपास के इलाके के लिए राजेंद्र सिंह आज भी गर्व का विषय हैं। महेश्वर सिंह और शिव बच्चन सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियां भी इसी धरती की पहचान हैं।

    गांव के लोगों का मानना है कि जब तक घरों में दादा-पिता अपने बच्चों को बलिदानी राजेंद्र सिंह की कहानी सुनाते रहेंगे, तब तक राष्ट्रप्रेम, त्याग और साहस की यह लौ कभी बुझने नहीं पाएगी।

    यही नयागांव की सबसे अनमोल विरासत है और यही इस गांव की सबसे बड़ी पहचान भी। बलिदानी राजेंद्र सिंह का जन्म चार दिसंबर 1924 को बनवारीचक गांव में हुआ था। उनको कोई संतान नही था।