Mukesh Ambani को ₹500 के फोन के लिए ले गया था कोर्ट, अब अदालत ने फाइनल कर दिया केस; आखिर कौन है ये शख्स?
ओडिशा हाईकोर्ट ने Mukesh Ambani और रिलायंस इंडस्ट्रीज को 23 साल पुराने एक मामले में राहत दी है। राउरकेला के प्रफुल्ल कुमार मिश्रा ने 2003 में खराब मोब ...और पढ़ें
HighLights
ओडिशा हाईकोर्ट ने मुकेश अंबानी को 23 साल बाद राहत दी।
शिकायतकर्ता प्रफुल्ल मिश्रा पर 1,000 रुपये का जुर्माना लगा।
कोर्ट ने इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।
नई दिल्ली। Mukesh Ambani News: भारत के सबसे अमीर अरबपति मुकेश अंबानी के खिलाफ कोर्ट में जाना ही अपने आप में एक बड़ी बात होती है। अक्सर बड़े-बड़े दिग्गज भी कतराते हैं। लेकिन 23 साल पहले एक शख्स उन्हें कोर्ट की दहलीज पर ले गया था। विवाद ज्यादा बड़ा नहीं था, लेकिन फिर भी वह शख्स पीछे नहीं हटा और मुकेश अंबानी और उनकी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। वो भी एक बार नहीं कई बार। अब उसी मामले में ओडिशा हाईकोर्ट ने एशिया के सबसे अमीर अरबपति (Asia Richest Man Mukesh Ambani) और उनकी कंपलनी को राहत दी है।
23 साल से चले आ रहे इस मामलू विवाद को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई पर अब आखिरकार विराम लग गया है। ओडिशा हाईकोर्ट ने मुकेश अंबानी और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ दर्ज शिकायत को खारिज कर दिया है और शिकायतकर्ता पर 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
2003 से शुरू हुआ था विवाद
यह मामला साल 2003 का है, जब राउरकेला के रहने वाले प्रफुल्ल कुमार मिश्रा ने रिलायंस इंफोकॉम की एक स्कीम के तहत 501 रुपये देकर मोबाइल कनेक्शन लिया था। इस स्कीम को उस समय 'Kar Lo Duniya Mutthi Mein' नाम से प्रचारित किया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे जो मोबाइल हैंडसेट मिला, वह खराब था और टेलीकॉम सेवाएं भी ठीक से नहीं मिलीं।
इसके बाद प्रफुल्ल कुमार मिश्रा ने सीधे मुकेश अंबानी और कंपनी के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कर दी। यही विवाद अगले दो दशकों तक कोर्ट में अलग-अलग रूप में चलता रहा।
RIL और अंबानी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और SDJM, पानपोश के सामने चल रहे मामले को रद्द करने की मांग की थी। यह मामला राउरकेला के रहने वाले प्रफुल्ल कुमार मिश्रा की शिकायत के बाद 27 जनवरी को जारी किए गए समन से जुड़ा था।
खबरें और भी
कई बार खारिज हो चुकी थी शिकायत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बताया कि: 2003 और 2004 में दायर पहली दो शिकायतें पहले ही खारिज हो चुकी थीं। 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन फैसलों को बरकरार रखा है। 2016 में भी अदालत ने अंबानी को आरोपी बनाने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद 2025 में फिर से नई शिकायत दायर कर दी गई। यानि एक ही मामले को बार-बार अलग-अलग तरीकों से उठाया गया।
हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
जस्टिस संजीब के. पाणिग्रही ने इस मामले को “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ 501 रुपये के विवाद को लेकर 20 साल से ज्यादा समय तक आपराधिक मुकदमा चलाना गलत है। किसी बड़ी कंपनी के चेयरमैन को बिना सीधे संबंध के आरोपी नहीं बनाया जा सकता। आपराधिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत होती है, सिर्फ पद के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर इस तरह के मामलों को अनुमति दी जाए, तो कोई भी व्यक्ति छोटी-छोटी समस्याओं के लिए बड़े पदों पर बैठे लोगों को कोर्ट में घसीट सकता है।
निचली अदालत पर भी उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने उस निचली अदालत की भी आलोचना की, जिसने जनवरी 2026 में फिर से समन जारी कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि समन जारी करना एक गंभीर प्रक्रिया है और पहले के मामलों की जांच किए बिना ऐसा करना गलत है
शिकायतकर्ता पर जुर्माना
अदालत ने शिकायतकर्ता प्रफुल्ल कुमार मिश्रा पर 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यह राशि ओडिशा स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के जुवेनाइल जस्टिस फंड में जमा कराई जाए।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति की शिकायत कितनी भी गहरी क्यों न हो, वह कानून का दुरुपयोग करके बार-बार उसी मामले में आपराधिक कार्रवाई नहीं कर सकता। इस फैसले के साथ ही मुकेश अंबानी और रिलायंस इंडस्ट्रीज को इस लंबे मामले से पूरी तरह राहत मिल गई है।