विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

सीतामढ़ी की 'अनपढ़' सुशीला बनीं मिसाल: खुद पढ़ीं और बहू को पढ़ाया, अब पोती के सपने को दे रहीं उड़ान

Published: Mon, 07 Sep 2026 05:04 PM (IST)

Bihar Success Story: सीतामढ़ी की सुशीला देवी ने निरक्षरता की चुनौती को पार कर खुद पढ़ना-लिखना सीखा और परिवार की तीन पीढ़ियों को शिक्षा से जोड़ा।

सीतामढ़ी की सुशीला देवी। (जागरण)

सीतामढ़ी की सुशीला देवी। (जागरण)

HighLights

  1. बैंक में फॉर्म भरने की मजबूरी ने सुशीला देवी को साक्षर बनाया।

  2. उनकी बहू स्नातक बनीं, पोती डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही है।

  3. सुशीला देवी अब सामाजिक कार्यों में सक्रिय, बनीं निर्विरोध पंच।

अमित सौरभ, सीतामढ़ी। Sitamarhi News: एक समय था जब बैंक में अपने ही खाते से रुपये निकालने के लिए सुशीला देवी को किसी दूसरे से फॉर्म भरवाना पड़ता था।

एक दिन इसी मजबूरी ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने तय किया कि पढ़ाई की कमी उनके परिवार की अगली पीढ़ी की राह नहीं रोकेगी।

महिला समाख्या समूह और साक्षरता अभियान से जुड़कर उन्होंने खुद पढ़ना-लिखना सीखा और फिर बहू की पढ़ाई के लिए घर में शिक्षक तक रखा।

आज बहू स्नातक हैं और पोती नीट की तैयारी कर डॉक्टर बनने का सपना देख रही है। सोनबरसा प्रखंड के रोहुंभा गांव की सुशीला देवी वर्ष 1996 में महिला समाख्या समूह से जुड़ी थीं।

उस समय वह निरक्षर थीं और दस्तावेजों पर अंगूठा निशान लगाती थीं। समूह से जुड़ने और साक्षरता गतिविधियों में भाग लेने के बाद उन्होंने अपना नाम लिखना सीखा। धीरे-धीरे उन्हें यह समझ आया कि पढ़ाई केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने के लिए भी जरूरी है।

एक घटना ने बदल दी सोच (Sushila Devi Success Story)

बैंक में निकासी फॉर्म भरने के दौरान मदद के लिए इधर-उधर भटकने की घटना ने उन्हें काफी प्रभावित किया। उन्होंने उसी समय संकल्प लिया कि घर की बहू-बेटियों को पढ़ाएंगी, ताकि वे अपने जरूरी काम के लिए दूसरों पर निर्भर न रहें।

उस समय उनका बेटा नौवीं कक्षा में पढ़ रहा था और उसकी उम्र करीब 15 वर्ष थी। परिवार में कम उम्र में शादी हो गई और बहू पांचवीं तक पढ़ी थीं।

79797545

लोगो को साक्षरता का महत्व बताती सुशीला देवी। (जागरण)

सुशीला देवी ने बहू को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। घर का काम संभालने के साथ स्कूल जाने की बात पर वह तैयार हो गईं।

सुशीला देवी उस समय महिला समाख्या में मेस संचालन करती थीं और विद्यालय में मध्याह्न भोजन बनाने का काम भी करती थीं। उन्होंने बहू का विद्यालय में नामांकन कराया और घर पर शिक्षक रखकर पढ़ाई की व्यवस्था की। मेहनत रंग लाई और बहू ने स्नातक तक की शिक्षा पूरी की।

अब पोती डॉक्टर बनने की राह पर

बहू ने मुजफ्फरपुर के एक निजी विद्यालय में शिक्षण कार्य भी किया। कम मानदेय के कारण बाद में स्टाफ रखकर उन्होंने जनरल स्टोर शुरू किया। परिवार अब मुजफ्फरपुर में रह रहा है। बेटा बिजली का काम करते हैं। बच्चों की पढ़ाई जारी है

सुशीला देवी की पोती प्रभात तारा मुजफ्फरपुर से इंटर पास कर अब नीट की तैयारी कर रही हैं। उनका सपना डॉक्टर बनने का है। वह जरूरतमंद लोगों का इलाज करने की इच्छा रखती हैं।

साक्षरता से सामाजिक भागीदारी तक

पढ़ाई का महत्व समझने के बाद सुशीला देवी का सामाजिक दायरा भी बढ़ा। वर्तमान में वह निर्विरोध पंच चुनी गई हैं। वह ‘प्रगति-एक प्रयास’ महिला समाख्या फेडरेशन, सोनबरसा की नारी अदालत की सदस्य भी हैं।

Sushila Devi

घरेलू हिंसा और दहेज हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के साथ महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करती हैं।

किशोरी मंच के माध्यम से किशोरियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करने के साथ समूह की महिलाओं को भी साक्षर बनने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

अंगूठे के निशान से शुरू हुई सुशीला देवी की यात्रा आज एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है, जहां पोती के हाथ में कलम है और आंखों में डॉक्टर बनने का सपना।

यह भी पढ़ें- औरंगाबाद के पीयूष ने किया कमाल, यूजीसी नेट-JRF परीक्षा में हासिल किया 99.71 पर्सेंटाइल