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    HDFC का हिस्सा नहीं, इन 2 कंपनियों के मिलन से बना था IDFC First Bank; फ्रॉड का दाग लगने से पहले की कहानी जानें

    Updated: Mon, 23 Feb 2026 01:55 PM (IST)

    आईडीएफसी फर्स्ट बैंक हाल ही में ₹590 करोड़ के धोखाधड़ी मामले के कारण चर्चा में है, जिससे इसके शेयर 20% तक गिरे। यह लेख स्पष्ट करता है कि आईडीएफसी फर्स ...और पढ़ें

    HDFC का हिस्सा नहीं, इन 2 कंपनियों के मिलन से बना था IDFC First Bank; फ्रॉड का दाग लगने से पहले की कहानी जानें

    HDFC का हिस्सा नहीं, इन 2 कंपनियों के मिलन से बना था IDFC First Bank; फ्रॉड का दाग लगने से पहले की कहानी जानें

    HighLights

    1. बैंक में ₹590 करोड़ की धोखाधड़ी का मामला सामने आया।

    2. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के शेयर 20% तक गिरे।

    3. यह एचडीएफसी बैंक का हिस्सा नहीं, 2018 में विलय से बना।

    नई दिल्ली। IDFC First Bank इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। कारण है फ्रॉड का टैग लगना। फ्रॉड की जानकारी खुद बैंक ने दी। बैंक के चंडीगढ़ ब्रांच में हरियाणा सरकार के एक विभाग का अकाउंट था। उस अकाउंट से 590 करोड़ रुपये की हेर-फेर की गई।

    इस फ्रॉड केस का असर सोमवार को बैंक के शेयरों पर साफ दिखा। IDFC फर्स्ट बैंक के शेयर की कीमत सोमवार, 23 फरवरी को सुबह के कारोबार में 20% तक गिर गई। IDFC फर्स्ट बैंक के शेयर NSE पर ₹83.51 के पिछले बंद भाव के मुकाबले ₹75.16 पर खुले और लगभग 20% गिरकर ₹66.80 के इंट्राडे लो पर आ गए। इस गिरावट के बाद IDFC First Bank का मार्केट कैप 60,426.52 करोड़ रुपये रह गया है।

    इन सबके बीच लोगों के मन में एक सवाल उठ रहा है कि क्या IDFC First Bank, HDFC बैंक का पार्ट है? और यह बैंक कैसे बना था? आइए जानते हैं।

    क्या सच में HDFC Bank का हिस्सा है IDFC First Bank?

    यह पूरी तरह से गलत है। एचडीएफसी बैंक और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक दोनों अलग-अलग बैंक है। दोनों का मालिकाना हक अलग-अलग प्रमोटर्स के पास है। ये दोनों बैंक एक नहीं है। यानी यह गलत पूरी तरह से गलत है कि IDFC First Bank, एचडीएफसी का हिस्सा है।

    यह बात तो क्लियर हो गई कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक, एचडीएफसी बैंक का हिस्सा नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह बना कैसे थे? आइए इसके बारे में भी जान लेते हैं।

    1997 में बना था IDFC Limited?

    आज आप जिस IDFC First Bank के बारे में सुन रहे हैं उसकी नींव 1997 में ही पड़ गई थी। इस साल 1997 में भारत सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस करने के लिए  IDFC लिमिटेड की शुरुआत की थी। उस समय इसमें कई प्राइवेट प्लेयर भी शामिल थे। तब इसमें IDBI Bank की भी हिस्सेदारी था।

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    2015 में बना IDFC Bank

    2014 में, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने IDFC लिमिटेड को प्राइवेट सेक्टर में एक नया बैंक बनाने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी  दी। इसके बाद, IDFC लिमिटेड ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस एसेट्स और लायबिलिटीज़ को डीमर्जर के जरिए एक नई एंटिटी - IDFC बैंक - को बेच दिया। इस तरह, 2015 में IDFC के इंफ्रास्ट्रक्चर, लेंडिंग बिजनेस को IDFC बैंक में डीमर्जर करके IDFC बैंक बनाया गया।

    2018 में दो कंपनियों के मिलन के बाद बना IDFC First Bank

    IDFC लिमिटेड से IDFC बैंक लिमिटेड बना, जिसने 1 अक्टूबर, 2015 को बैंकिंग ऑपरेशन शुरू किया, जिसका शुरुआती फोकस भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग की कमी को पूरा करना था। हालांकि, रिटेल और MSME लेंडिंग में स्पेशलाइज़ेशन रखने वाली एक नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) कैपिटल फर्स्ट के साथ 2018 में मर्जर ने मिलकर बनी एंटिटी, IDFC FIRST बैंक को रिटेल बैंकिंग सेगमेंट में आगे बढ़ाया। यानी मूल रूप से बैंक की शुरुआत तो 2015 में हो गई थी। लेकिन 2018 में इसका कैपिटल फर्स्ट के साथ जब मर्जर हुआ तो बना IDFC First Bank।

    CAPITAL FIRST LTD को किसने बनाया था?

    2018 से पहले IDFC First Bank के बनने से पहले एक NBFC हुआ करती थी। नाम था CAPITAL FIRST LTD। लेकिन जब 2018 में IDFC Bank और कैपिटल फर्स्ट का मर्जर हुआ तो कैपिटल फर्स्ट एक अलग एंटिटी नहीं रही। अब सवाल यह है कि आखिर कैपिटल फर्स्ट के मालिक कौन थे? आइए लगे हाथ वो भी जान लेते हैं।

    कैपटिल फर्स्ट को जिस व्यक्ति ने खड़ा किया वो कोई और नहीं बल्कि वर्तमान में IDFC First Bank के MD और CEO वी. वैद्यनाथन हैं। अपनी कंपनी शुरू करने से पहले वह 2000-2009 तक ICICI बैंक के रिटेल बैंकिंग बिजनेस और फिर 2009-10 में ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के MD और CEO के तौर पर काम किया था।

    वी. वैद्यनाथन ने 2010 में एक NBFC में 10 फीसदी की हिस्सेदारी खरीदी। उस दौरान उस छोटी सी NBFC का मार्केट कैप लगभग 780 करोड़ रुपये थे। 10 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए उन्होंने अपना घर और खरीदे गए स्टॉक गिरवी रखे थे।

    वी. वैद्यनाथन ने NBFC को कैपिटल फर्स्ट के तौर पर रीब्रांड किया और इसे बड़े टिकट रियल एस्टेट फाइनेंसिंग से टेक-ड्रिवन रिटेल और MSME लेंडिंग में बदल दिया, जिसमें एनालिटिकल स्कोरकार्ड का इस्तेमाल करके केमिस्ट, किराना स्टोर, रेस्टोरेंट और लैपटॉप और वॉशिंग मशीन जैसे कंज्यूमर आइटम को फाइनेंस किया गया।

    2012 में, उन्होंने प्राइवेट इक्विटी फर्मों को एनालिटिक्स-ड्रिवन क्रेडिट मॉडल दिखाया और ₹810 करोड़ ($140m) की इक्विटी जुटाई, और चेयरमैन और CEO बने।

    कैपिटल फर्स्ट की रिटेल बुक 2010 में ₹94 करोड़ ($14m) से बढ़कर 2018 तक ₹29,600 करोड़ ($4b) हो गई, जिससे 7 मिलियन कस्टमर्स को फाइनेंसिंग मिली, और एसेट क्वालिटी भी अच्छी थी। यह ₹30 करोड़ के नुकसान से ₹358 करोड़ के मुनाफे में बदल गया, शेयर की कीमत ₹122 से बढ़कर ₹845 हो गई, और मार्केट कैप दस गुना बढ़कर ₹780 करोड़ से ₹8,200 करोड़ ($1b) हो गया।

    2017 में, उन्होंने कैपिटल फर्स्ट को खरीदने के लिए लिए गए ओरिजिनल लोन को चुकाने के लिए अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेच दिया। 2018 में, उन्होंने बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने के लिए कैपिटल फर्स्ट को IDFC बैंक के साथ मर्ज कर दिया और IDFC फर्स्ट बैंक के MD और CEO बन गए। तब से वह इस पद पर बने हुए हैं।

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