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21 साल की उम्र से पहले सरपंच बनना पड़ा भारी, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रद किया पंचायत चुनाव

Published: Wed, 09 Sep 2026 08:43 AM (IST)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कृष्णानगर ग्राम पंचायत के सरपंच चुनाव को रद करने के निर्वाचन अधिकारी के फैसले को बरकरार रखा।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कम उम्र में चुनाव लड़ने पर किया चुनाव रद (फाइल फोटो)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कम उम्र में चुनाव लड़ने पर किया चुनाव रद (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने सरपंच चुनाव रद्द करने का फैसला बरकरार रखा।

  2. चुनी गई सदस्य नामांकन के समय 21 वर्ष से कम उम्र की थी।

  3. पंचायत चुनाव के लिए 21 वर्ष की आयु अनिवार्य संवैधानिक शर्त।

डिजिटल डेस्क, रायपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के समक्ष ग्राम पंचायत कृष्णानगर में सरपंच पद के चुनाव को लेकर याचिका दायर की गई थी। कोर्ट ने माना कि इस चुनाव में चुनी गईं सदस्य की उम्र 21 साल से कम है।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले में निर्वाचन अधिकारी के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें इस सरपंच चुनाव को रद करने का आदेश था।

21 साल से कम उम्र के लोग नहीं लड़ सकते पंचायत चुनाव

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'संविधान के अनुच्छेद 243-F के तहत पंचायत चुनाव के लिए 21 वर्ष की आयु पूरी करना अनिवार्य संवैधानिक शर्त है। चूंकि उम्मीदवार नामांकन दाखिल करने की तारीख को 21 वर्ष की नहीं हुई थी, इसलिए वह सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ने की पात्र नहीं थी।

हाई कोर्ट ने यह भी साफ तौर पर कहा कि निर्वाचन अधिकरण के समक्ष याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने प्रभावी रूप से इस बात के कोई सबूत नहीं दिए, जिससे ये साबित हो सके कि नामांकन दाखिल करने के दौरान उनकी उम्र 21 साल की थी। इसलिए यह कहना कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला, यह सही नहीं है।

21 साल पूरे न होने पर भी लड़ लिया चुनाव

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील थी कि उसकी उम्र 21 साल है और निर्वाचन अधिकारी ने यह मानते हुए कि उसकी उम्र 21 वर्ष से कम थी, चुनाव निरस्त किया।

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि एक तरफ जहां याचिकाकर्ता के आधार कार्ड और वोटर आईडी में जन्म तिथि 12 अप्रैल 2002 दर्ज थी। वहीं कक्षा 1 से लेकर मैट्रिक तक के शैक्षणिक अभिलेखों में उम्मीदवार की जन्मतिथि 12 अप्रैल 2004 दर्ज थी।

हाई कोर्ट ने माना कि आधार कार्ड पहचान स्थापित करने का दस्तावेज है, लेकिन वह अपने आप में जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने जो सबूत पेश किए, उसमें 12 अप्रैल 2002 की जन्मतिथि वाला जन्म प्रमाणपत्र भी था, लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि यह प्रमाणपत्र 5 जुलाई 2025 को अपडेट होकर जारी हुआ। वहीं चुनाव का नामांकन इससे पहले हो चुका था।

कोर्ट ने कहा, 'सभी पुराने शैक्षणिक दस्तावेजों में 12 अप्रैल 2004 की जन्मतिथि दर्ज होने और 12 अप्रैल 2002 वाली जन्मतिथि के समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सबूत प्रस्तुत नहीं किए जाने की स्थिति में मैट्रिक प्रमाणपत्र को अधिक विश्वसनीय माना जाएगा।'

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