क्या प्रमोटरों के निजी कर्ज में फंस सकती हैं देश की सभी लिस्टेड कंपनियां, फोर्टिस पर फैसले के बाद क्यों उठा ये मामला?
दिल्ली हाई कोर्ट का फोर्टिस हेल्थकेयर मामले में आया आदेश भारतीय कॉर्पोरेट जगत के लिए चिंता का विषय बन गया ...और पढ़ें
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फोर्टिस फैसले के बाद प्रमोटरों के निजी कर्ज में फंस सकती हैं लिस्टेड कंपनियां
HighLights
फोर्टिस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश चिंता का विषय।
प्रमोटरों के निजी कर्ज के लिए कंपनियों की जवाबदेही का खतरा।
कॉर्पोरेट वेल सिद्धांत पर संकट, व्यापार सुगमता पर असर।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| दिल्ली हाई कोर्ट का फोर्टिस हेल्थकेयर मामले में आया नया आदेश भारतीय कॉर्पोरेट जगत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है। प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म इनगवर्न की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इस आदेश का तर्क आगे भी लागू रहता है, तो देश की कोई भी लिस्टेड कंपनी अपने प्रमोटरों के निजी कर्ज और देनदारियों की चपेट में आ सकती है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद दाइची सांक्यो और फोर्टिस के पूर्व प्रमोटरों (सिंह बंधुओं) के बीच सिंगापुर आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के निष्पादन से जुड़ा है। अदालत ने फोर्टिस हेल्थकेयर के फोरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया है।
हालांकि कोर्ट का कहना है कि यह ऑडिट केवल तथ्यों की जांच के लिए है और इससे कंपनी पर कोई देनदारी तय नहीं होती, लेकिन इनगवर्न का मानना है कि इसके दूरगामी और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं।
इनगवर्न के अनुसार, अगर यह मिसाल कायम होती है, तो कंपनियों के बोर्ड और कंप्लायंस अधिकारियों से यह उम्मीद की जाने लगेगी कि वे अपने प्रमोटर-शेयरधारकों के निजी वादों और कर्जों पर नजर रखें और उन्हें पूरा कराएं। यह ऐसी जिम्मेदारी है, जो देश का कोई भी मौजूदा कानून उन पर नहीं डालता।
अब तक कॉर्पोरेट इंडिया इसी सिद्धांत पर काम करता आया है कि कोई भी कंपनी अपने प्रमोटरों के निजी मामलों की गारंटर नहीं होती है।
कॉर्पोरेट कानून के बुनियादी सिद्धांत पर संकट
इनगवर्न का कहना है कि यह आदेश कंपनी कानून के उस बुनियादी नियम को चुनौती देता है, जिसके तहत कंपनी और उसके प्रमोटर कानून की नजर में अलग-अलग इकाइयां होते हैं।
फर्म का आरोप है कि यह आदेश व्यवहार में फोर्टिस और सिंह बंधुओं को एक मान लेता है, भले ही अदालत यह कह रही हो कि उसने 'कॉरपोरेट वेल' (कंपनी और मालिकों के बीच का कानूनी पर्दा) नहीं हटाया है।
फर्म के मुताबिक, अगर कोर्ट बिना किसी औपचारिक मुकदमे या धोखाधड़ी के ठोस साबित हुए बिना, पब्लिक कंपनी और उसके पूर्व प्रमोटरों के बीच का फर्क मिटा देती है, तो इससे भारतीय कॉर्पोरेट कानून की पूरी बुनियाद हिल सकती है। फिलहाल यह मामला अदालत में विचाराधीन है और इस पर अगली सुनवाई 1 अप्रैल 2027 को तय है।
इनगवर्न का यह भी मानना है कि ऐसे मामलों का समाधान अदालतों के बजाय संस्थागत स्तर पर होना चाहिए, ताकि बिजनेस करने में आसानी (Ease of Doing Business) बनी रहे।
