उम्र बढ़ी तो क्या, जुनून आज भी जवान; रिटायर शिक्षक की कहानी देगी प्रेरणा, कपड़े पर बालपोथी और कबाड़ से ब्लू ह्वेल
सिवान के सेवानिवृत्त शिक्षक ललन मांझी ने बच्चों की शिक्षा को रोचक बनाने के लिए कपड़े पर बालपोथी तैयार की ...और पढ़ें
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सेवानिवृत्त शिक्षक ललन मांझी। फाइल
HighLights
सेवानिवृत्त शिक्षक ललन मांझी ने बनाई कपड़े पर बालपोथी।
अनुपयोगी वस्तुओं से ब्लू ह्वेल के शिशु की आकर्षक प्रतिकृति।
शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण का दिया अनूठा संदेश।
जागरण संवाददाता, सिवान। Happy Teachers Day 2026: हुनर और रचनात्मकता उम्र की मोहताज नहीं होती। इसे चरितार्थ कर रहे हैं सिवान के सेवानिवृत्त शिक्षक ललन मांझी।
वर्ष 2015 में सेवानिवृत्ति के बाद जहां अधिकांश लोग आराम की जिंदगी पसंद करते हैं, वहीं ललन मांझी ने सीखने-सिखाने और कुछ नया रचने का जुनून अब भी कायम रखा है।
उन्होंने बच्चों की शिक्षा को रोचक बनाने के लिए कपड़े पर स्वरचित संपूर्ण बालपोथी तैयार की है। वहीं, घर और आसपास पड़ी अनुपयोगी वस्तुओं को जुटाकर ब्लू ह्वेल के नवजात शिशु की आकर्षक प्रतिकृति बनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया है।
उनकी रचनात्मक प्रतिभा केवल कला तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी समाहित है। कपड़े पर तैयार की गई बालपोथी में बच्चों के लिए उपयोगी शैक्षणिक सामग्री को सरल और सहज तरीके से प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों को पढ़ाई के प्रति आकर्षित करना और सीखने की प्रक्रिया को बोझिल होने के बजाय रुचिकर बनाना है।
कपड़े पर रची संपूर्ण बालपोथी
बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा को सरल और मनोरंजक बनाने की सोच के साथ ललन मांझी ने स्वयं बालपोथी की रचना की। उन्होंने इसे कागज के बजाय कपड़े पर लिखकर अलग स्वरूप दिया।
इसमें बच्चों की जरूरत के अनुरूप शैक्षणिक सामग्री को आसान भाषा और रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। उनका मानना है कि यदि सीखने की प्रक्रिया बच्चों की रुचि के अनुरूप हो तो वे चीजों को आसानी से समझ और याद कर सकते हैं।
कबाड़ से कंचन तक का संदेश
शिक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी ललन मांझी लगातार काम करते रहे हैं। उन्होंने घर और आसपास फेंकी हुई तथा अनुपयोगी वस्तुओं को एकत्र किया और इन्हीं सामग्रियों से ब्लू ह्वेल के नवजात शिशु की आकर्षक प्रतिकृति तैयार कर दी।
उनकी यह कलाकृति लोगों के बीच कौतूहल का विषय बनती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि जिसे हम कचरा समझकर फेंक देते हैं, उसका रचनात्मक इस्तेमाल किया जाए तो वही वस्तु आकर्षक कलाकृति का रूप ले सकती है।
उनकी इस पहल में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ बच्चों और समाज को रचनात्मक सोच के लिए प्रेरित करने का संदेश भी छिपा है। वे लोगों को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि संसाधनों का सही इस्तेमाल कर न केवल कचरे को कम किया जा सकता है, बल्कि उससे उपयोगी और सुंदर वस्तुएं भी बनाई जा सकती हैं।
अनूठी कला को मिले हैं कई सम्मान
शिक्षा और रचनात्मकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ललन मांझी को कई बार सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 1995 में प्राथमिक विद्यालय जुड़कन के प्रधानाध्यापक रहते तत्कालीन डीएम ने उन्हें मेधा सम्मान प्रदान किया था।
वर्ष 2001 में तत्कालीन डीएम रशीद अहमद खां तथा 2004 में डीएम आरके महाजन ने उन्हें जिला मेधा सम्मान से नवाजा। वर्ष 2002 में भोजपुरी शैक्षिक फिल्म 'गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ' के लिए उन्हें सम्मानित किया गया। वर्ष 2010 में बिहार दिवस के अवसर पर उन्हें प्रशस्ति पत्र मिला।
वर्ष 2012 में उनका नाम राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए भी अनुशंसित किया गया था। विभिन्न मंचों पर उनकी शैक्षणिक और रचनात्मक प्रतिभा की सराहना होती रही है।
सीखने और सृजन करने की कोई उम्र नहीं
ललन मांझी कहते हैं कि सीखने और सृजन करने की कोई उम्र नहीं होती। इंसान में कुछ नया करने की इच्छा हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बन सकती।
बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं को यदि सही नजरिए से देखा जाए तो उनसे भी उपयोगी और आकर्षक कलाकृतियां तैयार की जा सकती हैं। उनका प्रयास बच्चों को रचनात्मक शिक्षा देने के साथ-साथ समाज को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने का भी है।
