16 साल तक रुपये दबाए बैठी रही सोसाइटी, अब कंज्यूमर फोरम ने दो फ्लैट खरीदारों के पक्ष में दिया बड़ा आदेश
दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसाइटी को फ्लैट में 15 साल की देरी के लिए दो खरीदारों को ₹79.43 लाख ब्याज सहित लौटाने का आदेश द ...और पढ़ें

अदालत ने 15 साल से ज्यादा समय पहले बुक किए गए फ्लैट का कब्जा न देने के कारण मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च के लिए 5 लाख का मुआवजा भी देने का निर्देश दिया।
HighLights
दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने दिया अहम फैसला।
गाजियाबाद सोसाइटी को ₹79.43 लाख लौटाने का आदेश।
15 साल की देरी पर ₹5 लाख मुआवजा भी।
विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। एनसीआर में समय पर भवन न मिलना और बिल्डर द्वारा लोगों को लंबे समय तक परेशान किए जाने के बीच दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने भवन के कब्जे के संबंध में एक अहम निर्णय सुनाया है।
5 लाख का मुआवजा भी देने का निर्देश
फ्लैट पर कब्जा देने में डेढ़ दशक की देरी के ऐसे ही एक मामले में आयोग गाजियाबाद की एक कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी को दो घर खरीदारों को 79.43 लाख ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने 15 साल से ज्यादा समय पहले बुक किए गए फ्लैट का कब्जा न देने के कारण मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च के लिए 5 लाख का मुआवजा भी देने का निर्देश दिया।
जमा की गई रकम अपने पास रखे रही
याचिकाकर्ता प्रमोद कुमार व अन्य द्वारा संचार नेस्ट सहकारी आवास समिति लिमिटेड के खिलाफ दायर याचिका पर आयोग चैयरमैन न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल व न्यायिक सदस्य बिमला कुमारी की पीठ ने सोसाइटी को लंबे समय से अटके हुए हाउसिंग प्रोजेक्ट में सर्विस में कमी और गलत व्यवहार का दोषी पाया।
आयोग ने पाया कि कई सालों तक होम लोन सहित काफी भुगतान करने के बावजूद, खरीदारों को न तो कब्जा मिला और न ही उनके पैसे वापस किए गए। आयोग ने कहा कि हाउसिंग सोसाइटी के पास अनुबंध की तारीख से लगभग सोलह साल तक शिकायतकर्ताओं द्वारा जमा की गई रकम अपने पास रखे रही।'
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अलग-अलग मदों में रुपये मांगती रही
यह मामला 2010 में नोएडा में प्रस्तावित एक प्रोजेक्ट में 3बीएचके फ्लैट की बुकिंग से जुड़ा है। जिसका कब्जा 2012 तक देने का वादा किया गया था। हालांकि, जमीन को लेकर विवाद के कारण, प्रोजेक्ट को गाजियाबाद में दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया और 2013 में नई लागत और नए अनुबंध किए गए। इसके बाद भी, सालों तक निर्माण कार्य अधूरा रहा, जबकि सोसाइटी अलग-अलग मदों में रुपये मांगती रही।
माना जाएगा सर्विस प्रोवाइडर
उक्त तथ्यों को देखते हुए आयोग ने कहा कि हाउसिंग सोसाइटी काम पूरा होने की तारीख आगे बढ़ाती रही और साथ ही अलग-अलग मदों में अतिरिक्त मांगें करती रही। इससे शिकायतकर्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ गया। सोसाइटी की आपत्तियों को खारिज करते हुए आयोग ने कहा कि अगर कोई हाउसिंग सोसाइटी खरीदारों के लिए निर्माण का काम करती है, तो उसे सर्विस प्रोवाइडर माना जा सकता है।
दोनों खरीददारों को रुपये देने का आदेश
आयोग ने जमीन से जुड़े विवाद, बढ़ती लागत, पर्यावरण संबंधी पाबंदियां और कोविड महामारी से जुड़े हाउसिंग सोसाइटी के दावों को भी खारिज कर दिया। रिफंड का निर्देश देते हुए आयोग ने सोसाइटी को एक घर खरीदार को 39,08,865 और दूसरे को 40,34,234 लौटाने का आदेश दिया, जो कुल मिलाकर 79,43,099 होता है। इसके अलावा आयोग ने मानसिक परेशानी के लिए दो-दो लाख रुपये और कानूनी खर्च के लिए 50-50 हजार रुपये दोनों खरीददारों को देने का आदेश दिया।
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