जहां ट्रैक्टर रुक जाते हैं, वहां बैलों की घंटियां और मिट्टी की खुशबू बनती है गांव की पहचान
मढ़ौरा प्रखंड में आज भी कई किसान छोटे और दलदली खेतों में हल-बैल से पारंपरिक खेती कर रहे हैं, जो गांव की विरासत को दर्शाता है। ...और पढ़ें

हल-बैल के सहारे खेत तैयार
HighLights
छोटे और दलदली खेतों में बैलों से होती है जुताई।
बैलों की जुताई से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
देर से मानसून पर धान की रोपनी अब तेज हुई।
बिपिन कुमार मिश्रा, मढ़ौरा (सारण)। आधुनिक कृषि यंत्रों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मढ़ौरा प्रखंड के कई गांवों में आज भी खेती की तस्वीर पूरी तरह नहीं बदली है। जहां बड़े खेतों में ट्रैक्टरों की आवाज गूंज रही है, वहीं कई किसानों के खेतों में बैलों की घंटियों की मधुर धुन सुनाई दे रही है।
यह आवाज सिर्फ खेती की नहीं, बल्कि गांव की उस विरासत की है जो समय के साथ भी फीकी नहीं पड़ी।कई किसान आज भी हल-बैल के सहारे खेत तैयार कर रहे हैं और धान की रोपनी की तैयारी में जुटे हैं।
बदलते दौर में भी यह नजारा ग्रामीण जीवन की सादगी और मिट्टी से जुड़े रिश्ते की कहानी कह रहा है।
जहां ट्रैक्टर रुक जाते हैं, वहां से शुरू होती है बैलों की ताकत
अगहरा गांव के रामसूरत राय, नरहरपुर चमारी के अशोक साह और सरभा राम समेत दर्जनों किसान इन दिनों बैलों से खेत जोत रहे हैं।
किसानों का कहना है कि छोटे, संकरे और दलदली खेतों तक ट्रैक्टर आसानी से नहीं पहुंच पाते। ऐसे खेतों में हल-बैल आज भी सबसे भरोसेमंद साथी साबित होते हैं।
किसानों का मानना है कि बैलों से जुताई करने पर मिट्टी की संरचना भी बेहतर बनी रहती है। इससे खेत की प्राकृतिक उर्वरता पर कम असर पड़ता है और फसल के लिए बेहतर वातावरण तैयार होता है। यही वजह है कि कई किसान तकनीक के साथ परंपरा को भी साथ लेकर चल रहे हैं।
देर से आया मानसून, लेकिन अब खेतों में लौट आई रौनक
किसानों ने बताया कि इस बार मानसून की सक्रियता में देरी के कारण खेती की शुरुआत भी देर से हुई। इस वजह से धान की रोपनी का काम तय समय से पीछे चल रहा था।
खबरें और भी
हालांकि हाल के दिनों में नहरों में पानी पहुंचने से किसानों को राहत मिली है। अब गांवों के खेतों में रोपनी का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।
किसान अपने परिवार के साथ सुबह से शाम तक खेतों में मेहनत करते नजर आ रहे हैं। धान की हर पौध के साथ अच्छी फसल की उम्मीद भी रोपी जा रही है।
आंकड़ों में खेती, उम्मीदों में हरियाली
प्रखंड कृषि कार्यालय के अनुसार इस वर्ष मढ़ौरा में 6,952 एकड़ क्षेत्र में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया है।
अब तक 605 एकड़ में धान की बुआई पूरी हो चुकी है। यह कुल लक्ष्य का करीब 8.7 प्रतिशत हिस्सा है।
कृषि विभाग का मानना है कि यदि बारिश और सिंचाई की स्थिति अनुकूल रही तो रोपनी का रकबा तेजी से बढ़ेगा।
अधिकारियों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में खेती अपनी पूरी रफ्तार पकड़ लेगी। इसके साथ ही किसानों के चेहरों पर भी उम्मीद की मुस्कान लौटेगी।
मिट्टी की खुशबू, बैलों की चाल और गांव की पहचान
ग्रामीण इलाकों में आधुनिक खेती के साथ-साथ हल-बैल की परंपरा आज भी जीवित है। कई किसान इसे केवल मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी पहचान और विरासत मानते हैं।
उनके लिए बैल सिर्फ खेती का साधन नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हैं। मशीनों के इस दौर में भी बैलों की घंटियां गांवों की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं।
यह परंपरा नई पीढ़ी को खेती की जड़ों से जोड़ने का काम भी कर रही है।शायद यही वजह है कि खेतों में आज भी कहीं-कहीं मिट्टी और मशीन की यह खूबसूरत साझेदारी दिखाई देती है।