दिल्ली में मानसून थमा तो बिगड़ने लगी हवा, 250 तक पहुंचा AQI; सर्दियों में क्या होगा हाल?
दिल्ली में मानसून के बाद हवा फिर बिगड़ने लगी है, एक्यूआई 200-250 तक पहुंच गया है, जिससे सर्दियों में गंभीर ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।
HighLights
मानसून के बाद दिल्ली में हवा फिर बिगड़ने लगी है।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए तैयारियां देर से शुरू हो रही हैं।
स्थानीय स्रोत दिल्ली के प्रदूषण में बड़ा योगदान देते हैं।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली में मानसून की वर्षा थमते ही हवा फिर बिगड़ने लगी है। अलग अलग इलाकों में एक्यूआइ 200-250 तक पहुंच गया है, जबकि अभी बाहरी राज्यों से प्रदूषक तत्वों का बड़ा दबाव भी शुरू नहीं हुआ है।
ऐसे में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब प्रदूषण का असली संकट सर्दियों में सामने आएगा, तब राजधानी की हवा का क्या हाल होगा? हर साल एक्यूआइ 400-450 तक पहुंचने के बाद वाहनों पर रोक, स्कूल बंद करने और घर से काम करने जैसी आपात व्यवस्था करनी पड़ती है। आखिर प्रदूषण नियंत्रण की तैयारी पहले से क्यों नहीं होती?
सवाल यह भी है कि दिल्लीवासी निजी वाहनों की जगह मेट्रो जैसे तेज और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन का अधिक इस्तेमाल अपनी आदत में क्यों नहीं ला पा रहे हैं। सरकार, स्थानीय निकाय और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियां जो उपाय कर रही हैं, वे जमीन पर असरदार क्यों नहीं दिख रहे?
होना यह चाहिए था कि प्रदूषण का सीजन शुरू होने से महीनों पहले सड़क, निर्माण, वाहन और हाटस्पाट से जुड़े सभी इंतजाम पूरे कर लिए जाते। लेकिन हुआ यह कि हवा बिगड़ने लगी और तैयारी शुरू हुई।
इन्हीं सवालों की पड़ताल के लिए दैनिक जागरण आज से समाचारीय शृंखला ‘...ताकि सुरक्षित रहें सांसें’ शुरू कर रहा है। इसमें दिल्ली के अपने प्रदूषण स्रोतों, सरकारी तैयारियों, उनकी जमीनी हकीकत और दिल्लीवासियों के व्यवहार की पड़ताल की जाएगी— आखिर साफ हवा का इंतजार हर साल सर्दियों तक क्यों करना पड़ता है?
दिल्लीवासियों की आदत में प्रदूषण नियंत्रण नहीं
प्रदूषण नियंत्रण के लिए सालभर काम होना चाहिए, लेकिन हकीकत में सरकारी विभाग भी लगातार सक्रिय नहीं रहते और दिल्लीवासियों की आदतों में भी प्रदूषण नियंत्रण स्थायी रूप से शामिल नहीं हो पाया है। आज स्थिति यह है कि टूटी सड़कों पर धूल उड़ रही है, निजी निर्माण बिना ढके हो रहे हैं और काला धुआं छोड़ते बिना नंबर प्लेट वाले ट्रक तक सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन समस्याओं पर सालभर कार्रवाई करने के बजाय प्रदूषण का मौसम आते ही तैयारियां तेज होती हैं। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) ने 40 हाटस्पाट पर नई तकनीकों के इस्तेमाल के लिए सोमवार को टेंडर आमंत्रित किए हैं।
शास्त्री नगर स्थित डीएमआरसी के बाइटी पार्क में बन रहा एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सेंटर भी अभी शुरू नहीं हुआ है। यानी जिस वक्त प्रदूषण रोकने के इंतजाम जमीन पर होने चाहिए थे, उस वक्त उनकी प्रक्रिया चल रही है।
दावा बनाम जमीन का सवाल
सरकारी रिकार्ड खुद बताता है कि प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों में सड़क की धूल, वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण एवं तोड़फोड़ और कचरा जलाना शामिल हैं। इन्हीं स्रोतों की पहचान और उन पर कार्रवाई के लिए अब जिला स्तर पर जिम्मेदारी और समयसीमा तय करने के निर्देश दिए गए हैं।
लंबित गड्ढों और सड़क संबंधी काम को भी 31 अक्टूबर तक पूरा करने का लक्ष्य दिया गया है।
दिल्ली के भीतर के स्रोतों पर सवाल
सर्दियों में दिल्ली का एक्यूआइ 400-450 तक पहुंचने पर बाहरी राज्यों से आने वाले प्रदूषकों को अक्सर बड़ी वजह माना जाता है।
लेकिन यदि ऐसे दिनों में भी प्रदूषण का 80-85 प्रतिशत हिस्सा दिल्ली के अपने स्रोतों से जुड़ा माना जाए, तो राजधानी को सबसे पहले अपने ही स्रोतों पर नियंत्रण करना होगा। सड़क की धूल, वाहनों का धुआं, निर्माण और कचरा जलाने जैसे स्रोत सालभर मौजूद हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों में भी दिल्ली के प्रदूषण को केवल बाहरी राज्यों से आने वाले प्रदूषण तक सीमित नहीं माना गया है। एक अध्ययन में सर्दियों के पीएम 2.5 में स्थानीय स्रोतों का योगदान 70 प्रतिशत से अधिक बताया गया है।
