विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

ससुराल से अलग रहने की जिद पर अड़ी थी पत्नी; छत्तीसगढ़ HC बोला- बीमार मां को न छोड़ना क्रूरता नहीं, तलाक मंजूर

Updated: Wed, 02 Sep 2026 09:57 AM (GMT+05:30)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पति का बूढ़ी और बीमार मां को न छोड़ना पत्नी के प्रति क्रूरता ...और पढ़ें

तलाक को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम फैसला। (फाइल फोटो।)

तलाक को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम फैसला। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. पति का बूढ़ी बीमार मां को न छोड़ना क्रूरता नहीं।

  2. शादी से माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियां समाप्त नहीं होतीं।

  3. हाई कोर्ट ने पत्नी की अलग घर की जिद पर तलाक दिया।

डिजिटल डेस्क, रायपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सोमवार को कहा कि किसी पति का अपनी बूढ़ी और बीमार मां को छोड़कर कहीं और रहने से इनकार करना उसकी पत्नी के प्रति क्रूरता नहीं माना जा सकता, क्योंकि शादी से माता-पिता के प्रति व्यक्ति की जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं।

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने अपनी पत्नी से तलाक चाहने वाले एक व्यक्ति की अपील को मंजूरी दी, उसकी तलाक की अर्जी खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद किया और शादी को खत्म कर दिया।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने पत्नी की इस जिद पर ध्यान दिया कि उसका पति किसी दूसरे घर में रहे और कहा कि अलग घर की मांग को हमेशा क्रूरता नहीं माना जा सकता, क्योंकि जीवनसाथी के पास अलग घर चाहने के वाजिब कारण हो सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि यह देखना जरूरी था कि क्या ऐसी जिद हालात के हिसाब से सही थी या यह पति को अपने माता-पिता से रिश्ता तोड़ने या बदलने के लिए मजबूर करने की अनुचित कोशिश थी। इस मामले में पति की मां बहुत बूढ़ी और बीमार थीं।

हाई कोर्ट ने कहा कि पति का यह कहना कि वह अपनी मां से दूर नहीं होना चाहता, न तो अप्राकृतिक था और न ही अनुचित। बल्कि, यह परिवार के प्रति एक वाजिब जिम्मेदारी को दिखाता है, जिस पर वह यह तय करते समय विचार कर सकता था कि कहां रहना है।

'बूढ़े या बीमार मां-बाप के प्रति जिम्मदारी खत्म नहीं हो जाती'

हाई कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि वैवाहिक रिश्ता किसी भी जीवनसाथी को दूसरे को पहले से चली आ रही पारिवारिक जिम्मेदारियों को छोड़ने या उनसे मुंह मोड़ने के लिए मजबूर करने का असीमित अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने कहा, "शादी से एक नया परिवार बनता है, लेकिन इससे वे नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं जो किसी व्यक्ति की अपने बूढ़े या बीमार माता-पिता के प्रति हो सकती हैं।"

यह भी पढ़ें: 'विवाह के बाद भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार हैं बेटियां', छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला