सुपौल के गोसपुर में मिलीं 500 साल पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां, सभ्यता और बौद्धिक विरासत देख हैरान रह गए DM-SP
सुपौल के राघोपुर प्रखंड के गोसपुर गांव में 500 साल से भी पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने इन ऐतिहासिक धरोहरों का अव ...और पढ़ें

सुपौल में ऐतिहासिक खोज! गोसपुर गांव में मिलीं 500 वर्ष पुरानी पांडुलिपियां, देखने पहुंचे डीएम और एसपी
HighLights
सुपौल के गोसपुर में मिलीं 500 साल पुरानी पांडुलिपियां।
DM-SP ने किया दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहरों का अवलोकन।
'ज्ञान भारतम मिशन' के तहत होगा इनका संरक्षण।
संवाद सूत्र, करजाईन बाजार (सुपौल)। जिला प्रशासन की विशेष अपील और 'ज्ञान भारतम मिशन' के तहत सुपौल की गौरवशाली बौद्धिक विरासत को सहेजने के अभियान को एक बड़ी सफलता मिली है। राघोपुर प्रखंड के गोसपुर गांव में सदियों पुरानी और अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपियां (Manuscripts) मिली हैं। इस ऐतिहासिक खोज के बाद जिलाधिकारी (DM) सावन कुमार एवं पुलिस अधीक्षक (SP) शरथ आर एस, जिला संस्कृति पदाधिकारी तारकेश्वर पटेल के साथ पूरी टीम के साथ गोसपुर स्थित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र के निज आवास 'त्रिलोक धाम' पहुंचे और इन अनमोल धरोहरों का अवलोकन किया।
डीएम और एसपी का पाग-माला पहनाकर पारंपरिक स्वागत
त्रिलोक धाम पहुंचने पर पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने मिथिला की समृद्ध परंपरा के अनुसार जिलाधिकारी सावन कुमार और एसपी शरथ आर एस को पाग, माला व अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया। इस खास अवसर पर आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने 10 अत्यंत महत्वपूर्ण पांडुलिपियां जिला प्रशासन की टीम को सौंपीं। इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सहेजने और जिले की सभ्यता, ज्ञान तथा पहचान रूपी बौद्धिक विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने में उनका यह योगदान बेहद अतुलनीय माना जा रहा है।
दरभंगा महाराज के राज पंडित के संग्रह से मिलीं अनमोल धरोहरें
ये सभी पांडुलिपियां दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह के राज पंडित रहे और व्याकरण, वेद, न्याय, मीमांसा एवं धर्मशास्त्र के उद्भट विद्वान पंडित त्रिलोकनाथ मिश्र के संग्रह से प्राप्त हुई हैं। वर्तमान में उनके वंशज और पांडित्य परंपरा को आगे बढ़ाने वाले पंडित शचींद्रनाथ मिश्र तथा अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने इस ज्ञान को संभालकर रखा था।
संस्कृत और मिथिलाक्षर में लिखी हैं 500 वर्ष पुरानी पांडुलिपियां
विशेषज्ञों के अनुसार, ये पांडुलिपियां संस्कृत भाषा और मिथिलाक्षर लिपि में हस्तलिखित हैं, जो लगभग 500 वर्ष से भी अधिक पुरानी बताई जा रही हैं। प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया कि ये केवल कागज के दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन सुपौल की बौद्धिक उन्नति, समृद्ध लेखन कला और उस दौर की तकनीकी समझ (जैसे स्याही और लेख्य सामग्री तैयार करने की विधि) का एक जीवंत और अकाट्य प्रमाण हैं।
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धरोहरों को डिजिटल रूप से संरक्षित करना मुख्य लक्ष्य
इस पूरे अभियान और खोज का मुख्य लक्ष्य इन अनमोल सांस्कृतिक धरोहरों को भावी पीढ़ियों के लिए डिजिटल और भौतिक रूप से संरक्षित करना है, ताकि सुपौल की ऐतिहासिक पहचान हमेशा जीवित रहे। निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने गोसपुर गांव की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि यह गांव वास्तव में बेहद आध्यात्मिक और ज्ञान संपन्न है। अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को पुनर्जीवित करने की जिला प्रशासन की यह पहल देश-दुनिया के लिए एक मिसाल बनेगी।