Bihar News : मंजीरे-ढोलक हुए शांत, लेकिन डीजे ने फगुआ का मजा ही छीन लिया
पश्चिम चंपारण में होली के पारंपरिक फगुआ गीतों की गूंज अब कम सुनाई देती है। ढोलक-मंजीरे की जगह डीजे और फिल्मी गानों ने ले ली है। बुजुर्ग इस सांस्कृतिक ...और पढ़ें

इसमें होली की प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।
HighLights
पारंपरिक फगुआ गीतों की गूंज अब कम सुनाई देती है।
डीजे और फिल्मी गानों ने ढोलक-मंजीरे की जगह ली।
लोक संस्कृति और सामाजिक समरसता का हो रहा क्षरण।
जागरण संवाददाता, बेतिया (पश्चिम चंपारण)। रंगों के पर्व होली की दस्तक के साथ कभी शहर और गांवों में फागुन के लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगती थी। ढोलक की थाप, मंजीरे की झंकार और चौपालों पर बैठी टोलियों की सामूहिक स्वर-लहरियां माहौल को उत्सवमय बना देती थीं।
समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही है। शहरों में फगुआ के गीत लगभग सुनाई नहीं देते, जबकि गांवों में भी इन्हें गाने वालों की संख्या घटती जा रही है।
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले फागुन लगते ही हो रामा फगुआ में उड़े रे गुलाल और अंगना में उड़त अबीर जैसे पारंपरिक गीत गूंजने लगते थे। रात-रात भर चौपालें सजती थीं और लोग टोली बनाकर घर-घर फगुआ गाते थे।
इन गीतों में श्रृंगार, हास्य, व्यंग्य और सामाजिक संदेश का सुंदर समावेश होता था। बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के प्रभाव से अब युवाओं का रुझान पारंपरिक लोकगीतों की जगह फिल्मी गीतों और डीजे की तेज धुनों की ओर बढ़ गया है।
साहित्यकार जगमोहन का कहना है कि लोकगीतों का लोप हमारी सांस्कृतिक स्मृति के क्षरण का संकेत है। फगुआ गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का माध्यम था, जो अब धीरे-धीरे खोता जा रहा है।
वर्तमान में युवाओं का झुकाव पारंपरिक लोकगीतों की अपेक्षा फिल्मी गानों और डीजे की तेज धुनों की ओर अधिक हो गया है। त्योहारों में सामूहिक गायन की जगह अब साउंड सिस्टम और डिजिटल प्लेलिस्ट ने ले ली है। इससे लोकधुनों की मिठास और आत्मीयता धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
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मुझे फगुआ गीत के बोल और धुन की जानकारी ही नहीं है। स्कूल-कालेजों में लोक संस्कृति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। इंटरनेट मीडिया और तेज संगीत के दौर में पारंपरिक लोक धुनें पीछे छूटती जा रही हैं।
आकाश गुप्ता, बेतिया।
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पहले परिवार और समाज ही लोकसंस्कृति के विद्यालय होते थे, लेकिन अब यह कड़ी कमजोर पड़ गई है। परिणामस्वरूप युवाओं का जुड़ाव अपनी जड़ों से कम होता जा रहा है। इसी से फगुआ गीत का क्षरण है।
सूरज कुमार, बेतिया।
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स्कूल-कॉलेजों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी आधुनिक गीत-संगीत को प्राथमिकता मिलती है, जबकि फगुआ गीत जैसे पारंपरिक गीत हाशिए पर हैं।शैक्षणिक संस्थानों को इस पर गहन मंथन करने की जरुरत है।
विनीत कुमार, कुमारबाग।
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इंटरनेट मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्म ने युवाओं की पसंद को तेजी से प्रभावित किया है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब और डीजे मिक्स गानों के बीच पारंपरिक फगुआ की मधुर धुनें पूरी तरह से लुप्त हो गई हैं।
उत्सव ठाकुर, कुमारबाग।