Salary vs Savings Account: सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में क्या है अंतर, किस खाते में मिलते हैं 8 बड़े फायदे?
यह लेख सैलरी और सेविंग अकाउंट के बीच के अंतर को समझाता है, साथ ही सैलरी अकाउंट के कई फायदों ...और पढ़ें

Salary vs Savings Account: सैलरी और सेविंग्स अकाउंट में क्या है अंतर, किस खाते में मिलते हैं 8 बड़े फायदे?

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बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर दो अकाउंट बहुत ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं। पहला सेविंग्स अकाउंट और दूसरा सैलरी अकाउंट। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन दोनों अकाउंट के बीच क्या अंतर है? कई बार लोग सैलरी अकाउंट में ऐसी गलतियां कर देतें हैं, जो नौकरी छोड़ने के बाद काफी दिक्कत दे सकती हैं। ऐसे में आइए आपको समझाते हैं कि दोनों अकाउंट में क्या अंतर है और आपको इनसे क्या-क्या फायदा मिल सकता है।
क्या होते हैं सैलरी-सेविंग्स अकाउंट?
आसान भाषा में कहें तो सेविंग्स अकाउंट एक ऐसा आम बैंक अकाउंट है जो आपके पैसे सुरक्षित रखता है और उस पर ब्याज देता है, जिससे ये शॉर्ट-टर्म सेविंग्स और इमरजेंसी फंड के लिए बेस्ट माना जाता है। वहीं, सैलरी अकाउंट एक स्पेशल टाइप का सेविंग्स अकाउंट होता है जिसे कंपनी (एम्प्लॉयर) अपने कर्मचारियों के लिए खुलवाती है। इसमें सैलरी आने के साथ-साथ ज़ीरो-बैलेंस और कई प्रीमियम फीचर्स मिलते हैं।
सैलरी अकाउंट से क्या फायदा?
कर्मचारियों को सैलरी अकाउंट के कई सारे फायदे मिलते हैं। जैसे कि-
- इसमें हर महीने मिनिमम बैलेंस बनाए रखने की कोई झंझट नहीं होती।
- कई बार इसमें ज्यादा विड्रॉल लिमिट वाला डेबिट कार्ड और अनलिमिटेड फ्री एटीएम ट्रांज़ैक्शन मिलते हैं।
- कुछ बैंकों में हर महीने ब्याज मिलने से सेविंग्स पर बेहतर रिटर्न मिलता है।
- कई सैलरी खातों के साथ पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस कवर भी मुफ्त मिलता है।
- चेक बुक, कम एसएमएस अलर्ट चार्ज, और कंपनी के साथ बैंक की डील के हिसाब से एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस जैसे फायदे भी मिल जाते हैं।
- इन सबके अलावा, इस अकाउंट को खुलवाने के लिए बैंकों के चक्कर नहीं काटने पड़ते, साथ ही बाकी सारे प्रोसेस भी जल्दी हो जाते हैं।
सैलरी अकाउंट vs सेविंग्स अकाउंट
| पहलू | सैलरी अकाउंट | सेविंग्स अकाउंट |
| योग्यता | सिर्फ सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए | आम जनता के लिए, इसके लिए कोई खास नौकरी का सबूत नहीं चाहिए |
| मिनिमम बैलेंस | आमतौर पर कोई मिनिमम बैलेंस की ज़रूरत नहीं | आमतौर पर एक तय मिनिमम बैलेंस रखना जरूरी |
| ब्याज दरें | बैंक की पॉलिसी के मुताबिक | बैंक की पॉलिसी के मुताबिक |
| सुविधाएँ | सैलरी क्रेडिट और कई प्रीमियम एक्स्ट्रा फायदे | सीमित फायदों के साथ स्टैंडर्ड बैंकिंग सुविधाएं |
| ओवरड्राफ़्ट | अक्सर ओवरड्राफ़्ट की सुविधा आसानी से मिल जाती है | ओवरड्राफ़्ट की सुविधा सीमित या न के बराबर होती है |
मालूम हो कि ज्यादातर नौकरीपेशा लोग अपना बैंक अकाउंट खुद नहीं चुनते। ऑफिस का एचआर जिस बैंक में कहता है, वहां आधार कार्ड, पैन कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज देकर, कर्मचारी तुरंत अकाउंट खुलवा लेते हैं। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब आप नौकरी बदलते हैं, करियर में ब्रेक लेते हैं, या किसी दूसरे शहर शिफ्ट होते हैं।
अक्सर लोग म्यूचुअल फंड की एसआईपी (SIP) या इंश्योरेंस प्रीमियम जैसे जरूरी ऑटो-डेबिट पेमेंट अपने सैलरी अकाउंट से ही लिंक कर लेते हैं, जो कि एक बड़ी गलती साबित हो सकती है। नौकरी बदलने पर नई कंपनी का बैंक अलग हो सकता है, और पुराना सैलरी अकाउंट कुछ महीनों तक सैलरी न आने पर सेविंग्स अकाउंट में बदलकर चार्ज वसूलने लगता है। इससे आपके सारे फाइनेंशियल कमिटमेंट्स गड़बड़ा सकते हैं।
बेहतर यही है कि सैलरी अकाउंट के फायदों के साथ-साथ अपना एक अलग स्टैंडर्ड सेविंग्स अकाउंट भी जरूर चालू रखें। अपने सभी लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल ट्रांज़ैक्शन, निवेश और जरूरी पेमेंट हमेशा उसी पर्सनल सेविंग्स अकाउंट से करें जिसका नेटवर्क पूरे देश में फैला हो, ताकि नौकरी बदलने पर भी आपकी बैंकिंग लाइफ पर कोई असर न पड़े।
(नोटः लेखक सुशील जैन, पर्सनल सीएफओ कंसल्टेंट एलएलपी, के फाउंडर और सीईओ हैं।)
