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    संस्था को कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए... केजरीवाल के आरोपों पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिया जवाब

    Updated: Tue, 21 Apr 2026 02:30 AM (IST)

    दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल द्वारा लगाए गए पक्षपात के आरोपों पर तथ्यात्मक जवाब दिया। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने कहा कि न्यायपालि ...और पढ़ें

    न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा। फाइल फोटो

    न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा। फाइल फोटो

    HighLights

    1. केजरीवाल के आरोपों पर अदालत का तथ्यात्मक जवाब

    2. न्यायमूर्ति शर्मा ने आरोपों को बताया निराधार

    3. अदालत ने निष्पक्षता पर उठाए सवालों का किया खंडन

    विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। अदालत के बाहर राजनीतिक मंचों पर दिए गए बयान हो या फिर सार्वजनिक तौर पर आयोजित हुए कार्यक्रम में हिस्सा लेना। बच्चों का सरकारी पैनल में शामिल होना हो या फिर संभावनाओं के आधार पर पक्षपात करने का आरोप।

    विशेष तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा सीधे तौर पर लगाए गए व्यक्तिगत आरोपों पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने तथ्यात्मक जवाब दिया।

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि खुद को मामले से अलग कर लेना एक आसान जरिया हो सकता था, लेकिन यह अदालत जानती है कि न्यायाधीश का पद संयम और मौन की मांग करता है। लेकिन इस मौन के कारण संस्था को कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए।

    उन्होंने कहा, लगाया गया प्रत्येक आरोप, न्यायपालिका की सामूहिक संस्था पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी के नेताओं को पूर्व में कई मामले में राहत देने पर पक्षपात या वैचारिक झुकाव के कोई आरोप नहीं लगाए गए थे। ऐसे में दूसरे के पक्ष में निर्णय आने पर आपत्ति नहीं की जा सकती।

    वादी यह नहीं बता सकता कि जज के बच्चे अपनी जिंदगी कैसे जिएं

    बच्चों के सरकारी पैनल में शामिल होने के केजरीवाल के तर्क पर न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि यह आरोप सिर्फ केजरीवाल ने लगाया है। इस कोर्ट की राय में, भले ही इस कोर्ट के रिश्तेदार सरकारी पैनल में हों, तो वादी को यह दिखाना होगा कि इसका मौजूदा केस पर क्या असर पड़ा है।

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    केजरीवाल द्वारा ऐसा कोई गठजोड़ नहीं दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि कोई वादी यह तय नहीं कर सकता कि जज के बच्चे या परिवार के सदस्य अपनी जिंदगी कैसे जिएं।

    न्यायमूर्ति शर्मा ने सवाल किया कि अगर किसी नेता की पत्नी नेता बन सकती है तो यह कैसे कहा जा सकता है कि एक जज के बच्चे कानून के प्रोफेशन में नहीं आ सकते? उन्होंने कहा कि उनके किसी भी बच्चे का आबकारी नीति घोटाला मामले से कोई लेना-देना नहीं है।

    शीर्ष अदालत ने इस कोर्ट के निष्कर्ष पर नहीं की कोई टिप्पणी

    इस अदालत के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद किए जाने के अरविंद केजरीवाल के आरोप पर न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि संजय सिंह से लेकर मनीष सिसोदिया के मामले हो या फिर स्वयं अरविंद केजरीवाल का मामला।

    किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए इस अदालत द्वारा पारित आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। अगर किसी जज के आदेश को कोई ऊपरी अदालत रद कर दे, तो उस वादी को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह यहां खड़े होकर यह कहे कि यह जज केस सुनने लायक नहीं है।

    राजनेताओं के बयान को नियंत्रित नहीं करती अदालत

    गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर अदालत ने कहा कि इस आधार पर खुद को सुनवाई से अलग करने की मांग करना, पूरी तरह से कोरी कल्पना पर आगे बढ़ने जैसा होगा। कोई राजनेता सार्वजनिक मंच पर क्या कहता है, इस पर इस अदालत का कोई नियंत्रण नहीं है।

    इसी तरह, यह राजनेताओं द्वारा दिए गए बयानों को भी नियंत्रित नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति शर्मा ने अगर मैं खुद को इस मामले से अलग कर लेती हूं तो जनता को यह लगने लगेगा कि जज किसी खास राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़े हुए हैं।

    यह अदालत, खुद को मामले से अलग करके, ऐसी धारणा बनने की अनुमति नहीं दे सकती। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मुझे पता है कि एक न्यायाधीश के रूप में मेरी आलोचना की जाएगी। चाहे वो इंटरनेट मीडिया हो या आवेदक। लेकिन सुनवाई से अलग होने के गहरे संवैधानिक प्रभाव होंगे।

    राजनीतिक नहीं था अधिवक्ता परिषद का कार्यक्रम

    अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के केजरीवाल के आरोपों पर पीठ ने कहा कि इस बिंदु को सिर्फ केजरीवाल ने उठाया और यह जवाब सिर्फ उन्हीं के लिए है।

    उन्होंने कहा कि अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था और वह नए आपराधिक कानूनों और महिला दिवस के कार्यक्रम में वहां गई थीं या बार के युवा सदस्यों से बातचीत करने के लिए।

    इसका इस्तेमाल किसी भी तरह से वैचारिक पक्षपात दिखाने के लिए नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि सिर्फ मुख्य अतिथि या वक्ता के तौर पर शामिल होने से पक्षपात की आशंका कैसे पैदा हो सकती है या इससे किसी जज की किसी केस का निर्णय करने की क्षमता कैसे खत्म हो सकती है।

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल उनकी तरफ से दिया गया कोई भी राजनीतिक बयान बताने में नाकाम रहे।

    तो आरोपित के कहने से क्यों देनी पड़ती है अग्नि परीक्षा

    न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने मनीष सिसोदिया की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े द्वारा माता सीता को एक बार नहीं बल्कि दो बार अग्नि परीक्षा देने के तर्क पर अदालत ने कहा कि अगर इस कोर्ट को एक आरोपित अग्नि परीक्षा देने के लिए कहता है, तो इस कोर्ट को यह सवाल करना चाहिए कि एक जज को सिर्फ एक आरोपित के कहने पर अग्नि परीक्षा क्यों देनी पड़ती है, सिर्फ इसलिए कि उसे डर है कि जज उसके खिलाफ निर्णय दे सकता है?

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि एक आरोपित यह साबित कर सकता है कि वह बेगुनाह है, लेकिन उसे यह साबित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि जज दागी है। उन्होंने कहा कि कोई वादी बिना साक्ष्य के जज को भी आंकने की कोशिश नहीं कर सकता।

    उन्होंने कहा कि चाहे कोई राजनेता कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए किसी भी साक्ष्य के बिना संस्था को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि न्यायालय धारणाओं का रंगमंच नहीं हो सकता।

    उन्होंने कहा कि यदि अदालत इन आवेदनों को स्वीकार करती है तो यह एक चिंताजनक मिसाल कायम करेगा।

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    मामले के निर्णय को अलग रखते हुए मैं केवल एक विधि के छात्र के तौर पर कहना चाहता हूं कि अदालत ने संविधान को कायम रखा है। पूरे निर्णय में याचिकाकर्ता के प्रति कोई कड़वाहट नहीं है और मैं इसके लिए सचमुच आभारी हूं।

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    तुषार मेहता, सालिसिटर जनरल