26 साल की प्रदूषण से जंग में दिल्ली को थोड़ी राहत, PM 2.5 घटकर 97 माइक्रोग्राम; सुरक्षित हवा अभी दूर
दिल्ली में 26 साल के प्रयासों के बावजूद वायु प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय मानकों से काफी ऊपर है, हालांकि कुछ ...और पढ़ें

धूल प्रदूषण को कम करने के लिए विकास मार्ग आइटीओ स्थित खंभों पर लगे वाटर स्प्रिंकलर। जागरण आर्काइव
HighLights
26 साल बाद भी दिल्ली की हवा प्रदूषित है।
PM2.5 स्तर राष्ट्रीय मानक से ढाई गुना अधिक।
CAQM गठन से प्रदूषण नियंत्रण में मदद मिली।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। प्रदूषण के खिलाफ दिल्ली की करीब ढाई दशक पुरानी लड़ाई ने हवा को कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन मंजिल अभी दूर है। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय राजधानी का वार्षिक औसत पीएम 2.5 लगभग 90.8 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। अगले दशक में प्रदूषण लगातार बढ़ा और 2010 में करीब 126.9 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया।
इसके बाद उतार-चढ़ाव के बीच इसमें कमी आई और 2025 में वार्षिक औसत करीब 97 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। यानी सबसे खराब दौर के मुकाबले सुधार हुआ है, लेकिन हवा अब भी राष्ट्रीय मानक (40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से करीब ढाई गुना प्रदूषित है।
हाल के पांच सालों के आंकड़े बताते हैं कि सुधार एक सीधी रेखा में नहीं हुआ। 2021 में पीएम 2.5 का औसत 105 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो 2022 में घटकर 98 हुआ। 2023 में यह फिर 100 और 2024 में 105 तक पहुंच गया। 2025 में इसमें गिरावट आई और स्तर 97 माइक्रोग्राम रहा। 2018 के बाद कोविड प्रभावित 2020 को छोड़कर यह सबसे कम वार्षिक औसत था।
26 साल की यह तस्वीर बताती है कि दिल्ली की हवा में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन प्रदूषण का संकट खत्म नहीं हुआ। पिछले पांच वर्षों में उठाए गए कदमों ने कुछ राहत दी है, खासकर 2025 के आंकड़ों में इसका संकेत मिलता है। मगर 97 माइक्रोग्राम का औसत भी यह साफ करता है कि दिल्ली को सुरक्षित हवा तक पहुंचने के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी है।
पिछले पांच साल में बदला प्रदूषण से लड़ने का तरीका
इस अवधि में सबसे बड़ा संस्थागत बदलाव 2021 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के गठन के रूप में हुआ। इसके साथ प्रदूषण नियंत्रण को सिर्फ दिल्ली की समस्या मानने के बजाय पूरे एनसीआर के स्तर पर देखने की कोशिश हुई। वाहनों, औद्योगिक इकाइयों, निर्माण एवं सड़क की धूल, कचरा और पराली जलाने जैसे स्रोतों पर अलग-अलग कार्रवाई के साथ साझा दिशा-निर्देश लागू किए गए।
वाहनों से निकलने वाले धुएं को कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, पुराने वाहनों पर सख्ती, सार्वजनिक परिवहन को स्वच्छ ईंधन की ओर ले जाने और एनसीआर में अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के प्रवेश पर चरणबद्ध पाबंदियों जैसे कदम उठाए गए।
निर्माण स्थलों व सड़कों से उड़ने वाली धूल रोकने के लिए मैकेनिकल रोड स्वीपिंग, पानी का छिड़काव और धूल नियंत्रण नियमों को सख्त किया गया। उद्योगों में स्वच्छ ईंधन और उत्सर्जन नियंत्रण पर जोर बढ़ा।
खुले में कचरा जलाने के खिलाफ भी निगरानी और कार्रवाई बढ़ी। पराली के मोर्चे पर पंजाब और हरियाणा के साथ समन्वय बढ़ाने तथा किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के विकल्प देने की कोशिश हुई। इसका असर भी पराली जलाने की घटनाओं में कमी के रूप में सामने आया है।
PM 2.5 और PM 10 आंकड़े
आंकड़े बता रहे 6 से 8 प्रतिशत का बदलाव
(माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर में)
| वर्ष | पीएम 2.5 | पीएम 10 |
|---|---|---|
| 2021 | 105 | 211 |
| 2022 | 98 | 211 |
| 2023 | 100 | 206 |
| 2024 | 105 | 212 |
| 2025 | 97 | 198 |
26 साल का सबक
(माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर में)
| वर्ष | पीएम 2.5 का वार्षिक औसत |
|---|---|
| 2000 | 90.8 |
| 2005 | 101.1 |
| 2010 | 126.9 |
| 2015 | 112.1 |
| 2020 | 111.3 |
| 2025 | 97.0 |
एनसीआर में भी हवा की हालत चिंताजनक
दिल्ली के साथ एनसीआर के शहरों में भी ढाई दशक में प्रदूषण से राहत नहीं मिल सकी है। नोएडा में 2000-25 के दौरान आबादी करीब 10 गुना बढ़ी, औद्योगिक इकाइयां 1,650 तक पहुंचीं, लेकिन वायु गुणवत्ता में खास सुधार नहीं आया।
सड़क धूल के लिए पानी के छिड़काव, स्वीपिंग मशीन और एंटी-स्माग गन के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकला। फरीदाबाद में 2010 के 150-183 से बढ़कर बाद के वर्षों में पीएम 2.5 का स्तर 250 और सर्दियों में कई बार 400 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर पहुंचा।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत हर साल पांच से सात करोड़ रुपये खर्च और 300 उद्योगों में आनलाइन निगरानी के बावजूद चुनौती कायम है। गुरुग्राम में कई बार एक्यूआइ 500 पार कर चुका है। सोनीपत में बढ़ते उद्योगों और अवैध भट्टियों से प्रदूषण दिल्ली तक पहुंच रहा है।
