'हमें रतन टाटा स्वीकार नहीं'..! कौन थे रुसी मोदी और दरबारी सेठ, जिन्होंने टाटा ग्रुप में की थी सबसे बड़ी बगावत?
टाटा समूह में रतन टाटा और रुसी मोदी व दरबारी सेठ के बीच सत्ता को लेकर बड़ा संघर्ष हुआ। रतन टाटा ने रिटायरमेंट पॉलिसी लागू कर इन 'सत्रपों' के एकाधिकार को खत्म कर दिया।

दरबारी सेठ, रुसी मोदी और रतन टाटा (बाएं से दाएं)
HighLights
रुसी मोदी और दरबारी सेठ ने रतन टाटा का विरोध किया था।
रतन टाटा ने रिटायरमेंट पॉलिसी लागू कर एकाधिकार तोड़ा।
इसके बाद टाटा ग्रुप से रिटायर हुए रुसी मोदी और दरबारी सेठ।
नई दिल्ली। सत्ता और शक्ति के संघर्ष को लेकर टाटा समूह (Tata Group) एक बार फिर से सुर्खियों में है। एन चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच चले आ रहे टकराव के बाद आखिरकार एन चंद्रशेखरन ने कुर्सी छोड़ दी। हालांकि, टाटा ग्रुप में सत्ता और कुर्सी का यह किस्सा पहला नहीं है इससे पहले भी देश के इस मशहूर औद्योगिक घराने ने एक 'पावर स्ट्रगल' देखा था। वह 90 के दशक का दौर था जब रुसी मोदी (Russi Mody) और दरबारी सेठ (Darbari Seth), जिन्होंने उत्तराधिकारी के तौर पर रतन टाटा को कड़ी चुनौती दी थी।
आपको जानकर हैरानी होगी कि रुसी मोदी और दरबारी सेठ को टाटा ग्रुप का 'सत्रप' यानी गवर्नर कहा जाता था, जो कंपनियों में अपनी सत्ता और कानून चलाते थे। रुसी मोदी और दरबारी सेठ, भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास और टाटा ग्रुप में दो सबसे दिग्गज, ताकतवर और मशहूर अधिकारी थे।
क्यों कहलाए 'सत्रप'?
जे.आर.डी. टाटा के दौर में रुसी मोदी और दरबारी सेठ का जलवा था। उस समय रतन टाटा से लोग ज्यादा वाकिफ नहीं थे। इन दोनों को टाटा ग्रुप का 'सत्रप' कहा जाता था। क्योंकि, ये इतने ताकतवर थे कि ये टाटा की अपनी-अपनी कंपनियों को किसी स्वतंत्र साम्राज्य की तरह चलाते थे।
रतन टाटा से क्यों हुआ सत्ता का संघर्ष?
सत्ता का जो संघर्ष आज एन चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच हुआ। वह 40 साल पहले रतन टाटा बनाम रुसी मोदी व दरबारी सेठ के दरमियान हुआ था। रतन टाटा, रुसी मोदी और दरबारी सेठ के बीच हुई इस लड़ाई को कॉर्पोरेट जगत के सबसे बड़े 'पावर स्ट्रगल' के तौर पर जाना जाता है।
दरअसल, साल 1991 में जब जे.आर.डी. टाटा ने रिटायर होकर रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी चुना, तब रुसी मोदी, दरबारी सेठ और अजित केलकर जैसे दिग्गजों ने इसका कड़ा विरोध किया था। इन दिग्गजों का मानना था कि उनके पास रतन टाटा से ज्यादा अनुभव है और वे अपनी कंपनियों में रतन टाटा का दखल नहीं चाहते थे।
रतन टाटा ने कैसे तोड़ा 'सत्रपों' का एकाधिकार
तमाम विरोध के बावजूद जेआरडी टाटा ने रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी चुन लिया। लेकिन, रतन टाटा समझ चुके थे कि रुसी मोदी और दरबारी सेठ के रहते हुए उनकी मुश्किलें बरकरार रहेंगी। उन्होंने भांप लिया कि टाटा ग्रुप को एक सूत्र में बांधने के लिए इन 'सत्रपों' का एकाधिकार तोड़ना जरूरी है। इसके लिए रतन टाटा ने टाटा ग्रुप में 'रिटायरमेंट पॉलिसी' लागू कर दी, जिसके तहत चेयरमैन पद के लिए 75 वर्ष और एमडी के लिए 65 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित की गई।
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इस नियम के लागू होने के बाद रुसी मोदी, 1993 में) और दरबारी सेठ, 1994 में रिटायर हो गए, और फिर टाटा ग्रुप में रतन टाटा का दौर आया, जो 1991 से 2012 तक चला। इस अवधि में उन्होंने ने टाटा ग्रुप का आधुनिकीकरण और इस औद्योगिक समूह को नई उंचाइयों पर पहुंचाया।
