महात्मा गांधी को पहली जॉब और सैलरी देने वाले दादा अब्दुल्ला कौन थे? ऐसी नौकरी जिसने बदला इतिहास!
भारतीय व्यवसायी ने युवा मोहनदास करमचंद गांधी को दक्षिण अफ्रीका में पहली नौकरी (Mahatma Gandhi first job) दी। इस नौकरी के दौरान हुए नस्लीय भेदभाव ने गांधीजी को 'महात्मा' बनने और सत्याग्रह आंदोलन की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दादा अब्दुल्ला: वह भारतीय व्यवसायी जिसने महात्मा गांधी को पहली नौकरी देकर इतिहास रचने में मदद की
HighLights
दादा अब्दुल्ला ने युवा गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका में पहली नौकरी दी।
ट्रेन में हुए नस्लीय भेदभाव ने गांधीजी के जीवन को बदल दिया।
दादा अब्दुल्ला ने गांधीजी के शुरुआती राजनीतिक आंदोलनों का आर्थिक समर्थन किया।
नई दिल्ली। आज पूरी दुनिया महात्मा गांधी को उनके अहिंसा और सत्याग्रह के आंदोलनों के लिए जानती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक भारतीय अमीर बिजनेसमैन की तरफ से ऑफर की गई नौकरी (who gave first job to Mahatma Gandhi) ने युवा मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' बनने की राह पर अहम भूमिका निभाई। यह उस समय के लोकप्रिय बिजनेस दादा अब्दुल्ला थे। आइए, उनके बारे में जानने के लिए इतिहास के पन्नों को टटोलते हैं।
कौन थे दादा अब्दुल्ला
दादा अब्दुल्ला मेमन समुदाय के एक प्रमुख व्यापारी थे। 1890 के दशक में, उन्होंने अपने भाई अब्दुल करीम झावेरी के साथ मिलकर दक्षिण अफ्रीका में 'दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी' चलाई। यह उस दौर की सबसे बड़ी भारतीय व्यापारिक कंपनियों में से एक थी। कंपनी भारत, जर्मनी और इंग्लैंड से सामान मंगाती थी। डरबन में स्थित इस कंपनी के पास अपने जहाजो का बेड़ा भी था, जिससे भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापार आसान हो गया था।
गांधीजी को पहली नौकरी कैसे मिली?
1893 में, लंदन में बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी करने के बाद, युवा गांधीजी (Mahatma Gandhi biography) भारत में अपनी वकालत शुरू करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उस समय, दादा अब्दुल्ला की कंपनी को 40,000 पाउंड के दावे से जुड़े एक पारिवारिक कानूनी विवाद को सुलझाने के लिए एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की जरूरत थी। पोरबंदर के एक रिश्तेदार के जरिए, उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में एक साल के कॉन्ट्रैक्ट के लिए गांधीजी को काम पर रखा। इस काम के लिए उन्हें फर्स्ट-क्लास यात्रा, रहने का खर्च और 105 पाउंड की फीस (आज के हिसाब से यह रकम भारतीय करेंसी में करीब 14 हजार रुपये) दी गई। गांधीजी मई 1893 में डरबन पहुंचे, जहां दादा अब्दुल्ला ने उनका स्वागत किया।
वह ट्रेन का सफर जिसने इतिहास की दिशा बदल दी
इस मामले पर काम करते समय, गांधीजी को ट्रेन से प्रिटोरिया जाना पड़ा। सफ़र के दौरान, पीटरमैरित्ज़बर्ग स्टेशन पर उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा और उन्हें फर्स्ट-क्लास डिब्बे से बाहर निकाल दिया गया। इस अपमान ने गांधीजी के अंदर के क्रांतिकारी को जगा दिया, और इसी पल उनके जीवन और भारत के इतिहास की दिशा बदल गई।
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आखिरी सांस तक बापू का साथ दिया
दादा अब्दुल्ला ने न सिर्फ गांधीजी को नौकरी दी, बल्कि दक्षिण अफ़्रीका में उनके सबसे बड़े समर्थक भी बने। वे 1894 में बनी 'नटाल इंडियन कांग्रेस' के पहले अध्यक्ष थे (जिसमें गांधीजी सचिव थे)। उन्होंने बापू के शुरुआती राजनीतिक और सत्याग्रह आंदोलनों के लिए काफ़ी आर्थिक मदद दी। दादा अब्दुल्ला का कोई बेटा नहीं था और 1912 में उनकी मौत के बाद उनकी कंपनी धीरे-धीरे बंद हो गई। फिर भी, इतिहास में उनका नाम हमेशा उस व्यक्ति के तौर पर दर्ज रहेगा जिसने गांधीजी के बदलाव के सबसे अहम सालों की नींव रखी थी।
