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बिहार के इस सुपरफूड के मुरीद हुए विदेशी! अमेरिका से लेकर जर्मनी तक बढ़ रही डिमांड; 12000 करोड़ के पार पहुंचा बिजनेस?

Updated: Fri, 21 Aug 2026 10:48 AM (IST)

कभी व्रत तक सीमित रहने वाला मखाना अब वैश्विक सुपरफूड बन गया है, जिसकी 80-85% वैश्विक आपूर्ति बिहार से होती है।

अमेरिका से लेकर जर्मनी तक बढ़ रही डिमांड

अमेरिका से लेकर जर्मनी तक बढ़ रही डिमांड

HighLights

  1. बिहार वैश्विक मखाना आपूर्ति का 80-85% नियंत्रित करता है।

  2. मखाना का निर्यात 40% है, मुख्य रूप से अमेरिका, कनाडा, यूएई को।

  3. 2029-30 तक मखाना बाजार ₹12,000 करोड़ तक पहुंचेगा।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: अगर आप सोचते हैं कि दुनिया भर के बाजारों में सबसे ज्यादा डिमांड सिर्फ सोने, चांदी या कच्चे तेल की है, तो आप गलत हैं। इन दिनों भारत के एक छोटे से राज्य के तालाबों में पैदा होने वाला एक खास 'सफेद मोती' पूरी दुनिया में तहलका मचा रहा है। अमेरिका से लेकर जर्मनी तक, विदेशी लोग इसके दीवाने हो चुके हैं। आलम यह है कि ग्लोबल मार्केट का 80 से 85% हिस्सा सीधे तौर पर भारत के सिर्फ एक राज्य से कंट्रोल हो रहा है।

बात हो रही है मखाने (Makhana) की। कभी भारत में सिर्फ व्रत-उपवास और पारंपरिक खान-पान तक सीमित रहने वाला मखाना, आज दुनिया का सबसे प्रीमियम और प्लांट-बेस्ट फूड बन चुका है।

कितना बढ़ा प्रोडक्शन?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया की कुल सप्लाई का 80 से 85% हिस्सा और देश के कुल उत्पादन का तीन चौथाई (75%) अकेले बिहार से आता है।

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन (MT) था। वहीं, 2025-26 के एडवांस अनुमानों के मुताबिक यह बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन हो गया है। 2025-26 के कुल 80.590 MT में से 60,000 मीट्रिक टन मखाना सिर्फ बिहार में पैदा हुआ है। बिहार के कोसी, मिथिला और सीमांचल क्षेत्रों में इसकी भारी खेती होती है। सबसे ज्यादा उत्पादन कटिहार में 12,620 मीट्रिक टन और पूर्णिया में 11,228 मीट्रिक टन दर्ज किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान बनाने के लिए मिथिला मखाना को सरकार द्वारा GI टैग भी मिल चुका है। इसके अलावा 'स्वर्ण वैदेही' और 'सबौर मखाना-1' जैसी नई किस्मों और 'फील्ड सिस्टम फार्मिंग' ने उत्पादकता को 2.03 MT से बढ़ाकर 2.34 MT प्रति हेक्टेयप कर दिया है।

एक्सपोर्ट और कमाई के आंकड़ें

साल 2025 में सरकार में मखाने के एक्सपोर्ट को ट्रैक करने के लिए एक अलग 'HSN कोड' जारी किया, जिसके बाद जो आंकड़े सामने आए, वो हैरान करने वाले हैं। भारत अपनी कुल मखाना उपज का लगभग 40% हिस्सा ( करीब 23,000 से 25,000 मीट्रिक टन) दुनिया भर के एक्सपोर्ट करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने ₹19,296.08 लाख (₹192.96 करोड़) की वैल्यू का कुल 7,264.89 मीट्रिक टन पॉप्ड मखाना निर्यात किया है।

भारत के कुल मखाना एक्सपोर्ट का 77% हिस्सा सिर्फ तीन देशों में जाता है, अमेरिका (40%), कनाडा (20%) और UAE (17%)। भले ही थोक में एक्सपोर्ट हो रहा है, लेकिन प्रीमियम बाजारों में मखाना सोने के भाव बिकता है। अमेरिकी में इसका औसत दाम 19.5 डॉलर (लगभग ₹1635) प्रति किलो है, जबकि जर्मनी जैसे प्रीमियम मार्केट में मखाना 26 डॉलर (लगभग ₹2180) प्रति किलो के भारी-भरकम भाव पर बिक रहा है।

₹500 से ₹1250 हुए दाम

सिर्फ विदेश ही नहीं घरेलू बाजार में 2021-22 से 2024-25 के बीच डिमांड में सालाना 17-18% की भयंकर तेजी देखी गई लेकिन उत्पादन सिर्फ 4-5% बढ़ा। सप्लाई की कमी के कारण 2020-22 के दौरान जो मखाना औसतन ₹500 प्रति किलो बिकता था वह 2025 से बढ़कर ₹1250 प्रति किलो के पार पहुंच गया है।

भारत में हर महीने 3000 से 3500 MT मखाने की खपत होती है, जो त्योहारी सीजन में उछलकर 5000 MT तक पहुंच जाती है।एक्सपोर्ट और घरेलू खपत को देखते हुए अनुमान लगाया गया है कि 2029-30 तक भारत का मखाना बाजार ₹11,000 से ₹12,000 करोड़ के महाकाय साम्राज्य में तब्दील हो जाएगा। ब्रांडेड कंपनियां (FMCG) इसमें से हर महीने करीब 1,800 से 2,000 मीट्रिक टन मखाना पैक करके बेच रही हैं।

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