खून-पसीने से बना घर खुद तोड़ने को मजबूर! सुपौल में कोसी के तांडव से 200 परिवार बेघर, तिरपाल के नीचे कट रही जिंदगी
Supaul Kosi Erosion Kishanpur: सुपौल के किशनपुर प्रखंड में कोसी नदी के भीषण कटाव से 200 से अधिक परिवार बेघर ...और पढ़ें

Supaul Kosi Erosion Kishanpur: सुपौल के किशनपुर में कोसी का तांडव, अपने ही हाथों से आशियाना तोड़ने को मजबूर ग्रामीण; 200 से अधिक परिवार बेघर
HighLights
सुपौल में कोसी कटाव से 200 से अधिक परिवार बेघर हुए।
ग्रामीण अपने ही हाथों से घर तोड़कर सामान बचा रहे हैं।
तिरपाल के नीचे जीवन, राहत और स्थायी पुनर्वास की मांग।
संवाद सूत्र, किशनपुर (सुपौल)। Supaul Kosi Erosion Kishanpur: जीवनभर की हाड़-तोड़ मेहनत और पाई-पाई जोड़कर जिस आशियाने की नींव रखी थी, उसे अपनी ही आंखों के सामने नदी की क्रूर लहरों में समाते देखने की बेबसी क्या होती है, यह सुपौल के मौजहा पंचायत निवासी रामनारायण मंडल की आंखों से बहते आंसू साफ बयां कर रहे हैं। जिस मकान को बनाने में पूरी जिंदगी खप गई, आज उसी मकान पर खुद अपने हाथों से हथौड़ा चलाना पड़ रहा है।
यह विदारक दृश्य सिर्फ रामनारायण के घर का नहीं है, बल्कि किशनपुर प्रखंड के करीब 200 परिवारों की यही दारुण दास्तान है। गांव के गांव लीलने पर आमादा कोसी के विकराल रूप को देखकर ग्रामीण इस उम्मीद में अपने ही घर तोड़ रहे हैं कि कम से कम ईंटें, चौखट और किवाड़ तो सुरक्षित बचाए जा सकें।
पूर्वी कोसी तटबंध के भीतर पिछले दो महीनों से नदी का कटाव अनवरत जारी है। नदी की तेज धारा किनारे की उपजाऊ जमीन और मकानों को रेत की मानिंद ढहा रही है। इस विभीषिका का सबसे भीषण असर दुबियाही और मौजहा पंचायत के गांवों में देखा जा रहा है, जहां सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि पहले ही जलमग्न हो चुकी है और अब इंसानी बस्तियां भी विलीन हो रही हैं।
दुबियाही से शुरू हुआ विनाश का सफर, अब मौजहा निशाने पर
आपदा की शुरुआत दुबियाही पंचायत के बेलागोठ गांव से हुई थी, जहां कोसी ने दर्जनों घरों और खेतों को निगल लिया। यहां से करीब 100 परिवारों का आशियाना छिन गया और वे सुरक्षित स्थानों की ओर विस्थापित हो गए। इसके बाद नदी की लहरों ने मौजहा पंचायत का रुख कर लिया।
वर्तमान में मौजहा पंचायत के सुकमारपुर, सुजानपुर, सिसवा, पंचगछिया और बेला गांव सीधे तौर पर कटाव के मुहाने पर खड़े हैं। यहां भी 100 से अधिक परिवारों के घर जमींदोज हो चुके हैं। जमीन के दरकने की आवाज सुनकर लोग सहम उठते हैं और जो भी सामान हाथ लग रहा है, उसे ट्रैक्टरों और नावों पर लादकर ऊंचे स्थानों पर ले जा रहे हैं।
तिरपाल के नीचे सिमटी जिंदगी, बारिश बनते ही बढ़ जाता है नर्क
कल तक अपने पक्के और सुसज्जित मकानों में रहने वाले परिवार आज सड़क किनारे या तटबंध के ढलानों पर प्लास्टिक की पतली चादर (तिरपाल) तानकर रात बिताने को विवश हैं। उसी एक चादर के नीचे अबोध बच्चे, लाचार बुजुर्ग, महिलाएं, घरेलू सामान, थोड़ा-बहुत अनाज और जलावन रखा हुआ है।
सुपौल जिले के किशनपुर प्रखंड अंतर्गत पूर्वी कोसी तटबंध के भीतर दो माह से जारी भीषण कटाव ने मचाया हाहाकार
दुबियाही और मौजहा पंचायत के गांवों में 200 से अधिक परिवारों के पक्के और कच्चे मकान नदी के गर्भ में समाए
दरकते किनारों को देख हथौड़ा और सब्बल लेकर खुद ही अपने हाथों से ईंट-चौखट उखाड़ने को मजबूर हुए बेबस ग्रामीण
प्लास्टिक के तिरपाल के सहारे खुले आसमान में जिंदगी गुजार रहे पीड़ित; पशुचारा और राहत सामग्री की लगाई गुहार
आसमान से बारिश की बूंदें गिरते ही इन विस्थापितों की जिंदगी नर्क से भी बदतर हो जाती है। सबसे बड़ा संकट बेजुबान पशुओं के सामने खड़ा हो गया है। खेती की जमीनें कटकर नदी में समा जाने के बाद पशुपालकों के सामने मवेशियों के लिए सूखा भूसा और हरा चारा जुटाना लगभग नामुमकिन हो गया है।
रात के अंधेरे में कोसी की गर्जना से खौफ, स्थायी समाधान की मांग
कटाव पीड़ित बमबम कुमार, बोहरी मंडल और नागो कामत जैसे ग्रामीणों का कहना है कि कोसी सिर्फ उनकी जमीन और ईंट-पत्थर नहीं काट रही, बल्कि उनका भविष्य और उम्मीदें भी निगल रही है। रात होते ही जब नदी की धारा तटों से टकराती है, तो उठने वाली गर्जना से बच्चे डर के मारे कांप उठते हैं।
पीड़ित ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से गुहार लगाई है कि प्रभावित इलाकों में तत्काल पॉलीथिन शीट्स, सूखा राशन और पशुचारा उपलब्ध कराया जाए। इसके साथ ही, हर साल विस्थापन की इस भयानक त्रासदी से निजात दिलाने के लिए कटाव निरोधी ठोस कार्य कराने और विस्थापित परिवारों के स्थायी पुनर्वास की मुकम्मल व्यवस्था की जाए।
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