India-EU FTA के बीच भारत ने डॉलर से दूरी बनाई, US बॉन्ड बेच खरीद डाला सोना; ट्रंप को लगी मिर्ची?
US Treasury holdings: भारत ने अपनी विदेशी मुद्रा भंडार रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की होल्डिंग 5 साल के निचले स्तर प ...और पढ़ें

India-EU FTA के बीच भारत ने डॉलर से दूरी बनाई, US बॉन्ड बेच खरीद डाला सोना; क्या बदल रही अर्थव्यवस्था?

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नई दिल्ली| भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। हाल के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत की अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasuries) में होल्डिंग गिरकर करीब 174 अरब डॉलर रह गई है, जो पिछले 5 साल का सबसे निचला स्तर है। 2023 के पीक से यह लगभग 26% की गिरावट है।
अब भारत के कुल फॉरेक्स रिजर्व में अमेरिकी बॉन्ड की हिस्सेदारी घटकर करीब एक-तिहाई रह गई है, जो एक साल पहले लगभग 40% थी। ये खबर ऐसे समय सामने आई है, जब भारत-ईयू के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (India-EU FTA) हो गया है।
बदलाव को लेकर क्या बोले एक्सपर्ट?
इसे लेकर बैंक ऑफ नासाउ 1982 लिमिटेड के मुख्य अर्थशास्त्री विन थिन ने बताया कि, "यह बदलाव इसलिए हो रहा है, क्योंकि भारत डॉलर वाले निवेश पर निर्भरता कम करना चाहता है, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों (sanctions) का खतरा कम हो।" उन्होंने आगे कहा कि भारत के पास अभी भी ट्रेजरीज की मात्रा और कम करने की गुंजाइश है।"
आखिर भारत ने US बॉन्ड क्यों बेचे?
इस फैसले के पीछे दो बड़े कारण बताए जा रहे हैं। पहला- रुपया पर दबाव और दूसरा- रणनीतिक बदलाव।
रुपए पर दबाव: पिछले साल रुपया एशिया की कमजोर मुद्राओं में शामिल रहा। डॉलर के मुकाबले गिरावट रोकने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को बाजार में दखल देना पड़ा। US बॉन्ड बेचकर मिले डॉलर का इस्तेमाल रुपए को सपोर्ट करने में किया जा सकता है।
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रणनीतिक बदलाव: भारत अब अपने रिजर्व को सिर्फ डॉलर आधारित एसेट्स पर निर्भर नहीं रखना चाहता। भारत और दूसरे देशों के लिए यह सबक 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद आया, जब अमेरिका ने रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया।
भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा, जिससे अमेरिका (ट्रंप प्रशासन) नाराज हुआ और भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिए। ऐसे में भारत भी सैंक्शन रिस्क कम करने और रिजर्व को ज्यादा सुरक्षित व विविध बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
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भारत दुनिया का 7वां सबसे बड़ा गोल्ड रिजर्व होल्डर
RBI ने पिछले कुछ सालों में सोने की खरीद बढ़ाई है। भारत अब दुनिया का 7वां सबसे बड़ा गोल्ड रिजर्व होल्डर है।
| देश | सोना भंडार (टन, Q3 2025) |
| अमेरिका | 8,133.50 |
| जर्मनी | 3,350.30 |
| इटली | 2,451.80 |
| फ्रांस | 2,437 |
| रूस | 2,329.60 |
| चीन | 2,303.50 |
| भारत | 880.2 |
| जापान | 846 |
| तुर्किये | 641.3 |
| नीदरलैंड्स | 612.5 |
सोना इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह किसी एक देश की मुद्रा या नीति पर निर्भर नहीं होता।
भारत के अलावा कौन-कौन से देश बना रहे दूरी?
चीन, ब्राजील, पोलैंड समेत कई देश अमेरिकी बॉन्ड की हिस्सेदारी घटा रहे हैं और सोना बढ़ा रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार, दुनिया के करीब 60% केंद्रीय बैंक आने वाले 1-2 साल में डॉलर के विकल्प तलाशने की सोच रहे हैं।
क्या अमेरिका से तनाव का भी असर दिख रहा?
अमेरिका द्वारा रूस पर प्रतिबंध, वेनेजुएला पर कार्रवाई और डॉलर को सैंक्शन टूल की तरह इस्तेमाल करने से कई देशों में चिंता बढ़ी है। भारत ने रूस से तेल खरीद जारी रखी, जिस पर अमेरिका की नाराजगी भी सामने आई। इससे नीति निर्माताओं को लगा कि रिजर्व को ज्यादा सुरक्षित एसेट्स में रखना बेहतर है।
सबसे बड़ा सवालः क्या यह डॉलर से दूरी है?
फिलहाल पूरी तरह तो नहीं। डॉलर और US ट्रेजरी अभी भी दुनिया के सबसे बड़े और सुरक्षित बाजार माने जाते हैं। लेकिन भारत अब 'सारा पैसा एक टोकरी में नहीं' रखने की रणनीति पर चल रहा है।
तो आगे धीमी हो सकती US बॉन्ड की बिक्री
अगर रुपया स्थिर होता है या भारत-अमेरिका ट्रेड डील आगे बढ़ती है, तो US बॉन्ड की बिक्री की रफ्तार धीमी हो सकती है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि रिजर्व में सोने और अन्य एसेट्स की हिस्सेदारी बढ़ाने का ट्रेंड जारी रहेगा।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत का ये कदम सिर्फ निवेश बदलाव नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की नई रणनीति है- कम डॉलर निर्भरता, ज्यादा सोना, और ज्यादा संतुलित फॉरेक्स रिजर्व। दुनिया के कई अन्य बड़े देश भी डॉलर से दूरी बना रहे हैं।