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अरविंद केजरीवाल के सामने नई टेंशन, पार्टी को अलविदा कहने वाले 7 सांसदों के साथ खड़ी कार्यकर्ताओं की 'फौज'

Published: Mon, 27 Apr 2026 11:12 AM (IST)

आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के पाला बदलने से पार्टी में एकजुटता और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया। (फाइल फोटो)

अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया। (फाइल फोटो)

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वी के शुक्ला, नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (आप) का एक तरफ कुनबा बिखर रहा है और मनोबल भी पस्त होने को है, ऐसे समय में आप के सामने अब एकजुटता की चुनौती है। पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों द्वारा पाला बदलने के बाद कार्यकर्ताओं में मायूसी है।

14 माह में दूसरी बार है कि जब आप के कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरने वाली स्थिति पैदा हुई है। फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद आप के खासकर दिल्ली के कार्यकर्ताओं में ही नहीं पार्ट के नेताओं में भी मायूसी देखी गई थी।

कार्यकर्ता इससे उबर रहे थे कि यह साथ सात राज्यसभा सदस्यों द्वारा पाला बदलने की घटना ने एक बार फिर कार्यकर्ताओं में मायूसी को बढ़ावा दे दिया है।

AAP raghav chadha

बड़ी संख्या में पाला बदल सकते हैं कार्यकर्ता 

कहा यहां तक भी जा रहा है कि पार्टी छोड़कर गए अपने खास राज्यसभा सदस्यों के साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पाला भी बदल सकते हैं। इसे देखते हुए आप के सामने कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने के साथ-साथ एकजुटता बनाए रख पाना भी बड़ी चुनौती है।

आप के लिए वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम किसी बड़े संकट से कम नहीं है। एक ओर जहां पार्टी फरवरी 2025 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के जख्मों से उबरने की कोशिश कर रही थी, वहीं अब सात राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने ने संगठन की नींव हिला दी है।

 बिखरता कुनबा और पस्त मनोबल... फिर कैसे भरेगा जोश?

राजधानी के सियासी गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतृत्व अपने बिखरते कुनबे और पस्त पड़े कार्यकर्ताओं में फिर से जोश भर पाएगा? पार्टी के भीतर से आ रही खबरें बताती हैं कि सात राज्यसभा सदस्यों का जाना केवल ''नेताओं का जाना'' नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास की हार है जिसे कार्यकर्ता अपना आदर्श मानते थे।

सूत्रों के अनुसार, दिल्ली के विभिन्न वार्डों और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय कार्यकर्ता अब असमंजस में हैं। खतरा इस बात का भी है कि बड़ी संख्या में स्थानीय कार्यकर्ता और पदाधिकारी अपने पसंदीदा सांसदों के नक्शे कदम पर चलते हुए दूसरी पार्टी का दामन थाम सकते हैं।

AAP के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति पर सवाल

सांसदों के इस कदम ने न केवल पार्टी की आंतरिक एकता को उजागर किया है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि यदि उच्च सदन के प्रतिनिधि ही सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे, तो आम कार्यकर्ताओं का भविष्य क्या होगा? यह स्थिति पार्टी की 'अनुशासन और एकजुटता' वाली छवि को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।

आप के सामने दोहरी चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आप के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली पार्टी के भीतर मची भगदड़ को तुरंत रोकना और दूसरी कर्यकर्ताओं के गिरे हुए मनोबल को फिर से उठाना। यदि नेतृत्व ने जल्द ही कोई ठोस संवाद कार्यक्रम या बड़े संगठनात्मक बदलाव नहीं किए, तो आने वाले समय में पार्टी का ढांचा और भी कमजोर हो सकता है।

फिलहाल, आप एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसे अपनी विचारधारा और संगठन को बचाने के लिए नए सिरे से संघर्ष करना होगा। दिल्ली की सड़कों पर पार्टी का झंडा बुलंद करने वाला कार्यकर्ता आज हताश हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि केजरीवाल और उनकी टीम इस अस्तित्व के संकट से बाहर निकल पाने में कितनी सफल होती है।

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