17.5% का फॉर्मूला और 75 करोड़ कैश: 1947 में कैसे हुआ था भारत-पाकिस्तान की संपत्तियों का बंटवारा?
1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि सरकारी संपत्तियों और देनदारियों का भी जटिल बंटवारा था। पार्टीशन काउंसिल ने नकद, सेना, रेलवे और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों को विभाजित किया, जिसमें पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपये और 17.5% हिस्सा मिला।

भारत और पाकिस्तान के बीच कैसे हुआ संपत्तियों का बंटवारा?
HighLights
विभाजन परिषद ने संपत्तियों और देनदारियों का बंटवारा किया
पाकिस्तान को सरकारी खजाने से 75 करोड़ रुपये मिले
सेना, रेलवे और अन्य संपत्तियों का जटिल विभाजन हुआ
नई दिल्ली। 14 अगस्त 1947 की रात सोचिए एक ऐसा मुल्क, जो दशकों से एक प्रशासन के तहत चल रहा था, अचानक दो नए देशों में बदलने वाला था। नक्शे पर खिंची एक लकीर ने सिर्फ पंजाब और बंगाल को नहीं बांटा, बल्कि सरकारी खजाने, सेना, रेलवे, दफ्तरों के सामान, हथियारों से लेकर कर्ज, कैश और पेंशन की जिम्मेदारियों तक का हिसाब मांग लिया। सवाल था - आखिर पुराने भारत की संपत्ति में किसका कितना हिस्सा होगा? इस काम को पूरा करना जमीन की लकीर खींचने से कहीं ज्यादा जटिल था।
बंटवारे के लिए बनी अलग व्यवस्था
भारत के विभाजन के साथ सरकारी संपत्तियों और देनदारियों को दो डोमिनियन के बीच बांटने के लिए Partition Council और उससे जुड़ी समितियों ने काम किया। इसकी अध्यक्षता वायसराय और बाद में दोनों डोमिनियनों के गवर्नर-जनरल रहे लॉर्ड माउंटबेटन ने की।
भारत और पाकिस्तान की ओर से वरिष्ठ नेताओं और अधिकारियों ने इसमें हिस्सा लिया। संपत्ति के हर वर्ग के लिए एक जैसा फार्मूला नहीं था। सरकारी नकदी, कर्ज, सैन्य सामान, रेलवे, डाक, पेंशन और दूसरी चल-अचल संपत्तियों के लिए अलग-अलग समझौते और व्यवस्थाएं बनाई गईं।
सामान्य संपत्तियों के लिए 17.5 प्रतिशत का हिस्सा
वित्तीय समझौते के तहत पाकिस्तान को अविभाजित ब्रिटिश भारत की संपत्तियों और देनदारियों का 17.5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित किया गया था। हालांकि इसका मतलब यह नहीं था कि हर कुर्सी, टेबल, बल्ब, इमारत, मशीन या रेलवे लाइन को ठीक 82.5:17.5 के अनुपात में काट दिया गया।
जहां किसी संपत्ति की फिजिकल स्थिति स्पष्ट थी, वहां उसे संबंधित देश को सौंपने की व्यवस्था की गई। दूसरी तरफ साझा या केंद्रीय संस्थानों की संपत्तियों और देनदारियों के लिए अलग हिसाब लगाया गया। सार्वजनिक कर्ज की जिम्मेदारी भी समझौते का हिस्सा थी।
सरकारी खजाने में पाकिस्तान को मिले 75 करोड़
सबसे चर्चित हिस्सा कैश का था। विभाजन के समय अविभाजित भारत के सरकारी कैश सरप्लस को लेकर अलग समझौता हुआ और पाकिस्तान का हिस्सा 75 करोड़ रुपये तय किया गया। इसमें से 20 करोड़ रुपये 14-15 अगस्त 1947 के आसपास शुरुआती कार्यशील पूंजी के तौर पर उपलब्ध कराए गए, जबकि बाकी 55 करोड़ रुपये बाद में दिए जाने थे।
यह रकम कुछ समय के लिए कश्मीर संघर्ष को लेकर भारत-पाकिस्तान के विवाद में अटक गई। जनवरी 1948 में भारत सरकार ने महात्मा गांधी की पहल के बाद बाकी रकम जारी करने का फैसला किया।
सेना और हथियारों का हिसाब भी हुआ
बंटवारे के समय सबसे मुश्किल कामों में से एक ब्रिटिश इंडियन आर्मी का विभाजन था। सैनिकों को उनकी पसंद, क्षेत्रीय परिस्थितियों और सैन्य इकाइयों की संरचना के आधार पर दोनों देशों की सेनाओं में भेजा गया। सेना के साथ हथियार, सैन्य भंडार, परिवहन साधन, प्रतिष्ठान और ऑर्डनेंस से जुड़ी संपत्तियों का भी बंटवारा हुआ।
लेकिन यहां भी कोई साधारण 82.5:17.5 फार्मूला लागू नहीं था। सैन्य संपत्तियों के स्थान, उपयोग और इकाइयों की संरचना को ध्यान में रखकर बांटा गया। इसी कारण सैन्य बंटवारा वित्तीय संपत्तियों से अलग और बेहद जटिल प्रक्रिया बना।
रेलवे, डाक, पेंशन और संस्थानों का बंटवारा
बंटवारा सिर्फ खजाने और सेना तक सीमित नहीं था। रेलवे, डाक व्यवस्था, सरकारी विभाग, पेंशन, स्टर्लिंग बैलेंस, ऑर्डनेंस फैक्ट्रियां और दूसरी पब्लिक प्रॉपर्टीज भी समझौते के दायरे में थीं। जहां कोई संपत्ति पाकिस्तान के इलाके में थी, वहां उसके हस्तांतरण और मूल्यांकन की व्यवस्था की गई।
दूसरी तरफ कई केंद्रीय संस्थाओं को तुरंत दो हिस्सों में बांटना संभव नहीं था। यही वजह थी कि कुछ व्यवस्थाएं ट्रांजिशन पीरियड में साझा रहीं। उदाहरण के लिए, आजादी के बाद भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कुछ समय तक पाकिस्तान के लिए केंद्रीय बैंकिंग और करेंसी सेवाएं जारी रखीं।
सबसे कठिन था छोड़ी गई निजी संपत्ति का सवाल
सरकारी संपत्तियों का हिसाब किसी तरह समझौते से तय किया जा सकता था, लेकिन लाखों लोगों के पलायन के बाद छोड़ी गई प्राइवेट जमीन, मकान, दुकानें और कारोबार कहीं ज्यादा पेचीदा मामला बन गए। लोग एक देश से दूसरे देश चले गए और पीछे उनकी संपत्तियां रह गईं।
इन संपत्तियों का निपटारा बाद के वर्षों में अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से हुआ। इसलिए 1947 के बंटवारे को केवल 'जमीन का बंटवारा' कहना अधूरा है। वास्तव में यह एक विशाल एडमिनिस्ट्रेटिव रिस्ट्रक्चरिंग था, जिसमें पैसा, कर्ज, सेना, इंस्टीट्यूशन और सरकारी संपत्तियां भी दो नए देशों के बीच बांटनी पड़ीं।
