कावसजी नानाभाई दावर: वो दूरदर्शी उद्योगपति जिसने ब्रिटिश दबदबे को दी चुनौती, 172 साल पहले मुंबई को बनाया था 'कॉटन हब'
भारत में आधुनिक कपड़ा उद्योग की शुरुआत 1818 में कोलकाता के पास एक असफल ब्रिटिश मिल से हुई थी। हालांकि, ...और पढ़ें

भारत की पहली कॉटन मिल (AI फोटो)
HighLights
भारत की पहली मिल 1818 में कोलकाता के पास स्थापित हुई
कावसजी दावर ने 1854 में मुंबई में पहली सफल मिल स्थापित की
इस सफलता ने मुंबई को भारत का प्रमुख टेक्सटाइल हब बनाया
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में भारत दुनिया के सबसे बड़े टेक्सटाइल उत्पादक देशों में शामिल है। मगर भारतीय कपड़ा उद्योग की कहानी सफलता से शुरू नहीं हुई थी, बल्कि एक असफल प्रयोग से हुई थी। असल में जिस देश का हाथ से बुना कपड़ा दुनिया भर में मशहूर था, वहां मशीनों से कपड़ा बनाने वाली पहली आधुनिक मिल ब्रिटिश दौर में शुरू हुई। मगर वो मिल ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी।
इसके बाद एक भारतीय कारोबारी ने ऐसा दांव खेला, जिसने न सिर्फ एक मिल को सफल बनाया बल्कि मुंबई को भारत का सबसे बड़ा टेक्सटाइल हब बनाने की नींव भी रख दी।
1818 में शुरू हुई पहली मिल
भारत की पहली आधुनिक कॉटन टेक्सटाइल मिल 1818 में कोलकाता के पास हुगली नदी के किनारे फोर्ट ग्लोस्टर इलाके में स्थापित की गई थी। इसे आमतौर पर फोर्ट ग्लोस्टर मिल या बोरेया (Bowreah) कॉटन मिल के नाम से जाना जाता है। इस एक ब्रिटिश कारोबारी समूह ने शुरू किया था।
तब भारत कपास पैदा करता था, लेकिन बड़ी मात्रा में कच्चा माल ब्रिटेन भेजा जाता और वहां तैयार कपड़ा बनाकर वापस भारत में बेचा जाता था। फोर्ट ग्लोस्टर मिल के जरिए पहली बार भारत में ही आधुनिक मशीनों के सहारे कपड़ा उत्पादन शुरू किया गया। हालांकि यह प्रयोग भारतीय औद्योगिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण शुरुआत जरूर था, लेकिन व्यावसायिक रूप से मजबूत साबित नहीं हुआ।
पहली मिल सफल क्यों नहीं बन पाई?
फोर्ट ग्लोस्टर की शुरुआती मिल को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उस समय भारत में आधुनिक मशीनरी, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों और औद्योगिक सप्लाई चेन नहीं था। वहीं ब्रिटेन का कपड़ा उद्योग पहले से काफी डेवलप्ड था और भारतीय बाजार में ब्रिटिश मशीन से बने कपड़े की मजबूत मौजूदगी थी।
ऐसे में भारत की शुरुआती मिल व्यावसायिक सफलता हासिल नहीं कर सकी और इसका संचालन लंबे समय तक जारी नहीं रह पाया। इसलिए भारत की पहली मिल और भारत की पहली सफल आधुनिक कॉटन मिल में अंतर किया जाता है। भारत के संगठित और सफल कॉटन मिल उद्योग की असली नींव 1854 में पड़ी।
कावसजी नानाभाई दावर ने बदल दी तस्वीर
भारत की पहली सफल आधुनिक कॉटन टेक्सटाइल मिल का श्रेय पारसी उद्योगपति कावसजी नानाभाई दावर को दिया जाता है, जिन्होंने 7 जुलाई 1854 को बॉम्बे यानी आज के मुंबई के तारदेव इलाके में Bombay Spinning and Weaving Company की स्थापना की।
यह सिर्फ एक नई फैक्ट्री नहीं, बल्कि भारतीय उद्यमिता का बड़ा ऐलान थी। मिल में उत्पादन 1856 में शुरू हुआ। दावर ने ऐसे समय में इंडियन कैपिटल को औद्योगिक क्षेत्र में लगाया, जब ब्रिटिश कंपनियों का दबदबा था। इस मिल की सफलता ने दूसरे भारतीय कारोबारियों का भरोसा बढ़ाया और देखते ही देखते मुंबई में कॉटन मिलों का जाल फैलने लगा।
मुंबई बन गई ‘कॉटन सिटी’
बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी की सफलता के पीछे मुंबई की भौगोलिक और कारोबारी ताकत बड़ी वजह रही। बंदरगाह होने से मशीनरी मंगाना और माल भेजना आसान था, जबकि आसपास के इलाकों से कपास की सप्लाई उपलब्ध थी।
इसके बाद मुंबई में एक के बाद एक मिलें खुलीं और शहर तेजी से भारत के कॉटन उद्योग का केंद्र बन गया। 1862 तक बॉम्बे में चार कॉटन मिलें काम करने लगी थीं और आने वाले दशकों में इनकी संख्या तेजी से बढ़ी। यही वह दौर था जिसने भारतीय व्यापारियों को केवल व्यापारी से उद्योगपति बनने का रास्ता दिखाया।
क्या पहली सफल मिल आज भी चालू है?
Bombay Spinning and Weaving Company ने भारत के टेक्सटाइल उद्योग की मजबूत नींव जरूर रखी, लेकिन ये कंपनी और मिल आज अपने पुराने स्वरूप में ऑपरेट नहीं होती। समय के साथ मुंबई का टेक्सटाइल उद्योग बदलता गया, नई तकनीक आई, उत्पादन केंद्र दूसरे राज्यों में पहुंचे और कई पुरानी मिलें आर्थिक दबाव में बंद हो गईं या उनकी जमीनों का रिडेवलपमेंट हुआ।
इस तरह भारत की पहली मिल एक असफल शुरुआत थी, लेकिन पहली सफल मिल ने ऐसा उद्योग खड़ा किया जिसने आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक पहचान बदल दी।
