चाणक्य की नीति और चंद्रगुप्त का राज: ऐसा था मौर्य साम्राज्य का इकोनॉमिक सिस्टम, 2300 साल पहले कैसी थी भारत की अर्थव्यवस्था?
मौर्य साम्राज्य की अर्थव्यवस्था राज्य-नियंत्रित और कृषि-आधारित थी, जिसका विस्तृत वर्णन कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में मिलता है। राज्य का खनन, ...और पढ़ें

मौर्य साम्राज्य का टैक्स सिस्टम (AI फोटो)
HighLights
राज्य-नियंत्रित और कृषि-आधारित थी मौर्य साम्राज्य की अर्थव्यवस्था
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है विस्तृत आर्थिक विवरण
भागा, बलि, शुल्क जैसे कई प्रकार के कर थे प्रचलित
नई दिल्ली। भारत में कई बड़े-बड़े साम्राज्य हुए हैं, जिन्होंने लंबे समय तक देश पर शासन किया। इनमें मौर्य साम्राज्य (Maurya Empire History) भी शामिल है। मौर्य साम्राज्य एक विशाल और शक्तिशाली प्राचीन भारतीय सभ्यता थी, जो लगभग 322 से 185 ईसा पूर्व तक रही।
चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने बुद्धिमान सलाहकार चाणक्य की मदद से इसकी स्थापना की थी और पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर हिस्से को एकजुट किया था। पर क्या आपने कभी कहीं पढ़ा कि उस दौरान इकोनॉमिक सिस्टम कैसा था? मौर्य साम्राज्य में कौन-कौन से टैक्स लगते थे? आइए जानते हैं।
राज्य की पकड़ थी मजबूत
मौर्य साम्राज्य की आर्थिक व्यवस्था एक सख्त नियंत्रित और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था थी, जो राज्य द्वारा ऑपरेट की जाती थी। इस बात का जिक्र कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में विस्तार से मिलता है। इसमें राज्य द्वारा चलाए जाने वाले बड़े उद्यमों और एकाधिकार के साथ-साथ प्राइवेट मर्चेंट एक्टिविटीज और शक्तिशाली कारोबारी संघों का मेल था।
ये थी अर्थव्यवस्था की रीढ़
मौर्य साम्राज्य में खेती-बाड़ी रोजगार और उत्पादन का मुख्य स्रोत थी। राज्य ने खेती के लिए नई बस्तियाँ (जनपदनिवेश) बसाकर नई जमीन को खेती के दायरे में लाने का सक्रिय प्रयास किया। किराये पर मजदूरों का इस्तेमाल करके कृषि अधीक्षक (सीताध्यक्ष) के जरिए राज्य के सीधे स्वामित्व और प्रबंधन वाली जमीन पर खेती होती।
राज्य जल संसाधनों का रखरखाव करता था और उन पर टैक्स लगाता था। साथ ही, राज्य ने बांध और नहरों (जैसे गुजरात में सुदर्शन झील का ढांचा) जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया।
कैसे मिलती थी सैलरी?
खनन और धातु निकालने (खासकर लोहा, तांबा और सोना) के काम पर राज्य का कड़ा एकाधिकार था, क्योंकि ये औजार और हथियार बनाने के लिए बहुत जरूरी थे। वहीं नमक का उत्पादन, शराब बनाना और जहाज बनाने का काम या तो कड़े नियंत्रण में था या सीधे सरकारी एकाधिकार के तहत चलाया जाता था।
एक जैसे चांदी के पंच-मार्क वाले सिक्कों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से घरेलू व्यापार होता और उन्हीं से सरकारी कर्मचारियों को वेतन दिया जाता था।
ट्रेड में हुई आसानी
- मौर्य शासनकाल में भारत के एकीकरण से व्यापार को बढ़ावा मिला। इसके लिए आपस में जुड़े शाही राजमार्गों और नौगम्य नदियों का इस्तेमाल किया गया, जिन्होंने पाटलिपुत्र, तक्षशिला और उज्जैन जैसे प्रमुख केंद्रों को आपस में जोड़ा।
- कारीगरों और व्यापारियों ने शक्तिशाली और स्वतंत्र संगठन (गिल्ड) बनाए, जो कीमतों, क्वालिटी और उत्पादन के स्टैंडर्ड को कंट्रोल करते थे।
- वहीं अधीक्षक (अध्यक्ष) बाजारों को सख्ती से नियंत्रित करते थे, सामान की कीमतें तय करते थे (पण्याध्यक्ष) और धोखाधड़ी रोकने के लिए बाट और माप की जाँच करते थे।
कौन-कौन से टैक्स लगते थे?
- भागा : यह लैंड टैक्स था। यह कृषि उपज में राजा का हिस्सा होता था, जो आमतौर पर उपज का छठा हिस्सा (1/6) तय किया जाता था, हालांकि ज़मीन की उपजाऊ क्षमता और सिंचाई की सुविधा के आधार पर इसे बढ़ाकर चौथा हिस्सा (1/4) भी किया जा सकता था।
- बलि : यह एक पारंपरिक अतिरिक्त या धार्मिक टैक्स/भेंट थी जो मौर्य शासन के दौरान अनिवार्य कर दी गई थी।
- कारा : यह कृषि उपज या संपत्ति पर समय-समय पर लगाया जाने वाला टैक्स था, जिसका भुगतान अक्सर वस्तु के रूप में किया जाता था।
- हिरण्य : यह विशेष कृषि उत्पादों या व्यावसायिक वस्तुओं पर लगाया जाने वाला टैक्स था, जिसका भुगतान सामान के बजाय नकद में किया जाता था।
- शुल्क : यह कस्बों के अंदर-बाहर या सीमाओं के पार जाने वाले सामान पर लगने वाला सीमा शुल्क, सड़क टोल और आयात/निर्यात शुल्क था (आमतौर पर मूल्य का लगभग 10%)।
- पिंडकारा : यह पूरे गांवों के समूह पर लगाया जाने वाला सामूहिक टैक्स था।
- प्रणय : यह युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं या वित्तीय संकट के समय लगाया जाने वाला इमरजेंसी टैक्स था।
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