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धेनु बिल्डकॉन पर सेबी का शिकंजा! 25 करोड़ से किया गया 1000 करोड़ का खेल? मार्केट कैपिटल पहुंच गई आसमान पर

Updated: Thu, 20 Aug 2026 10:06 AM (IST)

सेबी ने धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा पर 25 करोड़ रुपये को घुमाकर 1,000 करोड़ रुपये का फर्जी असुरक्षित कर्ज दिखाने का ...और पढ़ें

धेनू बिल्डकॉन पर कसा सेबी का शिकंजा (AI फोटो)

धेनू बिल्डकॉन पर कसा सेबी का शिकंजा (AI फोटो)

HighLights

  1. सेबी ने धेनु बिल्डकॉन पर 1000 करोड़ के फर्जी कर्ज का आरोप लगाया

  2. 25 करोड़ रुपये को घुमाकर बनाया गया था यह फर्जीवाड़ा

  3. सुरेंद्र और वीरेंद्र जैन पर हेरफेर का संचालन करने का आरोप

नई दिल्ली। कल्पना कीजिए, एक खाते से 25 करोड़ रुपये निकलते हैं। पैसा एक कंपनी में जाता है, फिर दूसरी में, तीसरी में और देखते ही देखते वही रकम कई खातों से होकर बार-बार घूमती रहती है। कागजों पर हर चक्कर एक नया लेनदेन नजर आता है, लेकिन असल में रकम वही रहती है।
अगर इस रकम को बार-बार घुमाकर 1,000 करोड़ रुपये के कर्ज जैसा दिखाया जाए, तो तस्वीर कैसी बनेगी? भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) का आरोप है कि धेनु बिल्डकॉन इंफ्रा (Dhenu Buildcon SEBI Action) से जुड़े मामले में कुछ ऐसा ही हुआ।

कैसे हुआ हेरफेर?

सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वार्ष्णेय द्वारा पारित एक आदेश में नियामक ने आरोप लगाया है कि धेनु बिल्डकॉन ने आपस में जुड़ी संस्थाओं के एक नेटवर्क के जरिए 25 करोड़ रुपये की मूल राशि को बार-बार घुमाया और इस तरह करीब 1,000 करोड़ रुपये के वास्तविक असुरक्षित कर्ज की तस्वीर पेश की गई।
नियामक के मुताबिक, इस कथित व्यवस्था को सुरेंद्र कुमार जैन और वीरेंद्र जैन संचालित कर रहे थे। इसमें धेनु बिल्डकॉन के अलावा उससे जुड़ी कई संस्थाएं भी शामिल थीं।

कैसे बना 1,000 करोड़ रुपये के कर्ज का ट्रेल?

सेबी के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में धेनु बिल्डकॉन को सात संस्थाओं से कथित तौर पर 1,000 करोड़ रुपये का असुरक्षित कर्ज मिला। इसके बाद दिसंबर 2025 में कंपनी ने इनमें से छह संस्थाओं के कथित 840 करोड़ रुपये के कर्ज को प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट के जरिए इक्विटी में बदल दिया। लेकिन बैंक खातों की जांच में नियामक को कुछ और ही तस्वीर दिखाई दी।

25 करोड़ के फंड का खेल

सेबी का कहना है कि 1,000 करोड़ रुपये का फंड फ्लो किसी वास्तविक नए कैपिटल फ्लो के बजाय आपस में जुड़ी संस्थाओं के खातों के जरिए 25 करोड़ रुपये की एक ही मूल राशि को अलग-अलग स्तरों पर बार-बार घुमाने से तैयार किया गया था।
इतना ही नहीं, सेबी के मुताबिक शुरुआती 25 करोड़ रुपये भी अन्य संबंधित संस्थाओं से जुड़े संदिग्ध फंड लेनदेन से आए थे।

कंपनियों के बीच कनेक्शन ने बढ़ाया शक

फंड ट्रेल के एनालिस्ट्स के आधार पर नियामक ने प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला कि ये कर्ज वास्तविक लेनदेन नहीं थे। इसी आधार पर सेबी ने आरोप लगाया कि 840 करोड़ रुपये का प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट भी किसी वास्तविक वित्तीय लेनदेन के बिना किया गया।
जांच के दौरान सेबी ने धेनु बिल्डकॉन, कर्जदाताओं, प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट पाने वाली संस्थाओं और कंपनी से पैसा हासिल करने वाली अन्य संस्थाओं के बीच कई समानताएं भी पाईं।

इनमें समान पते, समान निदेशक, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता और एक जैसी बैंक शाखाओं का इस्तेमाल शामिल था। नियामक ने यह भी कहा कि इन संस्थाओं के बीच बड़े पैमाने पर एक-दूसरे की शेयरहोल्डिंग मौजूद थी। सेबी के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क में शामिल कई संस्थाएं डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से सुरेंद्र जैन और वीरेंद्र जैन के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंधन में थीं।

चैट और कॉल रिकॉर्ड का भी जिक्र

सेबी ने एक अलग मामले में हुई तलाशी और जब्ती के दौरान बरामद चैट मैसेज और कॉल रिकॉर्ड का भी अपने आदेश में उल्लेख किया है। नियामक का कहना है कि इन रिकॉर्ड्स से इस नेटवर्क पर नियंत्रण के संकेत मिले।
संस्थाओं के पंजीकृत परिसरों में छापेमारी में भी सेबी को सवाल खड़े करने वाली स्थितियां मिलीं।
नियामक के मुताबिक, कई संस्थाओं की असल फिजिकल मौजूदगी और ठोस मजबूत गतिविधियों का आधार ही दिखाई नहीं दिया। यानी फर्जी कंपनियां चल रही हैं।

बढ़ते बाजार वैल्यूएशन के बीच हुए लेनदेन

सेबी ने यह भी रेखांकित किया कि ये लेनदेन ऐसे समय में हुए जब धेनु बिल्डकॉन की मार्केट वैल्यूएशन में तेज बढ़ोतरी देखी जा रही थी। फिलहाल, ये सेबी के अंतरिम आदेश में दर्ज प्रथम दृष्टया आरोप और निष्कर्ष हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष नियामकीय प्रक्रिया के आगे बढ़ने के बाद ही तय होगा।

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