8 साल बाद दिल्ली में कहां लौटे Anupam Kher? 'जाने पहचाने अनजाने' से रुलाया; NSD के दिनों के राज खोले
अनुपम खेर 8 साल बाद दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में 'जाने पहचाने अनजाने' नाटक के साथ मंच पर लौटे हैं। ...और पढ़ें

जाने पहचाने अनजाने नाटक का मंचन करते अभिनेता अनुपम खेर और अभिनेत्री स्वरूप संपत। सभी फोटो: चंद्र प्रकाश मिश्र
HighLights
अनुपम खेर 8 साल बाद दिल्ली के मंच पर लौटे
'जाने पहचाने अनजाने' में स्वरूप संपत संग अभिनय
एनएसडी और दिल्ली से जुड़ी पुरानी यादें साझा कीं
जागरण संवाददाता, मनु त्यागी। सालगिरह, कुछ भी हो सकता है, जैसे सुपरहिट नाट्य मंचनों के बाद एक बार फिर दिल्ली के मंच पर Swaroop Sampat के साथ Anupam Kher अलग ही फाॅर्म में दिख रहे हैं। कहते हैं 'रंग मंच मेरे कलाकार में जंग नहीं लगने देता'।
अनुपम कहते भी हैं थियेटर का मतलब ही ये होता है कि उसकी कहानी और दर्शक के मन के तार जुड़ जाएं। दर्शकों को पूरे मंचन के दौरान ये बार-बार लगना चाहिए कि अरे, ये तो मेरी ही बात कह रहा है। और ये हर उम्र वर्ग के लिए होना चाहिए।
ये नहीं की सिर्फ Gen X (1965-80) तक वाले या उससे पहले वाली पीढ़ी के लिए ही। यहां तो Gen Z को भी अपना कनेक्ट लगना चाहिए। क्योंकि आज जेनजी के अनुसार थियेटर को माॅडर्न कहानियों की भी जरूरत है।
आप भी आगामी दो दिन में बुक माई शो के जरिये शो बुक करके जरूर देखने जाएं। आपको कलाकार के रूप में हर उम्र का, हर रिश्ता इस नाटक में दिखेगा। ठीक बिलकुल वैसे ही, कि अरे ये ही तो मेरी ही बात हो रही है।

कमानी ऑडिटोरियम से जुड़ी यादें साझा कीं
कमानी ऑडिटोरियम, जो कि अनुपम खेर के लिए बहुत जुड़ाव वाला मंच रहा है, कहते हैं आठ साल बाद यहां मंच पर हूं। मैं कितना भी थियेटर कर लूं, लेकिन आज भी मेरे साथ ऐसा होता है कि मंच पर जाने से पहले हार्ट बीट बढ़ जाती है। बहुत नर्वस हो जाता हूं। अच्छा लगता है, नर्वस होना भी जिंदा होने की निशानी है।
कमानी से तो मेरा ऐसा जुड़ाव है, यहां के प्रवेश से लेकर, मंच तक और मंच के पर्दे के पीछे से चेंजिंग रूम तक हर जगह वो पुरानी स्टूडेंट दौर की यादें ताजा हो जाती हैं। यहां तो मैंने अपने एनएसडी वाले दौर में 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से भी काम किया था। मेरी ‘परिपक्वता’ में थियेटर का बहुत बड़ा हाथ है।

मुंबई में रहकर तो दिल्ली तो मायके जैसी...
1975 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में तीन साल बिताने के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि सिर्फ नाट्य कला केंद्र नहीं है। भले वो बहुत लंबा समय नहीं था, पर मुंबई में रहकर दिल्ली तो मायके जैसी लगती है।
और एनएसडी, इसके इर्दगिर्द तो कला-संस्कृति से लेकर जिदंगी का वो इंजन है जहां आप कितने भी निराश हों, साथ में दोस्त हो तो निपुण होकर ही निकलेंगे।
यहां जेब में कम पैसों के दौर में बड़े सपनों को पूरा करने वाली मेहनत की खुशबू मिलती है। जो आपको बार-बार बुलाती है। श्रीराम सेंटर, कमानी ऑडिटोरियम और एलटीजी ऑडिटोरियम की सीढ़ियों पर बैठकर चाय पीना, समोसे बांटकर खाना और रात-रात भर नाटकों की रिहर्सल करना, यही तो जिंदगी थी ।
बंगाली मार्केट के नाथू स्वीट्स, भला वहां कौन नहीं जाएगा। खूब चक्कर लगते थे। खाने के साथ-साथ, मैं अपने एनएसडी वाले दिनों में लाल किला के पास नई सड़क पर हर रविवार लगने वाला किताबों का बाजार जरूर जाता था, वहां से इकट्ठा किया हुआ कलेक्शन आज भी संजोया हुआ है ।
एक शानदार और जिंदादिल इंसान है अनुपम खेर: स्वरूप संपत
अपनी इस शानदार वापसी और सशक्त किरदार के बारे में विशेष बातचीत के दौरान स्वरूप संपत बेहद सादगी से बताती हैं कि भले ही मेरी भूमिका अनुपम की भूमिका से छोटी हो सकती है, लेकिन यह किरदार कई भावनात्मक उतार-चढ़ावों से गुजरता है।

इसमें कुछ बेहतरीन दृश्य हैं। मैं मंच पर अभिनय का वास्तविक आनंद लेना चाहती हूं और यह किरदार मेरे लिए एकदम परफेक्ट था। अनुपम खेर के लिए कहती हैं ये 'एक शानदार और जिंदादिल इंसान' हैं। जिनके साथ काम करना हमेशा एक यादगार अनुभव होता है।
अनुपम खेर स्टूडियोज के बैनर तले भव्य स्तर पर निर्मित इस नाटक में Meghna Malik, Maya Sharma, Vikas Rawat, श्रद्धा मंडले और हरमन डी सूजा जैसे मंझे हुए सह-कलाकारों ने भी अपनी दमदार अदाकारी से कहानी में नए रंग भरे हैं, जो इस नाटक को इस साल का सबसे बेहतरीन और अवश्य देखे जाने योग्य सांस्कृतिक अनुभव बनाता है।
'जाने पहचाने और अनजाने' में जीवन के द्वंद्व
जागरण संवाददाता, शशि ठाकुर। इस समकालीन मध्यवर्गीय जीवन की विडंबना, रिश्तों की उलझन, अकेलेपन के दंश और खोए हुए आत्म-सम्मान की तलाश को रंगमंच पर बेहद संजीदगी और मार्मिकता से हंसी की चाशनी में जीवंत किया हिंदी संगीतमय नाटक 'जाने पहचाने अनजाने' ने।
खासकर तब जब दिग्गज अभिनेता अनुपम खेर मंच पर हों तो सारा मंचन उनके इर्दगिर्द सिमट आता है। सुधीर पाठक को मंच पर अनुपम खेर ऐसे जीते हैं, जैसे लगता है कि वह कहीं आस-पास वह जीवन उतने ही साफगोई और वेदना के साथ एकांकी जी रहा हो।
इस दिग्गज कलाकारों का मंचन देखने ठसाठस ऑडिटोरियम भरा रहता है। तालियां, सीटी, अनुपम खेर के डाॅयलाग...शो के उत्साह को बार-बार रोमांच की हाई पिच पर ले जा रहे थे।
खेर की अदायगी पर तालियों की गड़गड़ाहट, ठहाकों के साथ सिसकियों का ऐसा मिश्रण था जो इस मंचन को लाइट कैमरा एक्शन से कहीं बहुत आगे ले जाता है।
वैसे, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक Gajendra Ahire निर्देशित इस नाटक में खेर का साथ मिसेज देसाई के किरदार में अभिनेत्री स्वरूप संपत व आरती के किरदार में अभिनेत्री Meghna Malik की मौजूदगी मंचन को जादुई अहसास देती है।

भीतर के सन्नाटे को तोड़ता मंचन
यह नाटक, समकालीन समाज का एक ऐसा जीवंत आईना है, जो दर्शकों को अपने भीतर झांकने पर मजबूर करता है। नाटक का मूल आत्मा हम सबके भीतर छिपे एक 'अंदरूनी खुद' (Inner Self) के इर्द-गिर्द घूमता है, जो हमारी हर अच्छाई, बुराई और कड़वी सच्चाई को बखूबी जानता है, लेकिन दुनियादारी, सामाजिक अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों की भारी परतों के नीचे कहीं गुम हो जाता है।
कहानी पड़ोसियों के एक ऐसे अनूठे समूह के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो आस-पास की इमारतों में रहते हुए भी अपनी-अपनी भावनात्मक शून्यता से जूझ रहे हैं।
इस समूह में जीवन की ढलती सांझ में नई राह तलाश रहा एक विधुर (सुधीर पाठक), अतीत की यादों के सन्नाटे को समेटे विधवा (मिसेज देसाई), मध्यम उम्र में वैवाहिक अलगाव के असहनीय दर्द को खामोशी से झेल रही चुलबुली महिला (आरती) शामिल हैं। इसी तरह, आधुनिक दौर के संघर्षों और सपनों के बीच झूलती एक युवा किरायेदार (माया शर्मा) है।
ये सभी किरदार शुरुआत में एक-दूसरे के लिए अपरचित होते हैं, जो धीरे-धीरे परिस्थितियों के धागे से बंधकर जाने-पहचाने हो जाते हैं। यह नाटक महानगरों के बंद कमरों में पसरी खामोशी के बीच खुशी, सुकून और अपनेपन को नए सिरे से तलाशने की एक बेहद भावुक और जादुई मानवीय यात्रा है, जो दर्शकों को जज्बातों के कई उतार-चढ़ावों से रूबरू कराती है। खचाखच भरे हाल की कुर्सियां इसकी गवाही बार-बार दे रही थीं।
एक संगीतमय नाटक होने के नाते इसका संगीत पक्ष भी बेहद मजबूत है, जहां प्रसिद्ध संगीतकार Anu Malik ने अपने लंबे करियर में पहली बार किसी नाटक के लिए विशेष धुन तैयार की हैं, जिन्हें मशहूर गीतकार कौसर मुनीर के दिल को छू लेने वाले शब्दों ने सजाया है।

अनुपम खेर अकेलेपन से जूझते विधुर के किरदार में अपनी परिपक्व अदाकारी से जान फूंक देते हैं, जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी जीने की नई वजह और सकारात्मकता ढूंढता नजर आता है। वहीं, इस नाटक के जरिये एक लंबे अरसे के बाद मंच पर वापसी कर रही स्वरूप संपत का अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
दोनों दिग्गज कलाकारों के बीच की गजब की जुगलबंदी और केमिस्ट्री नाटक को एक अभूतपूर्व भावनात्मक गहराई प्रदान करती है, जहां वे मंच पर अभिनय करते नहीं बल्कि अकेलेपन के दर्द को जीते हुए दिखाई देते हैं। जिसे दर्शक ऐसे बंधे हुए देखते हैं कि मंचन खत्म होने के बाद भी हाल भरा रहता है और शुरू से अंत तक तालियों की गड़गड़हाट से गूंजता रहता है।
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