अल्जाइमर के लक्षण दिखने से 20 साल पहले शुरू हो जाते हैं बदलाव, भूलने को उम्र का असर मानना पड़ सकता है भारी
अल्जाइमर के लक्षण दिखने से करीब 20 वर्ष पहले ही मस्तिष्क में बदलाव शुरू हो जाते हैं, इसलिए याददाश्त में ...और पढ़ें

(बाएं से दाएं) डॉ. राहुल कपूर, पूर्व मिस यूनिवर्स एवं अभिनेत्री लारा दत्ता, फोर्टिस एस्कार्ट्स के डॉ. विनीत बंगा और फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. साहिल कोहली। सौजन्य फोर्टिस
HighLights
अल्जाइमर के बदलाव लक्षण दिखने से 20 वर्ष पहले शुरू होते हैं।
याददाश्त में बदलावों को बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा न मानें।
शुरुआती पहचान से बेहतर देखभाल और योजना बनाना संभव है।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। अल्जाइमर के स्पष्ट लक्षण सामने आने से करीब 20 वर्ष पहले ही मस्तिष्क में बीमारी से जुड़े बदलाव शुरू होने लगते हैं। ऐसे में याददाश्त में लगातार हो रहे बदलावों को बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज करना बीमारी की शुरुआती पहचान के अवसर को प्रभावित कर सकता है।
विश्व अल्जाइमर दिवस पर सोमवार को आयोजित जागरूकता कार्यक्रमों में विशेषज्ञों ने शुरुआती संकेतों की पहचान और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने पर जोर दिया। पूर्व मिस यूनिवर्स एवं अभिनेत्री लारा दत्ता ने भी दिमागी सेहत पर खुलकर बातचीत करने और याददाश्त में होने वाले बदलावों को गंभीरता से लेने का आह्वान किया।
88 लाख लोगों को डिमेंशिया
विशेषज्ञों के अनुसार एमाइलायड प्रोटीन के असामान्य जमाव से जुड़े बदलाव बीमारी के शुरुआती चरण को समझने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि अल्जाइमर की पुष्टि केवल एक जांच के आधार पर नहीं की जाती। मरीज के लक्षणों, चिकित्सकीय जांच और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न जांचों के परिणामों को साथ देखकर स्थिति का आकलन किया जाता है।
भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 88 लाख लोग डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे हैं। इनमें अल्जाइमर रोग सबसे सामान्य कारण है। बढ़ती बुजुर्ग आबादी के साथ बीमारी का बोझ आने वाले वर्षों में बढ़ने की आशंका है।
लगातार भूलना, परिचित काम करने में कठिनाई, बातचीत या निर्णय लेने में बदलाव और रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भरता बढ़ना ऐसे संकेत हैं, जिन पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स के न्यूरोलाजी विभाग के निदेशक एवं एचओडी डा. विनीत बंगा ने कहा कि अल्जाइमर केवल याददाश्त कमजोर होने तक सीमित नहीं है। इससे सोचने-समझने, बातचीत करने, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के न्यूरोलाजी विभाग के एडिशनल निदेशक डा. साहिल कोहली ने कहा कि शुरुआती पहचान से मरीज और परिवार बीमारी को समझकर देखभाल की बेहतर योजना बना सकते हैं।
आधुनिक जांचों से शुरुआती पहचान में मदद
महाजन इमेजिंग एंड लैब्स के वेबिनार में वरिष्ठ न्यूरोलाजिस्ट डा. विनीत सूरी ने लगातार भूलने और आत्मनिर्भरता प्रभावित होने पर न्यूरोलाजी मूल्यांकन की आवश्यकता बताई।
डा. ऋतु वर्मा ने कहा कि एफडीजी पीईटी मस्तिष्क के चयापचय में बदलाव की जानकारी देता है, जबकि एमआरआइ से संरचनात्मक बदलाव और अन्य कारणों का पता लगाने में मदद मिलती है। डा. शेली महाजन ने रक्त आधारित बायोमार्कर को अल्जाइमर से जुड़े जैविक बदलावों के आकलन का कम आक्रामक विकल्प बताया।
लारा दत्ता ने कहा कि याददाश्त या दिमागी सेहत में बदलावों को उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि जागरूकता का उद्देश्य शुरुआती संकेत पहचानने, समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने और मरीज व परिवार के लिए उचित देखभाल की योजना बनाने के प्रति जागरूकता बढ़ाना होना चाहिए।
