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    ये थीं भारत की पहली महारत्न कंपनियां, किसने लगाया था इस कैटेगरी के लिए दिमाग? देश की तरक्की में योगदान है मकसद

    Updated: Tue, 11 Aug 2026 10:57 AM (IST)

    महारत्न दर्जा भारत की सरकारी कंपनियों को तेजी से फैसले लेने और वैश्विक स्तर पर विस्तार करने की आर्थिक आजादी देता है। यह दिसंबर 2009 में शुरू हुआ, जिसम ...और पढ़ें

    कौन सी थीं भारत की शुरुआती महारत्न कंपनियां? (AI फोटो)

    कौन सी थीं भारत की शुरुआती महारत्न कंपनियां? (AI फोटो)

    HighLights

    1. महारत्न दर्जा CPSEs को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देता है

    2. दिसंबर 2009 में शुरू हुआ महारत्न सिस्टम

    3. पात्रता के लिए ₹25,000 करोड़ टर्नओवर जरूरी

    नई दिल्ली। भारत की सरकारी कंपनियों यानी Central Public Sector Enterprises (CPSEs) में ‘महारत्न’ दर्जा सबसे ऊंची श्रेणी है। यह सिर्फ सम्मान का तमगा नहीं, बल्कि बड़ी और मजबूत सरकारी कंपनियों को तेजी से फैसले लेने और देश-विदेश में विस्तार करने की ज्यादा आर्थिक आजादी देने का सरकारी ढांचा है।
    दिसंबर 2009 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने महारत्न कैटेगरी शुरू करने का फैसला किया और फरवरी 2010 में इसकी व्यवस्था लागू हुई। मई 2010 में सबसे पहले चार कंपनियों को महारत्न का दर्जा दिया गया।

    भारत की पहली महारत्न कंपनियां कौन थीं?

    महारत्न का दर्जा पाने वाली पहली चार कंपनियां थीं इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), NTPC, ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL)। इन कंपनियों को 19 मई 2010 को महारत्न का दर्जा देने के आदेश जारी हुए थे।

    इन चारों को चुनने के पीछे उनकी विशाल कारोबारी क्षमता, मजबूत वित्तीय स्थिति, राष्ट्रीय महत्व और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की क्षमता जैसे पहलू महत्वपूर्ण थे। बाद में इस सूची में BHEL, Coal India, GAIL समेत कई अन्य बड़ी सरकारी कंपनियां जुड़ती गईं।

    महारत्न कैटेगरी क्यों बनाई गई?

    महारत्न व्यवस्था के पीछे सोच यह थी कि जो सरकारी कंपनियां पहले से अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, उन्हें हर बड़े कारोबारी फैसले के लिए सरकार की मंजूरी का इंतजार न करना पड़े। सरकार ने इसे बड़े आकार की Navratna कंपनियों को ज्यादा अधिकार देकर घरेलू और वैश्विक बाजार में विस्तार करने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से शुरू किया।
    यानी लक्ष्य केवल कंपनियों को ‘बड़ा’ कहना नहीं था, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर के कॉरपोरेट प्रतिद्वंद्वियों से मुकाबला करने लायक निर्णय लेने की गति देना था।

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    इसके पीछे किसका दिमाग था?

    महारत्न कैटेगरी को किसी एक व्यक्ति की सोच नहीं कहा जा सकता। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक इसका ढांचा Department of Public Enterprises (DPE) ने तैयार किया और दिसंबर 2009 में केंद्र सरकार ने इसे मंजूरी दी। DPE वित्त मंत्रालय के तहत CPSEs की नीतियों, स्वायत्तता और प्रदर्शन से जुड़े नियमों का प्रमुख विभाग है।

    इस पूरी व्यवस्था की पृष्ठभूमि तत्कालीन सरकार की उस नीति से भी जुड़ी थी जिसमें अच्छा प्रदर्शन करने वाली लाभकारी सरकारी कंपनियों को ज्यादा Managerial और Commercial autonomy देने पर जोर था। इसलिए इसे किसी एक नेता के ‘दिमाग की उपज’ कहने के बजाय सरकारी नीति और DPE के संस्थागत प्रयास का परिणाम कहना ज्यादा सटीक है।

    आज भारत में कितनी महारत्न कंपनियां हैं? 

    क्रम संख्या कंपनी का नाम स्थापना वर्ष
    1 भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (बीएचईएल) 1964
    2 भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) 1952
    3 गेल इंडिया लिमिटेड (गेल) 1984
    4 कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) 1975
    5 हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) 1974
    6 स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (एसएआईएल) 1954
    7 नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनटीपीसी) 1975
    8 ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड (आरईसी) 1969
    9 पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (पीएफसी) 1986
    10 पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पावरग्रिड) 1989
    11। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) 1959
    12 ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी) 1956
    13 ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) 1959
    14 हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) 1964

    महारत्न कंपनियों की संख्या समय के साथ बढ़ी है, क्योंकि बेहतर प्रदर्शन करने वाली पात्र Navratna कंपनियों को इस श्रेणी में शामिल किया जाता रहा है।

    महारत्न कंपनी बनने के क्या फायदे हैं?

    महारत्न का सबसे बड़ा फायदा बोर्ड को मिलने वाली ज्यादा वित्तीय और प्रशासनिक आजादी मिलती है। सामान्य व्यवस्था में महारत्न कंपनियां बड़े निवेश, संयुक्त उपक्रम, सहायक कंपनियां, रणनीतिक साझेदारी और मानव संसाधन से जुड़े कई फैसले ज्यादा स्वतंत्रता के साथ ले सकती हैं।
    पारंपरिक व्यवस्था में महारत्न बोर्ड को एक परियोजना में ₹5,000 करोड़ तक निवेश की शक्ति दी गई है, निर्धारित सीमाओं और सरकारी दिशा-निर्देशों के अधीन।

    इसका सीधा फायदा यह है कि कंपनी बाजार के अवसरों पर तेजी से फैसला ले सकती है। हालांकि ये अधिकार ‘पूर्ण आजादी’ नहीं हैं और सरकार की व्यापक नीतियां व निर्धारित सीमाएं लागू रहती हैं। 2026 में Power Grid के मामले में सरकार ने उसकी कुछ निवेश शक्तियों की सीमा को विशेष रूप से ₹5,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹7,500 करोड़ प्रति सब्सिडियरी किया है।

    महारत्न बनने का क्राइटेरिया क्या है?

    किसी CPSE को महारत्न का दर्जा पाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शर्तें पूरी करनी होती हैं। सबसे पहले उसके पास Navratna का दर्जा होना चाहिए। कंपनी भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो और SEBI के नियमों के मुताबिक न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी रखती हो। इसके अलावा पिछले तीन वर्षों में उसका औसत वार्षिक टर्नओवर ₹25,000 करोड़ से ज्यादा, औसत वार्षिक नेटवर्थ ₹15,000 करोड़ से ज्यादा और औसत वार्षिक प्रॉफिट ₹5,000 करोड़ से ज्यादा होना चाहिए।
    साथ ही कंपनी की महत्वपूर्ण वैश्विक मौजूदगी या अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी होना जरूरी है। इन मानकों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महारत्न का दर्जा उन्हीं सरकारी कंपनियों को मिले जिनके पास बड़े पैमाने पर कारोबार संभालने, जोखिम लेने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरने की वास्तविक क्षमता हो।

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