बिहार के लाल का कमाल, 14 साल की उम्र में संचार की गुत्थी सुलझाने के लिए लिख डाली पूरी किताब
सीतामढ़ी के 14 वर्षीय अरुणाभ रंजन ने संचार की जटिल प्रक्रिया पर 'कोर कॉन्सेप्ट्स ऑफ कम्युनिकेशन' नामक अंग्रेजी पुस्तक लिखी ...और पढ़ें

डीईओ राघवेंद्र मणि त्रिपाठी को पुस्तक भेंट करता अरुणाभ। सौ.स्वयं
HighLights
14 वर्षीय अरुणाभ रंजन ने संचार पर अंग्रेजी पुस्तक लिखी।
पुस्तक 'कोर कॉन्सेप्ट्स ऑफ कम्युनिकेशन' संचार प्रक्रिया समझाती है।
जिला शिक्षा पदाधिकारी ने अरुणाभ की लेखन प्रतिभा की सराहना की।
जागरण संवाददाता, सीतामढ़ी। आमतौर पर 14 साल की उम्र में बच्चे खेलकूद और पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं, लेकिन सीतामढ़ी के अरुणाभ रंजन के सवाल कुछ अलग हैं। उसके मन में एक ऐसी जिज्ञासा ने जन्म लिया, जिसने उसे लेखक बना दिया।
आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले अरुणाभ ने संचार की जटिल प्रक्रिया को समझने और समझाने के लिए अंग्रेजी में पूरी पुस्तक लिख डाली है। उसकी पुस्तक का नाम 'कोर कांस्पेटस आफ कम्युनिकेशन' है। इसमें उसने एक दिलचस्प सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है कि आखिर एक ही बात को दो लोग अलग-अलग अर्थों में क्यों समझते हैं।
एक सवाल ने बना दिया लेखक
कैलाशपुरी निवासी ज्ञानी रंजन और रीतू रंजन के 14 वर्षीय पुत्र अरुणाभ के मन में एक सवाल बार-बार उठता था। जब कोई व्यक्ति अपनी बात कहता है, तो सुनने वाला उसे उसी अर्थ में क्यों नहीं समझता? इसी सवाल की गहराई में उतरते हुए उसने संचार की प्रक्रिया और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया और उन्हें पुस्तक का रूप दे दिया।
संदेश से ज्यादा जरूरी उसे समझना
अरुणाभ का मानना है कि केवल संदेश भेज देना पर्याप्त नहीं है। संदेश को समझने वाले व्यक्ति की सोच, अनुभव, अपेक्षाएं और परिस्थितियां भी उसके अर्थ को प्रभावित करती हैं।
पुस्तक में उसने बताया है कि एक ही शब्द या बात अलग-अलग लोगों के लिए अलग अर्थ रख सकती है। किसी की बात सुनना और उसे सही अर्थों में समझना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
संकेतों और प्रतीकों पर भी की चर्चा
पुस्तक में अरुणाभ ने संचार के दौरान शब्दों के साथ संकेतों और प्रतीकों की भूमिका को भी समझाने का प्रयास किया है। इसमें संकेत-विज्ञान (सेमियोटिक्स) जैसे गंभीर विषय पर भी चर्चा की गई है। कम उम्र में इस तरह के विषय को चुनना उसकी गहरी जिज्ञासा और अध्ययन के प्रति रुचि को दर्शाता है।
डीईओ को भेंट की अपनी पुस्तक
अरुणाभ ने अपनी पुस्तक जिला शिक्षा पदाधिकारी राघवेंद्र मणि त्रिपाठी को भेंट की। डीईओ ने उसकी लेखनी और विचारों की सराहना करते हुए इस प्रयास को प्रतिभा और रचनात्मक सोच का उदाहरण बताया। पुस्तक का आनलाइन प्रकाशन पोथी प्रकाशन के माध्यम से किया गया है।
कम उम्र में संचार जैसे गंभीर विषय पर पुस्तक लिखकर अरुणाभ ने यह दिखाया है कि सीखने और कुछ नया करने की कोई उम्र नहीं होती। उसकी यह पहल दूसरे विद्यार्थियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।
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