कॉर्पोरेट हब में भक्ति का 'ब्रू', साइबर सिटी में छा रहा भक्ति का नया रंग; कैफे से फाइवस्टार तक गूंज रहे भजन
गुरुग्राम में युवा कॉर्पोरेट पेशेवर अब लाउड म्यूजिक छोड़कर भजन क्लबिंग और जैमिंग को अपना रहे हैं। यह नया ट्रेंड ...और पढ़ें

सबरंग के इस अंक में साइबर सिटी में भक्ति क्लबिंग के बढ़ते कल्चर के रंग को प्रस्तुत किया गया है। गायिका हिमानी कपूर भी ऐसी ही एक क्लबिंग की गायिका हैं।
HighLights
गुरुग्राम में युवा कॉर्पोरेट पेशेवर भजन क्लबिंग और जैमिंग में रुचि ले रहे हैं।
यह ट्रेंड लाउड म्यूजिक वाली नाइटलाइफ का आध्यात्मिक विकल्प बन रहा है।
आर्टिस्ट चौक जैसे मंच युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ रहे हैं।
प्रियंका दुबे मेहता, नोएडा। गगनचुंबी इमारतें, सड़कों पर दौड़तीं लक्जरी गाड़ियां और लाउड म्यूजिक से गुलजार रहने वाली नाइटलाइफ-मिलेनियम सिटी गुरुग्राम की यह पहचान अब एक बेहद खूबसूरत करवट ले रही है।
कल तक जिन युवाओं के हाथों में वीकेंड्स पर व्हिस्की के ग्लास दिखते थे, आज वहां सुकून बिखेरते काॅफी के मग और जुबां पर सूफियाना व भक्तिरस के सुर सज रहे हैं। कह सकते हैं कार्पोरेट हब में भक्ति का 'ब्रू' दिखता है। आज सबरंग के इस अंक में साइबर सिटी के इन्हीं रंग से रूबरू करते हैं...
क्लबिंग में शिरकत कर रहे
कार्पोरेट की भागदौड़ और लाउड राॅक-पाप के शोर को पीछे छोड़, साइबर सिटी की नई पीढ़ी अब अपनी जड़ों और आध्यात्मिक शांति की ओर लौट रही है। युवाओं द्वारा खुद चुनी गई संस्कृति का यह सकारात्मक बदलाव न सिर्फ हैरान करने वाला है, बल्कि आधुनिकता और परंपरा के इस अनूठे संगम को एक बेहद अद्भुत, अद्वितीय और प्रेरक शक्ल दे रहा है। तभी तो आज देश के प्रधानमंत्री भी भजन क्लबिंग और भजन जैमिंग को सराह रहे हैं। ऐसी क्लबिंग में शिरकत कर रहे हैं।
आयाम जो नई पीढ़ी ने रच रहे
एक शाम बाजार की ओर निकलते हैं, वही गहमागहमी, वही रेहड़ियों से आती स्वाद की सुंगध, वहीं दुकानों से बाहर झांकते सामानों का आकर्षण जो हमेशा होता है। आगे बढ़ते हैं, शाम का रंग कुछ और गहरा होने लगता है, बाजार का माहौल बदलने लगता है, रोशनी मद्धम हो जाती है, शोर कुछ कम होने लगता है, लोगों के कदम रुकने लगते हैं और लोग एक ही दिशा में जाते नजर आते हैं, आखिर माजरा क्या है, कौन सा जादुई आकर्षण इन्हें इस कदर खींच रहा है, कुछ देर बाद आप अपनेआप को भी इसी आकर्षण में बंधा पाते हैं, यह आकर्षण होता है वहां के संगीत में, लोगों की भावों में, संगीत की सुर लहरियों में बंधे भक्तिसंगीत और उसके नए आयामों में, वह आयाम जो नई पीढ़ी ने रचे हैं।
तेजी से ट्रेंड का रूप लेता जा रहा
सुर के, साधना के, सकारात्मकता आध्यात्म और बदलाव के। शब्द जाने पहचाने लेकिन सुर और सुरीले, संगीत और रसयुक्त और लोगों पर चढ़ा इसका खुमार और भी दर्शनीय...। हनुमान चालीसा, रामधुनें, कृष्णभक्ति की सुरीली प्रस्तुतियां और उसमें खोते, झूमते लोग। एक अलग ही समाज, एक अलग ही संस्कृति से रूबरू करवाते हैं जिसमें आधुनिकता भी है, उन्मुक्तता भी है और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव भी। असल में यह दृश्य है भजन जैमिंग या भजन क्लबिंग का जो तेजी से ट्रेंड का रूप लेता जा रहा है।
सड़कों से लेकर फाइवस्टार होटल्स में हो रहे आयोजन
इस शब्द को प्रचलन में लाने वाली भी साइबर सिटी ही है जो आज एक नई रीत चलाकर भावी पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ रही है। ये नजारा है आर्टिस्ट चौक का। यह कोई चौराहा नहीं, एक मंच है जो हर वर्ग के लोगों को, कलाकारों को एक साथ लाता है। लोग अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, संगीत के सुरों में भक्तिसंगीत को पिरोकर लोगों के सामने रखते हैं। गुरुग्राम के इस क्लब का अनुसरण अब हर जगह हो रहा है। गुरुग्राम और दिल्ली में कई स्थानों पर, सड़कों से लेकर फाइवस्टार होटल्स में ऐसे आयोजन हो रहे हैं।

वीकेंड के अलग रंग
इस ट्रेंड को शुरू करने वाले विवेक गुलाटी असल में केक डिजायर बेकरी कैफे के संचालक हैं। संगीत से लगाव रखने वाले विवेक का कहना है कि गुरुग्राम में आने वाले लोग अक्सर कारपोरेट में काम करते हैं, नीरसता की चक्की में बंधे, थके हारे लोग जब शाम को बाजारों का रुख करते तो कहां जाते, उन्हीं स्थानों पर जहां तेज संगीत होता, जाम छलकते हैं लेकिन अगले दिन फिर वही रूटीन, फिर वही बोझिलता, दिनचर्या की एकरसता।
लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया
ऐसे में सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों को ऐसी चीज दी जाए जिससे उनकी खुशियां, उनकी ऊर्जा बनी रहे। उन्होंने अपने ही कैफे के बाहर सेक्टर 22 में इस आयोजन को शुरू किया। उपलब्ध साजों सामान से ही भक्ति संगीत का गायन वादन शुरू किया। लोगों को यह भाने लगा, लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। सिर्फ विवेक ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी कह रहे हैं कि उनकी जिंदगी में, उनके सोच में खासे बदलाव आए हैं, वे अलकोहल नहीं, काॅफी को एंज्वाय करने लगे हैं।

देश विदेश में शो करने लगे
यहां अब निर्धारित आयोजनों में मंगलवार को भक्ति संगीत और वीकेंड पर बाॅलीवुड म्यूजिक होता है। इस नए कल्चर ने लोगों का सोच ही नहीं, उनकी जिंदगी भी बदली है। इसका उदाहरण प्रयागराज से आए रोहित हैं। बताते हैं कि उनके अंदर का कलाकार व्यस्तताओं के बीच कहीं दब गया था लेकिन आर्टिस्ट चौक से जुड़ने के बाद न केवल वह बाहर निकला बल्कि सफलता के शिखर पर भी पहुंचा रहा है। यहां बहुत सी चीजें सीखने को मिली, संगीत और लोगों से जुड़ा और आज मेरा अपना बैंड है, देश विदेश में शो करने लगा हूं।

जुड़ते गए, जिंदगी बदलती गई
जतिन पंडिता एक सूफी गायक हैं, इनका कहना है कि इस मंच से जुड़कर जीवन का मकसद पाया है। एक साल हो गया है इससे जुड़े, मैं इसका हिस्सा बनकर बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं, मुझे यहीं से एक पहचान मिली है। आज मैं अगर देश विदेश में शोज करता हूं तो इसी की बदौलत। भजन जैमिंग से जुड़े रतन की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। कहते हैं जबसे इस मंच से जुड़ा हूं मेरे व्यक्तित्व में निखार आया है, मनःस्थिति में बदली है, अब लगता है जिंदगी पहले से बेहतर हुई है।

केपीएमजी में कार्यरत उत्कर्ष शर्मा आगरा से हैं और पिछले करीब ढाई साल से आर्टिस्ट चौक से जुड़ा हैं और यहां उनकी जर्नी उनके लिए सिर्फ संगीत की नहीं, एक बहुत पर्सनल एक्सपीरियंस रही है। कहते हैं, कारपोरेट लाइफ में आने के बाद मेरी गायिकी कहीं पीछे छूट गई थी। हमेशा से मेरा सपना था कि मैं अपनी आवाज ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाऊं। यहां मुझे अपने पैशन को दोबारा जीने, परफाॅर्म करने, पहचान पाने और लोगों का प्यार व बड़ों का आशीर्वाद हासिल करने का मौका मिला।
मेरे लिए स्प्रिचुआलिटी को भी और मजबूत किया है। जब हमने भजन क्लबिंग की शुरुआत की थी, तब यह एक बिल्कुल नया कान्सेप्ट था। खासकर युवाओं और जेन-जी के लिए। भजनों और हनुमान चालीसा को यूथ की एनर्जी और अपने म्यूजिकल अंदाज में प्रस्तुत करना लोगों को काफी पसंद आया। आज लोग दूर-दूर से हमारे शोज में आते हैं और अच्छी बात यह है कि हमारे काम को देखकर कई लोग इस तरह के भक्ति संगीत की तरफ आगे बढ़ रहे हैं।
संस्कृति ने भावी पीढ़ी के लिए उम्मीद की नई किरण दी

'भजन हमेशा होते आए हैं लेकिन अब भजन जैमिंग और क्लबिंग के ट्रेंड में युवाओं में स्प्रचुआलिटी के प्रति रुचि बढ़ी है। मैंने अभी आनंदम में परफाॅर्म किया था जिसमें संगीत जगत के बड़े-बड़े से दिग्गजों जैसे सोनू निगम, शान, शंकर महादेवन, ऊषा उत्थुप सहित अन्य बड़े संगीतकारों के साथ आयोजन ने विश्वस्तर पर भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक संगीत का परचम लहराया है। पहले लोगों को मौके नहीं मिलते थे, युवा दिशाहीन हो रहा था लेकिन अब इससे एक विशेष सूत्र में पिरोकर युवाओं को सकारात्मक दिशा मिल रही है। इस संस्कृति ने भावी पीढ़ी के लिए उम्मीद की नई किरण दी है।'
-हिमानी कपूर, गायिका।
पुराने किले में घुंघरुओं ने रचा नृत्य का संसार
सूरज ढल चुका है। पुराने किले की ऊंची दीवारों पर शाम की हल्की रोशनी ठहरी है। खुले आसमान के नीचे मंच रोशन है...दर्शक धीरे-धीरे अपनी जगह संभाल रहे है। तभी घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है। कुछ ही क्षणों में मंच पर कलाकारों की मुद्राएं उभरने लगीं और इतिहास की खामोश दीवारों के बीच भारतीय शास्त्रीय नृत्य की जीवंत भाषा बोल उठी।
दो अक्टूबर की शाम पुराने किले में विरासत और भारतीय नृत्य परंपरा आमने-सामने थीं। तीन दिवसीय नृत्य समारोह के पहले दिन कुचिपुड़ी, ओडिसी, भरतनाट्यम और कथक की प्रस्तुतियों ने शाम को अलग-अलग रंगों से भर दिया। जैसे-जैसे मंच पर नृत्य शैलियां बदलती गईं, वैसे-वैसे वातावरण का भाव भी बदलता गया। कभी पैरों की तेज थाप ने लय को गति दी तो आंख और हाथों की चपलता गाथा को शब्द देने लगे।
समारोह की शुरुआत पद्म भूषण राजा, राधा रेड्डी व समूह की कुचिपुड़ी प्रस्तुति से हुई। कदमों की गति और भाव भंगिमाओं के बीच जब संगीत की लय मिली तो दर्शकों की नजरें मंच पर टिक गईं। कुचिपुड़ी की ऊर्जा ने समारोह की पहली शाम के लिए जैसे सुर और ताल की जमीन तैयार कर दी। फिर बारी ठसक से ओडिसी की आई।
मलेशिया के पद्मश्री रमली इब्राहिम ने ओडिसी की विशिष्ट मुद्राओं के साथ सौंदर्यबोध कराया। शरीर की लचक, चेहरे के भाव और लयबद्ध गतियों का ऐसा मेल कि मंच पर हर मुद्रा अपने आप में एक दृश्य बनती चली गई। पीछे खड़ी पुराने किले की दीवारें इस दृश्य को और खास बना रही थीं। पूरी आभा से भरतनाट्यम, चेन्नई की कलाश्रम के कलाकारों ने मंच संभाला तो पैरों की सधी हुई थाप और मुद्राओं की स्पष्टता ने वातावरण में एक अलग अनुशासन पैदा कर दिया। भरतनाट्यम की पारंपरिक संरचना में भाव और कथा के मेल ने दर्शकों को प्रस्तुति से जोड़े रखा।
शाम, रात के आगोश में आगे बढ़ी तो कथक ने माहौल में एक नई गति भर दी। दिल्ली की ध्वनि की प्रस्तुति में घुंघरुओं की लगातार सुनाई देती झंकार और पैरों की थाप ने पूरे परिसर को लय से भर दिया। ताल बढ़ने के साथ घुंघरुओं की आवाज भी तेज होती गई और प्रस्तुति के साथ दर्शकों का ध्यान मंच पर और गहराता चला गया।
लाल किला कि लाल-भूरी दीवारों पर पड़ती रोशनी, खुले आसमान के नीचे मंच और उसके सामने बैठे दर्शक-सब मिलकर ऐसा दृश्य बना रहे थे, जिसमें वर्तमान और अतीत एक ही फ्रेम में दिखाई दे रहे थे। कलाकारों की पोशाकें, आभूषण और नृत्य की मुद्राएं उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रंगों से भर रही थीं। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में देश की विभिन्न शास्त्रीय नृत्य परंपराओं को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।
नृत्य कार्यक्रम
| दिनांक एवं समय | कहां | नृत्य |
| 3 अक्टूबर, शाम 6:30 बजे से | पुराना किला | भरतनाट्यम, स्त्रियां, मोहिनीअट्टम और कथकली, कथक |
| 4 अक्टूबर, शाम 6:30 बजे से | पुराना किला | कथक, ओडिसी, मणिपुर, भरतनाट्यम |
संस्कृति में गूंजी प्रकृति
बाहर के कोलाहल का तेज, भीतर एक कदम बढ़ाना होगा, सोई है जो सदियों से, उस अंतरीणी को जगाना होगा। यह किसी और की आवाज नहीं, तेरे ही वजूद का आह्वान है, उठ, पहचान खुद को, तू साक्षात ज्ञान का कीर्तिमान है। प्रकृति, हिंदू संस्कृति के आत्मा, जीवन, शरीर, खुशी, हंसी, त्योहार, गम ये सब आधार हैं। पर अब बहुमंजिला इमारतों और कंक्रीट की सड़कों के जाल के बीच प्रकृति को संस्कृति से पिरोना किसी पुराने किस्से जैसा लगने लगा है।
कसक यह कि...हवा है, लेकिन उसे महसूस करने की फुर्सत नहीं है। पानी है, लेकिन उसका महत्व तब समझ आता है, जब वह कम पड़ने लगता है। धरती पर कदम तो रोज पड़ते हैं, मगर उससे जुड़ाव का भाव लगातार कमजोर होता जा रहा है।
ऐसे समय में मंच पर जब कलाकार उस जड़ता को तोड़ते हैं, झकझोरते हैं तो शरीर का पोर पोर सिहर जाता है। तब, अंतरीणी : एक जागृति की पुकार’ महज नृत्य नाटिका नहीं रह जाती, यह यात्रा बन जाती है, संस्कृति से अस्तित्व की। भरतनाट्यम कलाकार रमा क्षीरसागर और उनके समूह की इस प्रस्तुति में भारतीय परंपरा में प्रकृति के प्रति रहे गहरे भाव को आज के शहरी जीवन की चुनौतियों के सामने रखा गया।
अंतरिणी प्रकृति को लेकर भारतीय दृष्टि और आधुनिक पर्यावरणीय चिंता के बीच खुलकर संवाद करती है। आज पर्यावरण संरक्षण की बात अक्सर प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, कचरे और संसाधनों के संकट के संदर्भ में होती है। वहीं भारतीय परंपरा में प्रकृति के साथ संबंध को आस्था और सह-अस्तित्व के भाव से देखा गया। अंतरीणी इन दोनों सिरों को जोड़ते हुए यह सवाल सामने रखती है कि अगर प्रकृति हमारे जीवन और संस्कृति में इतनी गहराई से मौजूद रही है तो आधुनिक जीवन में उससे दूरी क्यों बढ़ती गई।
मंच ने खुद ही इसका जवाब शब्दों से कम और शरीर की गति से ज्यादा दिया। भरतनाट्यम की मुद्राएं प्रकृति के विभिन्न रूपों और भावों को सामने लाईं तो कथकली ने नाटकीयता के जरिये कथा को प्रभावी बनाया, जबकि समकालीन नृत्य आधुनिक मनुष्य की बेचैनी और प्रकृति से बढ़ती दूरी को व्यक्त करता है। तीनों नृत्य विधाओं का मेल प्रस्तुति को एक ऐसी दृश्य भाषा देता है, जिसमें परंपरा और वर्तमान एक साथ दिखाई देते हैं।
रमा क्षीरसागर बताती हैं कि अंतरीणी की शुरुआत उनके मन में उठने वाले एक सवाल से हुई, शहरों में रहने वाले लोग प्रकृति से कैसे जुड़े रहें। जब उनके आसपास की बहुत-सी चीजें उन्हें उससे दूर ले जा रही हैं। इसी सवाल को समझने के लिए भरतनाट्यम, कथकली और समकालीन नृत्य को एक साथ लाया गया। यह केवल पर्यावरण पर आधारित प्रस्तुति नहीं है, बल्कि दर्शकों को अपने आसपास की दुनिया के साथ अपने रिश्ते पर विचार करने का निमंत्रण है। रोजमर्रा के चुनाव और जीवनशैली प्रकृति के साथ संबंध को किस तरह प्रभावित करते हैं, यह भी प्रस्तुति के केंद्र में है।
